₹ 3 की सिरिंज 30 में, ₹ 6 की कैनुला 120 में…निजी अस्पतालों की ये मनमानी रुकेगी अब?

टीम डायरी

शीर्षक में जो लिखा है, वह उम्मीद तो है ही, सवाल भी है। उम्मीद इसलिए क्योंकि भारी मुनाफा कमाने के मकसद से निजी अस्पतालों द्वारा की जाने वाली मनमानी लगातार बढ़ती जा रही है। आम आदमी इससे त्रस्त है। लेकिन कोई कुछ करने या कर पाने की स्थिति में नहीं दिखता क्योंकि चिकित्सा सुविधाएँ सबको अच्छी चाहिए और प्रतिस्पर्धी विकल्प ज्यादा हैं नहीं। बल्कि आपसी मिली-भगत से ही निजी अस्पतालों का धंधा चलता है। अलबत्ता, चाहते सब हैं कि इस पर लगाम लगे। सरकारें इस दिशा में बहुत कुछ कर सकती हैं, कभी करने का दिखावा करती हैं, थोड़ा कुछ करती भी हैं। लेकिन जल्दी वह किया-धरा सब गुड़-गोबर हो जाता है क्योंकि चिकित्सा सुविधाओं के बड़े कारोबारी सत्ता तंत्र को अपने हिसाब से नियंत्रित कर लेते हैं। इसीलिए ऊपर जो उम्मीद भरा शीर्षक है, उसमें प्रश्नचिह्न भी है। 

इस विषय पर आज बात इसलिए क्योंकि भारत सरकार के किन्हीं उच्च सूत्रों के हवाले से एक समाचार सार्वजनिक हुआ है। इसमें बताया जा रहा है कि केन्द्र सरकार निजी अस्पतालों की मनमानी रोकने की तैयारी कर रही है। इसके लिए चिकित्सा उपकरणों की कीमतों का उच्चतम बिन्दु तय कर दिया जाएगा। ताकि उससे अधिक राशि न वसूली जा सके। जैसे- निजी अस्पतालों में उन दस्तानों तक की कीमत भी मरीज के इलाज के बिल में जोड़ दी जाती है, जो चिकित्सक या उनके सहयोगी अपनी सुरक्षा के लिए मरीजों को देखने के दौरान पहनते हैं। और जोड़ी गई की कीमत कितनी होती है? इसके जवाब में मान लीजिए कि कोई दस्ताने अगर 10 रुपए के हैं, तो मरीज के बिल में इनकी कीमत 50-100 रुपए तक या इससे अधिक भी लिखी जा सकती है! जिस समाचार का जिक्र यहाँ किया जा रहा है, उसमें हालाँकि सिरिंज और कैनुला (बोतल वगैरा चढ़ाने के लिए नसों में लगाई जाती है) का उदाहरण दिया गया है। इसमें बताया गया है कि सिरिंज की कीमत आम तौर पर तीन रुपए होती है, लेकिन निजी अस्पताल मरीज के बिल मे इसकी कीमत लिखते हैं 30 रुपए। इसी तरह कैनुला होती है छह रुपए की, किन्तु मरीजों से इसकी कीमत वसूली जाती है 120 रुपए!

अब बताइए, ऐसी छोटी-छोटी चीजों पर इतनी भारी-भरकम कीमत जब वसूली जाती है, तो चिकित्सकों द्वारा किए गए विशेषज्ञ इलाज, उनकी सलाह, ऑपरेशन थिएटर, सघन चिकित्सा इकाई (आईसीयू), जीवनरक्षक उपकरणों (वेन्टिलेटर आदि),जैसी सुविधाओं मुहैया कराने पर कितना शुल्क लिया जाता होगा? इसीलिए तो निजी अस्पतालों में महज 12 से 24 घण्टों के इलाज का बिल भी लाखों रुपयों में बनता है। इलाज कराने वाले भी बेचारे मजबूर होते हैं, क्योंकि सरकारी अस्पतालों में अच्छी सुविधाएँ, उपकरण, चिकित्सा, आदि अव्वल तो मिलते नहीं और जब मिलते हैं तो ऐसे जैसे मरीज पर कोई एहसान किया जा रहा हो। क्यों? क्योंकि वहाँ सरकारी मदद से कम पैसे में आम आदमी को चिकित्सा सुविधा मिलती है। इसीलिए वहाँ पहुँचने वाले मरीजों को सम्मानजनक व्यवहार तथा प्रतिक्रिया मिलेगी, इस पर सवाल रहता है। 

बहरहाल, अब अगर सार्वजनिक हुए समाचार को सच मान लें तो केन्द्र सरकार अगले कुछ महीनों में इंतजाम करेगी कि निजी अस्पताल तीन रुपए की सिरिंज के 30 रुपए न वसूल सकें। अधिकतम 10-15 रुपए तक कीमत ठहरे। बताते हैं कि ऐसा बंदोबस्त हर तरह के उपकरणों, सुविधाओं पर किया जाने वाला है। सरकार इस बाबत सभी पक्षों से बात कर रही है। इसमें चिकित्सा क्षेत्र के विशेषज्ञ, अस्पतालों के संचालक, बीमा कंपनियाँ, आादि शामिल हैं। ऐसे में उम्मीद कर सकते हैं कि कोई सकारात्मक रास्ता निकल आएगा। जनता के हित से जुड़े किसी बन्दोबस्त पर सहमति बन जाएगी। और निजी अस्पतालों का लाखों का बनने वाला बिल आधा हो सकेगा। अलबत्ता, जब तक ऐसा हो नहीं जाता, सवाल वही कायम है कि क्या वाकई ऐसा होगा? या यह सिर्फ एक सुखद सपना ही साबित होगा? 

सोशल मीडिया पर शेयर करें
Neelesh Dwivedi

Share
Published by
Neelesh Dwivedi

Recent Posts

56 साल के ‘युवा’ सत्ता के लिए आग भड़का रहे और 28 साल के देश को नई ऊँचाई दे रहे!

अभी सोमवार, 20 जुलाई को संसद का मॉनसून सत्र शुरू हुआ। इससे कुछ समय पहले… Read More

2 hours ago

वंदेमातरम

जय जय श्री राधे Read More

1 day ago

‘सरल भक्तमाल’- 11..: तर्क कोई कितने भी दे, वैष्णव भक्ति के मूल सम्प्रदाय तो चार ही हैं!

कलि युग में भक्ति मार्ग पाखण्ड से घिरा रहता है, इसलिए भगवान के भजन-पूजन, नाम… Read More

3 days ago

फिल्म ‘थ्री इडियट’ के फुनसुक वाँगड़ू नहीं हैं सोनम वाँगचुक, फिर भी ऐसा प्रचार क्यों?

शिक्षा प्रणाली में मूलभूत सुधार और केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की माँग… Read More

4 days ago

केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा मण्डल ने अंग्रेजी को ‘विदेशी भाषा’ कह दिया, तो हाय-तौबा क्यों?

भाषा को लेकर बेवजह की हाय-तौबा मची हुई इन दिनों। वजह वही, पीढ़ियों से भारतीय… Read More

5 days ago

जिन्हें सच्ची खुशी की तलाश, वे आईआईटी प्रवेश परीक्षा में जानबूझकर फेल भी हो जाते हैं!

जिन्दगी अपनी है, चुनाव भी अपने ही होते हैं। ऐसा अक्सर कहा जाता है। लेकिन… Read More

6 days ago