टीम डायरी
हम अपने घरों की महिलाओं सै अक्सर कह दिया करते हैं, “तुम्हें काम ही क्या है? दिनभर घर में ही तो रहना है। घर के थोड़े-बहुत काम करने हैं। और बच्चों काे सँभालना है, इसमें क्या है?” मतलब वे दिनभर में घरों में जो कुछ भी करती हैं, उसकी हम कद्र तक नहीं करते, तो उसका मूल्य कैसे ही पहचानेंगे? लेकिन देश की शीर्ष अदालत ने घरेलू महिलाओं के कामों की सिर्फ एहमियत ही नहीं पहचानी है, बल्कि उसका मूल्य भी तय किया है।
न्यायाधीशों ने स्पष्ट कहा, “हमारे घरों की महिलाएँ सिर्फ घर नहीं सँभालतीं, बल्कि वे राष्ट्र-निर्माण में भी अपना योगदान देती हैं। सीधे शब्दों में कहें तो ‘घर सँभालने वाली महिलाएँ’ असल में ‘राष्ट्र- निर्माता’ हैं। उन्हें इसी रूप में मान्यता दी जानी चाहिए। हमारी नजर में, घर सँभालने वाली महिला को कमाने वाले सदस्यों पर निर्भर बताना अजीब बात है, जबकि असल में घर का कामकाज काफी हद तक उन्हीं पर निर्भर होता है।”
न्यायाधीशों के अनुसार, “समाज में महिलाओं का योगदान सिर्फ बच्चे पैदा करने भर का नहीं है, इससे कहीं ज्यादा है। वे मानव पूँजी का आकार देने में भी अहम भूमिका निभाती हैं। इसी पर दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने जैसे कई सपने टिके होते हैं। घर सँभालने वाली महिलाएँ बच्चों की पहली शिक्षक होती हैं। बच्चों के व्यक्तित्त्व में सामाजिक मूल्यों, व्यवहार और रिश्तों को आकार देने में उनकी ही भूमिका मुख्य होती है।”
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों का उल्लेख करते हुए न्यायाधीशों ने कहा, “महिलाएँ जो काम घरों में करती हैं, उनसे भारत के कुल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 15-17% का योगदान होता हे। फिर भी उनके काम को न तो कोई मान्यता मिलती है और यहाँ तक कि उन्हें इसके एवज में कोई भुगतान तक नहीं मिलता।” इस टिप्पणी के साथ अदालत ने घर पर रहने वाली महिलाओं के घरेलू काम-काज का सम्मानजनक मूल्य भी तय कर दिया। यह 30,000 रुपए महीना माना गया। इसमें हर तीन साल में 10% वृद्धि हो, ऐसा भी कहा है।
यह विषय दरअसल, दुर्घटना-बीमा से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान सामने आया। पक्षकार का परिवार साल 2001 में दुर्घटना का शिकार हुआ था। इसमें उनकी पत्नी का निधन हो गया। वे और तीन बच्चे परिवार में उनके पीछे रह गए। दुर्घटना से सम्बन्धित बीमा-दावे के मामले में पीड़ित पक्ष बीमा कम्पनी के रवैए से संतुष्ट नहीं हुआ और अदालत में उसने उसके खिलाफ याचिका लगा दी। मामला पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय तक पहुँचा, जहाँ से 2024 में पीड़ित परिवार के पक्ष में फैसला आया। बीमा कम्पनी को अदालत ने आदेश दिया कि वह इस परिवार को आठ लाख रुपए का मुआवजा दे। इस आदेश के खिलाफ मामला शीर्ष अदालत में पहुँचा था।
शीर्ष अदालत में नए सिरे से मुआवजे की गणना हुई। इसके अनुसार बीमा कम्पनी को आदेश दिया गया है कि वह पीड़ित पक्ष को 62.77 लाख रुपए की मुआवजा राशि का भुगतान करे। साथ ही भविष्य के लिए, घरेलू महिलाओं से जुड़े ऐसे सभी मामलों में बीमा राशि की नई मद दुर्घटना-बीमा से जुड़े दस्तावेज में शामिल की जाए। संबंधित राशि कम से कम 30,000 रुपए मासिक (दुर्घटना में निधन से बीमा-राशि के भुगतान तक की अवधि) के हिसाब से हो और हर तीन साल में इसमें 10 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की जाए।
