सांकेतिक तस्वीर
टीम डायरी
ईरान और अमेरिका के बीच जारी सैन्य संघर्ष के दौरान जब पाकिस्तान ने आगे होकर शांति के लिए मध्यस्थता करने की पहल की तो दिल्ली में सर्वदलीय बैठक के बीच भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर से सवाल किया गया था। अन्य दलों के कुछ नेताओं ने उनसे जानना चाहा था कि हमेशा से “दुनिया में शांति के पक्षधर रहे भारत ने ऐसा कदम क्यों नहीं उठाया?” तब जयशंकर ने कहा था, “हम पाकिस्तान की तरह ‘दलाल देश’ नहीं हो सकते।” इस बयान की तब कई लोगों ने आलोचना की थी और कहा था कि भारत ने अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के मंच पर बड़ा मौका गँवा दिया है। पाकिस्तान ने वहीं दूसरी तरफ वह मौका लपक लिया और एक तरह से भारत के मुकाबले थोड़ा आगे हो गया है।
यह मार्च के महीने की बात है। हालाँकि, अब करीब एक महीने बाद यह मसला फिर से नए परिप्रेक्ष्य में सामने आया है। अलबत्ता, उस पर बात करने से पहले दो शब्दों के बीच के बारीक अंतर की ओर ध्यान देना जरूरी है। पहला- ‘मध्यस्थ’ और दूसरा- ‘दलाल’। इनमें ‘मध्यस्थ’ वह है, जो दो पक्षों के बीच आपसी सहमति से नियुक्त होता है और दोनों पक्षों के साथ निष्पक्षता से संवाद करता और कराता है। इस तरह उन्हें ऐसे बिन्दु पर ले जाने की कोशिश करता है, जहाँ दोनों में से किसी को यह न लगे कि उन्हें दबा दिया गया या उनकी उपेक्षा की गई। बल्कि आपसी समझौते से उन्हें राहत मिले। ऐसे मध्यस्थ दो पक्षों के बीच एक ही होता है। वहीं दूसरी तरफ, ‘दलाल’ वह जो सिर्फ अपने पक्ष की शर्तों पर बातचीत करता है। उन्हें मनवाने की कोशिश करता है। या यूँ कहें कि अपने ‘मालिक के लिए सौदेबाजी कर उसे अधिक लाभ दिलाने का प्रयास’ करता है। आम तौर पर कारोबारी सौदे ऐसे ही दलालों के जरिए किए जाते हैं।
तो अब आते हैं, ताजा मुद्दे पर। चूँकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प मूलभूत रूप से कारोबारी हैं। अमेरिका और दुनिया के अन्य देशों में उनका कारोबार (ट्रम्प ऑर्गनाइजेशन के नाम से) फैला हुआ है। ऐसे में, वह किसी राजनेता या राजनयिक की तरह शायद नहीं सोच पाते होंगे, ऐसी अब आम धारणा बनने लगी है। और इस धारणा को उन्होंने ईरान के साथ संघर्ष, संघर्ष-विराम, तमाम धमकियाँ, साथ में शांति-वार्ता, आदि की अपनी नौटंकी के साथ लगातार मजबूत ही किया है। लिहाजा, यह भी अब स्पष्ट होता जा रहा है कि उनका हर कदम, हर निर्णय, अपने कारोबारी मुनाफे की गरज से प्रेरित होता है। ईरान से चल रहे झगड़े के पीछे भी संभवत: यही सब हैं। और अपना मुनाफा पुख्ता करने के लिए उन्होंने ‘कारोबारी बुद्धि’ लगाकर पाकिस्तान की सरकार, खासकर वहाँ के फेल्ड (चाहें तो फील्ड भी पढ़ सकते हैं) मार्शल आसिम मुनीर को अपने दलाल के रूप में चुना है। यह बात ईरान को भी समझ आ गई है।
