मुख्यमंत्री के काफिले की गाड़ियों में पानी-डीजल भर दिया! सोचिए आम आदमी का हाल!

टीम डायरी

भ्रष्टाचार का स्तर क्या हो सकता है, इस सूचना से उसका अन्दाजा लगाइए। मध्य प्रदेश के रतलाम का मामला है। राज्य के मुख्यमंत्री मोहन यादव वहाँ शुक्रवार, 27 जून को एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आने वाले थे। लिहाजा, उनके काफिले के लिए 19 इनोवा गाड़ियाँ इन्दौर से बुलवाई गईं। रास्ते में इन गाड़ियों में डीजल भरवाने की जरूरत महसूस की गई, तो भारत पेट्रोलियम के एक फिलिंग स्टेशन पर सभी गाड़ियाँ रुकीं। पूरी टंकी डीजल भरवाया गया। पर इसके बाद कुछ गाड़ियाँ थोड़ी दूर जाकर बन्द पड़ गईं। जबकि कुछ फिलिंग स्टेशन से आगे ही नहीं बढ़ीं। स्टार्ट ही नहीं हुईं। गाड़ियाँ चूँकि मुख्यमंत्री के काफिले के लिए जा रही थीं, इसलिए तुरन्त उनके बन्द पड़ जाने की सूचना प्रशासन के उच्च स्तर तक पहुँचाई गई। आनन-फानन में स्थानीय पुलिस और प्रशासनिक अमले के साथ खाद्य सुरक्षा जाँच विभाग (खाद्य एवं औषधि प्रशासन) का दस्ता भी फिलिंग स्टेशन पहुँच गया।

मौके पर ही डीजल की गुणवत्ता की जाँच की गई, तो पता चला कि उनमें जो डीजल डाला गया था, उसमें पानी मिला हुआ था। इन गाड़ियों के चालकों में से ही एक शुभम परमार ने बताया, “भरे गए डीजल में लगभग आधा पानी मिला हुआ था।” जाहिर तौर पर इस मामले के सामने आने के बाद फिलिंग स्टेशन पर कार्रवाई हुई। उसे अगली कार्रवाई तक के लिए सील कर दिया गया है। फिलिंग स्टेशन के मालिक पर भी कार्रवाई होना तय है। उसकी तलाश की जा रही है। उधर, मुख्यमंत्री के काफिले के लिए दूसरी गाड़ियों का बन्दोबस्त भी कर लिया गया। इस तरह, हर काम एक निश्चित प्रक्रिया के तहत होता रहा। लेकिन इस सवाल का जवाब कहीं किसी तरफ से नहीं आया कि इस तरह के भ्रष्टाचार को स्थायी रूप से बन्द करने के लिए आखिर कोई कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे हैं? यह मामला मुख्यमंत्री से जुड़ा हुआ था, इसलिए तुरत कार्रवाई हो गई, लेकिन आम आदमी का क्या? 

आम आदमी ताे इस तरह के भ्रष्टाचार से रोज ही दो-चार हो रहा है। उसके बर्बाद होने वाले पैसों की किसी को चिन्ता क्यों नहीं?  यहाँ तक कि उसकी जान की भी किसी को परवा क्यों नहीं, जो ऐसे भ्रष्टाचार के कारण कभी भी, कहीं भी चली जाती है? याद दिला दें कि अभी हाल ही में दिल्ली के मुंडका इलाके में पुलिस ने एक गोपनीय गोदाम पर छापा मारा था। वहाँ से हवाई जहाज के ईंधन की तस्करी की जा रही थी। वह भी बीते तीन साल से। इस दौरान लगभग 54 लाख लीटर ईंधन की तस्करी वहाँ से हो चुकी है। रोज 5,000 लीटर ईंधन चुराया जा रहा था। यानि महीने में 1.5 लाख लीटर। इस कारण सम्बन्धित तेल कम्पनी को हर महीने 1.62 करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ा। लेकिन जरा सोचें, कम्पनी इस नुकसान की भरपाई कैसे करेगी? आम आदमी की जेब से ही न? ईंधन की कीमतें बढ़ाकर, हवाई जहाज के टिकटों की कीमतें बढ़ाकर, इसी तरह के तरीकों से ही न?  

सोचिए, ऐसे मामलों पर कि भला किसी और भ्रष्टाचार की कीमत आम आदमी क्यों चुकाए? और हाँ, अगर नहीं सोचेंगे, ऐसे मामलों पर चुप्पी साधे बैठे रहेंगे, आवाज नहीं उठाएँगे, तो हमारी-आपकी छाती पर भ्रष्ट व्यवस्था और भ्रष्टाचारी लोग ऐसे ही मूँग दलते रहेंगे।

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Neelesh Dwivedi

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