13 फरवरी 2021 : तारीख, कंकर के शंकर हो जाने की!

नीलेश द्विवेदी,भोपाल, मध्य प्रदेश से, 13/2/2021

हर पहलू से रोचक-सोचक है, ये दास्तां। दास्तां, एक मजदूर की। दास्तां, उस मजदूर के सबसे सम्मानित शख़्सियतों में शुमार होने की। दास्तां, कंकर के शंकर हो जाने की। दास्तां, भूरी बाई की। 

ये दास्तान शुरू होती है आज से लगभग 40-42 साल पहले। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में एक ख़्वाब को शक्ल-ओ-सूरत दी जा रही थी। उस वक़्त एक बहुत बड़े दुनियावी कारसाज़ (सँवारने वाला) हुआ करते थे, चार्ल्स कोरिया। वे इस ख़्वाब को मुकम्मल सूरत दे रहे थे। वे शिल्पकार थे। कागज़ों पर लकीरें खींचते थे। लेकिन उनकी खींची लकीरों को ‘पत्थर की लकीर’ की मानिन्द गढ़ देने का जिम्मा दूसरे कांधों पर था। वे थे, सैकड़ों की तादाद वाले  कारीगर, मजदूर, जिनकी हैसियत अदना थी। इन्हीं में एक भूरी बाई। ईंट, गारा ढोती थी। बीच-बीच में कभी वक्त मिलता तो निढाल सी होकर किसी पेड़ की छाँव से जा लगती। वहीं रोटी खाती। कुछ आराम करती। आदिवासी समुदाय से ताल्लुक था, सो कभी-कभी मन बहलाने के लिए वही पत्थरों पर कुछ कलाकृतियाँ उकेर देती। और फिर काम पर लग जाती। ये सिलसिला कुछ वक़्त तक यूँ ही चला। किसी की नज़र न गई क्योंकि वहाँ पसीना बहाते ज़िस्मों के लिए ये सब कोई ख़ास न था। सब वैसे ही तो थे।

लेकिन वहीं एक दाढ़ी वाला शख़्स भी हुआ करता था। नहीं, शख़्स नहीं, शख़्सियत। जगदीश स्वामीनाथन। ऊँचे पायदान पर खड़े हिन्दुस्तान के आलातरीन चित्रकार, कवि और लेखक। भोपाल में आकार ले रहे उस बड़े मंसूबे से वे भी बताल्लुक़ थे। आते-जाते एक रोज़ उनकी नज़र भूरीबाई की कलाकृतियों पर पड़ गई। उन्हें जैसे कोई कच्चा पत्थर हाथ लग गया, जो हीरा हो सकता था। बस, निखारने की जरूरत थी। लिहाज़ा, उन्होंने उस ‘कंकर’ भूरी बाई की अँगुली थाम ली। उसे बड़ा वितान (Canmvas) दिया। ताकि वह ईंट-गारा ढोने के काम से अधिक चित्रकारी पर ध्यान लगाने लगे। वे कुछ पैसे भी दिया करते थे। ताकि उसका हौसला ठंडा न पड़े। इस तरह उस बड़े ख़्वाब को गढ़े जाने के साथ-साथ ‘कंकर के शंकर’ बनने का भी सिलसिला शुरू हो चला। इसी बीच, वह ख़्वाब मुकम्मल हो आया। 

तारीख़ 13 फरवरी 1982, जब हिन्दुस्तान की वज़ीर-ए-आज़म (प्रधानमंत्री) इन्दिरा गाँधी भोपाल के ‘भारत भवन’ का उद्घाटन कर रही थीं। ‘भारत भवन’, कला, संगीत, साहित्य, संस्कृति की दुनिया के लोगों के लिए ‘काशी-काबे’ सी पाक जगह। वहीं, जलसे के दौरान, स्वामीनाथन ने भूरी बाई को इन्दिरा गाँधी के पास भेजा। किसी ख़त के साथ। लेकिन वे वह ख़त दे नहीं पाईं उन्हें। 

हालाँकि, स्वामीनाथन ने अपना काम अधूरा नहीं छोड़ा। वे उस ‘कंकर’ को तराशते रहे। उसे मौके देते रहे। आगे बढ़ाते रहे। और ख़ुशकिस्मती से ये सिलसिला तब भी न रुका, जब दो साल बाद 1984 में स्वामीनाथन दुनिया को अलविदा कह गए। उनका अधूरा काम प्रदेश और देश के जाने-माने साहित्यकार डॉक्टर कपिल तिवारी ने पूरा किया। वक़्त गुजरता रहा। ‘कंकर’ तराशा जाता रहा। वह आहिस्ता-आहिस्ता ‘शंकर’ होता रहा। 

और फिर तारीख़-ए-मक़ाम 13 फरवरी 2021, वक्त : शाम छह, साढ़े छह के आस-पास। मौका : ‘भारत भवन’ की सालगिरह का। मंच पर भूरी बाई ‘मुख्य अतिथि’ बनी बैठी हैं। माइक से गूँजती एक लरज़दार आवाज़ उनका तआरुफ़ (परिचय) करा रही है… ‘देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान में से एक पद्मश्री से सम्मानित चित्रकार भूरी बाई…’ साथ में इसी तरह के तआरुफ़ के साथ, उसी जगह बआसन्द हैं, डॉक्टर कपिल तिवारी भी। तआरुफ़ के हर लब्ज़ के साथ हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँजा जाता है। और वहीं, उतनी ही पुरअसर ख़ामोशी से, सैकड़ों आँखों से क़तरा-क़तरा आँसू लुढ़कते जाते हैं। 

——
(साभार ली गई तस्वीर में : डॉक्टर कपिल तिवारी और भूरी बाई। इन्हें 2021 में एक साथ पद्मश्री से सम्मानित किया गया है।)

सोशल मीडिया पर शेयर करें
Apni Digital Diary

Share
Published by
Apni Digital Diary

Recent Posts

56 साल के ‘युवा’ सत्ता के लिए आग भड़का रहे और 28 साल के देश को नई ऊँचाई दे रहे!

अभी सोमवार, 20 जुलाई को संसद का मॉनसून सत्र शुरू हुआ। इससे कुछ समय पहले… Read More

4 hours ago

वंदेमातरम

जय जय श्री राधे Read More

1 day ago

‘सरल भक्तमाल’- 11..: तर्क कोई कितने भी दे, वैष्णव भक्ति के मूल सम्प्रदाय तो चार ही हैं!

कलि युग में भक्ति मार्ग पाखण्ड से घिरा रहता है, इसलिए भगवान के भजन-पूजन, नाम… Read More

3 days ago

फिल्म ‘थ्री इडियट’ के फुनसुक वाँगड़ू नहीं हैं सोनम वाँगचुक, फिर भी ऐसा प्रचार क्यों?

शिक्षा प्रणाली में मूलभूत सुधार और केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की माँग… Read More

4 days ago

केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा मण्डल ने अंग्रेजी को ‘विदेशी भाषा’ कह दिया, तो हाय-तौबा क्यों?

भाषा को लेकर बेवजह की हाय-तौबा मची हुई इन दिनों। वजह वही, पीढ़ियों से भारतीय… Read More

5 days ago

जिन्हें सच्ची खुशी की तलाश, वे आईआईटी प्रवेश परीक्षा में जानबूझकर फेल भी हो जाते हैं!

जिन्दगी अपनी है, चुनाव भी अपने ही होते हैं। ऐसा अक्सर कहा जाता है। लेकिन… Read More

6 days ago