इसके दो प्रमाण हैं। पहला- इसी महीने ट्रम्प ईरान को धमकी दे रहे थे कि वहाँ बम (संभवत: परमाणु) गिराकर पूरी की पूरी ईरानी सभ्यता नष्ट कर दी जाएगी। इसके लिए उन्होंने अंतिम समय सीमा भी तय कर दी थी। तब तक, अगर ईरान नहीं झुका तो भयंकर सैन्य कार्रवाई किए जाने का संकेत दिया था। फिर तभी, यह समय-सीमा समाप्त होने से ठीक चंद मिनट पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ ने ‘एक्स’ पर घोषणा कर दी कि अमेरिका-ईरान दो सप्ताह के युद्ध-विराम पर सहमत हो गए हैं। लेकिन यहाँ उनसे एक गलती हो गई। उन्होंने पहली बार जो संदेश सार्वजनिक किया, उसके ठीक शुरू में ‘मसौदा’ (ड्राफ्ट) लिखा रह गया। हालाँकि, जल्दी ही उनकी ओर से गलती सुधार ली गई और यह शब्द हटाकर संदेश फिर से डाला गया। लेकिन तब तक यह स्पष्ट हो गया था कि उनका संदेश किसी और ने लिखा था (संभवत: अमेरिका में)। उन्होंने उसे उठाकर ‘एक्स’ पर चिपकाया (कॉपी-पेस्ट) भर है।
दूसरा मामला तब सामने आया जब मुनीर ईरान गए। इस्लामाबाद में अमेरिका-ईरान के बीच पहले दौर की वार्ता विफल रहने के बाद वास्तव में अमेरिका द्वारा उन्हें ईरान भेजा गया था। ताकि वह अपने सैन्य संबंधों का उपयोग करें और ईरान के राष्ट्रपति तथा सैन्य नेतृत्त्व को अमेरिका से दूसरे दौर की समझौता वार्ता के लिए राजी करें। मुनीर ने यही किया भी, लेकिन अमेरिकी दलाल के जैसे। उन्होंने ईरान से अपनी तरफ से यह वादा कर दिया कि अमेरिकी नौसेना ने ईरानी बंदरगाहों की जो घेराबंदी की है, उसे हटा लिया जाएगा। इसके बाद अमेरिका युद्ध-विराम की अवधि बढ़ाने की घोषणा करेगा। दूसरे दौर की समझौता वार्ता इसके बाद ही शुरू होगी। ईरान ने ऐसा होने पर अपनी सहभागिता की सहमति दे दी। मुनीर ने अमेरिका को सूचना पहुँचा दी कि ईरान बातचीत के लिए राजी हो गया है। जबकि सच्चाई यह थी कि ईरान ने सशर्त सहमति दी थी। और अमेरिका ने तो ईरानी बंदरगाहों की घेराबंदी हटाने का कोई आश्वासन तक नहीं दिया था। उसने सिर्फ युद्धविराम की अवधि बढ़ाई। लिहाजा, ईरान भड़क गया और वार्ता से हट गया।
इस तरह ईरान के सामने यह बात स्पष्ट हो गई कि वास्तव में पाकिस्तान सिर्फ अमेरिका के लाभ को ही सुनिश्चित करना चाह रहा है। ईरान की शर्तों, उसकी माँगों के बारे में तो वह अमेरिका से बात तक नहीं कर रहा है। या शायद इस बारे में अमेरिका से बात करने की उसकी हैसियत ही नहीं है। लिहाजा, ऐसे दलाल पर भरोसा नहीं किया जा सकता। सो, अब ईरान ने साफ कह दिया है कि दूसरे दौर की बात तभी होगी, जब अमेरिकी नौसेना घेराबंदी हटा लेगी। साथ ही, उसकी अन्य शर्तें भी मानी जाएँगीं। अन्यथा कोई बातचीत नहीं होगी। यही नहीं, सोशल मीडिया पर डोनाल्ड ट्रम्प को बेइज्जत करने का सिलसिला भी ईरान की ओर से थमा नहीं है, बल्कि नए-नए तरीकों से यह जारी है। इससे इस मामले में पाकिस्तान की हालत उस श्वान की तरह हो गई दिखती है, जिसके गले में हड्डी फँसी हो।
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