टीम डायरी
तंत्र हो या सेवा क्षेत्र, ‘सरकारी’ पर लोगों का भरोसा कम ही रहता है। इसके बजाय निजी क्षेत्र इन दोनों ही मामलों में लोगों के लिए भरोसेमंद साबित होता है। इसका अनुभव खुद सरकार को भी होने लगा है। इसका प्रमाण मिलता है भारतीय वायुसेना के लिए भारत में ही बन रहे विभिन्न श्रेणी के विमानों की आपूर्ति के प्रसंग में।
भारतीय वायु सेना के विमानों के बेड़े में बीीते कुछ सालों में खासी कमी आई है। वायुसेना को लड़ाकू विमानों की ही 42 स्क्वाड्रन की मंजूरी मिली हुई है। एक स्क्वाड्रन में 16 से 24 तक विमान होते हैं। इस हिसाब से मंजूरी के मुताबिक अगर लड़ाकू विमानों की संख्या लगाएँ तो 672 से 1,008 तक लड़ाकू विमान वायुसेना के पास होने चाहिए। लेकिन अभी हैं सिर्फ 29 स्क्वाड्रन। यानि 464 से 696 के बीच कुछ। इस कमी को दूर करने के लिए वायुसेना लंबे समय से संघर्ष कर रही है। यह संघर्ष इस तथ्य के साथ और मुश्किल हो रहा है कि सरकार चाहती है- भारत में बना रक्षा साज-ओ-सामान ही अधिक से अधिक भारतीय सेनाओं को मिले।
सरकार ने अपनी मंशा के अनुरूप ‘हाल’ (हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड) को वर्ष 2021 में 48 हजार करोड़ रुपए का ठेका दिया। उसे 83 तेजस एमके-1 ए लड़ाकू विमान बनाकर वायुसेना को देने थे। वर्ष 2026 तक की समय-सीमा तय थी। लेकिन अब तक एक भी विमान वायुसेना को नहीं मिला। इस बीच, सरकार ने पिछले साल सितम्बर में ‘हाल’ को 93 अन्य तेजस विमानों की आपूर्ति का ठेका दे दिया, 62,370 करोड़ का। इन ठेकों का काफी भुगतान भी हो गया। पर लड़ाकू विमान वायुसेना को नहीं मिले तो नहीं मिले। आखिर, झुँझलाकर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को ‘हाल’ से कहना पड़ा, “जितना कर पाओ उतना ही वादा करो।”
‘हाल’ ने पहले तर्क दिया कि उसने 18 विमान बना लिए हैं, लेकिन अमेरिकी कम्पनी ‘जीई’ (जनरल इलेक्ट्रिक) ने इंजनों की आपूर्ति नहीं की। इसलिए देर हो गई। पर कुछ समय पहले ‘जीई’ छह इंजनों की आपूर्ति भी कर दी। ये इंजन विमानेां में लग भी गए। इसके बावजूद ये छह लड़ाकू विमान भी वायुसेना को नहीं मिले क्योंकि उनमें तकनीकी और हथियारों के एकीकरण से जुड़ी कई कमियाँ बताई जाती हैं। उन कमियों को दूर करने से पहले वायुसेना ये विमान लेना नहीं चाहती। लेना चाहिए भी नहीं। लिहाजा, कवायद जारी है और इसका व्यावहारिक तौर पर प्रभावी नतीजा कब आएगा, किसी को पता नहीं है। मतलब ‘हाल’ अब तक बेहाल है।
निश्चित रूप से ‘हाल’ के इस ‘सरकारी’ रवैये का ही असर है कि सरकार को भी आखिर थक-हार कर फ्रांस की कम्पनी ‘डैसो’ की तरफ रुख करना पड़ा। उसके साथ 3.25 लाख करोड़ का अनुबंध हुआ है। वह 114 रफाल लड़ाकू विमान बनाकर भारतीय वायुसेना को देगी। इनमें से 90 भारत में बनेंगे। बाकी तैयार हालत में फ्रांस से आएँगे। फ्रांसीसी कम्पनी इन विमानों की तकनीक का भी बड़ा हिस्सा भारत को देगी, ऐसा बताया जा रहा है। कम्पनी इससे पहले तैयार हालत में 36 रफाल लड़ाकू विमान भारतीय वायुसेना को सौंप भी चुकी है। इतना ही नहीं, ‘डैसो’ के अलावा अन्य कम्पनियाँ भी अपने अनुबंधों की शर्तों को समय से पूरा कर रही हैं।
उदाहरण के लिए, यूरोप के चार देशों (फ्रांस, जर्मनी, स्पेन और ब्रिटेन) की मिली-जुली कम्पनी ‘एयरबस’। यह ‘टाटा’ समूह की कम्पनी के साथ मिलकर भारतीय वायुसेना के लिए परिवहन विमान बना रही है। उसे कुल 40 विमान बनाने हैं। करीब दो साल पहले अक्टूबर-2024 में वड़ोदरा, गुजरात में टाटा-एयरबस का मिला-जुला प्रतिष्ठान शुरू हुआ था। और 11 जून 2026 को इस प्रतिष्ठान से पहला सी-295 परिवहन विमान बनकर भी निकल आया। उसने परीक्षण उड़ान भी पूरी कर ली। इस पर शुक्रवार, 12 जून को केन्द्रीय नागरिक विमानन मंत्री राममोहन नायडू ने खुशी जताई है। स्वाभाविक है। समय पर काम होने से खुशी होती ही है।
अलबत्ता, इतनी सी बात ‘हाल’ जैसा ‘बड़ा सरकारी तंत्र’ समझ नहीं पा रहा है शायद। तभी तो वह अपने रक्षा मंत्री को झुँझलाहट दिला रहा है। और इस प्रसंग से आम जनता के सामने भी अपनी इस समझ को मजबूती देने का बहाना है कि जब ‘सरकारी’ सरकार पर ही भारी पड़ रहा है और वह ‘निजी’ की तरफ रुख कर रही है, तब वे यदि ऐसा करते हैं, तो फिर इसमें गलत क्या है? बताइए?
