350 करोड़ साल पुरानी अरावली पर ‘100 मीटर का ग्रहण’! तो क्या गोवर्धन पर्वत पर भी…?

टीम डायरी

अरावली, भारत की प्राचीनतम पर्वत श्रृंखलाओं में से एक। करीब 350 करोड़ साल की उम्र बताई जाती है इसकी। गुजरात के पालनपुर से शुरू होकर राजस्थान, हरियाणा से होते हुए दिल्ली तक लगभग 670 किलोमीटर का विस्तार है इसका। अतीत से लेकर वर्तमान तक इस पर्वत श्रृंखला का योगदान अपने आप में अनूठा है। पूर्व काल में राजपूताने को मुगल आक्रान्ताओं से बचाने के लिए ढाल यही पर्वत श्रृंखला बनी थी। राणा सांगा, महाराणा प्रताप, पृथ्वीराज चौहान जैसे वीर इसी अरावली की छत्रछाया में अपनी वीरता के आयाम गढ़ सके थे। आज भी यह पर्वत श्रृंखला थार के रेगिस्तान को उसकी हद में बाँधकर रखती है। उसे अपनी दूसरी ओर फैलने से रोकती है। इससे राजस्थान का एक बड़ा हिस्सा हरा-भरा रहता है। देश की राजधानी दिल्ली के मौसम-पर्यावरण को भी जो थोड़ी-बहुत प्राकृतिक सुरक्षा नसीब हो सकी है, वह भी इसी अरावली पर्वत श्रृंखला के कारण है। बावजूद इतनी एहमियत होने के,अरावली पर्वत श्रृंखला पर 100 मीटर का ग्रहण लग गया है। कैसे? इस बारे में आगे बताते हैं।

दरअस्ल, अरावली पर्वत श्रृंखला में वैध-अवैध खनन का खतरा लम्बे समय से मँडरा रहा है। अभी हाल ही में भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई) की रिपोर्ट के हवाले से आई सूचनाओं में बताया गया है कि दिल्ली से महज 80 किलोमीटर दूर ही राजस्थान के भिवाड़ी इलाके में अरावली की पहाड़ियाँ लगभग पूरी गायब हो चुकी हैं। खनन माफिया ने इन्हें जड़ से खत्म कर दिया है। इन्हीं गतिविधियों को प्रबन्धित, नियमित करने के लिए भारत सरकार ने ‘अरावली पर्वत’ व ‘अरावली पर्वत श्रृंखला’ की परिभाषाएँ तय की हैं। इसके तहत “जमीन से कम से कम 100 मीटर ऊँचाई वाले हिस्सों को ही अरावली पर्वत या पहाड़ी माना जाएगा”। इसी तरह “निर्धारित ऊँचाई (100 मीटर) वाली दो या उससे अधिक पहाड़ियाँ, जो 500 मीटर के दायरे में आती हों, अरावली ‘पर्वत श्रृंखला’ के तहत गिनी जाएँगी।” हाल ही में देश के सर्वोच्च न्यायालय ने भी इन परिभाषाओं पर अपनी मुहर लगा दी है। इसके बाद निर्धारित परिभाषाओं के दायरे से बाहर आने वाले पूरे इलाके में खनन गतिविधियों को हरी झण्डी मिली है।

केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेन्द्र यादव की दलील है कि निर्धारित परिभाषाओं के दायरे से बाहर सिर्फ 0.19 फीसद हिस्सा ही अब खनन गतिवधियों के लिए उपलब्ध हो पाएगा। बाकी 99 प्रतिशत अरावली पर्वत श्रृंखला पूरी तरह सुरक्षित रहेगी। हालाँकि, पर्यावरण कार्यकर्ता इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं हैं क्योंकि उन्हें डर है कि राजस्थान और हरियाणा में अरावली के पर्वत ही नहीं, खनन गतिविधि से जमीन के नीचे का पानी, कई पुरातात्त्विक स्थल, जंगल, लगभग 100 गाँवों में रहने वाले लोग, आदि सब संकट में आ जाएँगे। और तो और देश की राजधानी दिल्ली भी गम्भीर पर्यावरणीय संकट में फँस जाएगी। इसीलिए उन सभी ने उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा है। इसमें आग्रह किया है कि वह अपने फैसले पर पुनर्विचार करें। यह अनर्थ रोकें।

तो यह हुई मुद्दे की बात, जो चौतरफा अलग-अलग पहलुओं से चल ही रही है। अलबत्ता, एक पहलू अब तक कहीं जिक्र में नहीं आया है। या कहना चाहिए कि प्रश्न, जिसे अब भी किसी ने उठाया नहीं है। वह ये कि पौराणिक और धार्मिक आस्था का केन्द्र गिरिराज गोवर्धन भी अरावली पर्वत श्रृंखला पर लगे ‘100 मीटर के ग्रहण’ की चपेट में आएगा क्या? क्योंकि यह पर्वत भी अरावली पर्वत श्रृंखला के बाहरी भाग का हिस्सा गिना जाता है? इन प्रश्नों का जवाब अभी किसी के पास नहीं है क्योंकि शायद इस तरफ ध्यान नहीं गया है। इसीलिए यह याद दिलाना उपयुक्त है कि उत्तर प्रदेश के ब्रज धाम में स्थित गोवर्धन पर्वत की ऊँचाई अधिकांश स्थलों पर 100 मीटर से कम है। और बलुआ पत्थर भी इसके कई हिस्सों में मिलता है, जिस पर खनन माफिया की निगाह रहती है।

लिहाजा, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और धार्मिक तथा पौराणिक विषयों पर हमेशा सचेत रहने वाले लोगों को इस दिशा में जरूर सोचना चाहिए। अन्यथा बाद में कहीं मामला और गम्भीर न हो जाए!!

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Neelesh Dwivedi

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