आरएसएस, ‘कू क्लक्स क्लान’ और डोनाल्ड ट्रम्प… क्या इनमें कोई संबंध है?

टीम डायरी

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के सर-कार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले इन दिनों अमेरिका की यात्रा पर हैं। वहाँ पर उन्होंने हडसन इंस्टीट्यूट द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान आरएसएस के बारे में फैली भ्रान्तियों को दूर करने की कोशिश की। उन्होंने कहा, “पश्चिम में, खास तौर पर अमेरिका में, अक्सर आरएसएस की तुलना ‘कू क्लक्स क्लान’ से की जाती हे, जो सही नहीं है। इसी तरह भारत और हिन्दू समुदाय के बारे में कई तरह की भ्रान्तियाँ अमेरिका तथा पश्चिम के अन्य देशों में हैं। उन्हें दूर करने की जरूरत है।” 

होसबोले की बात में दो चीजें समझने की हैं। पहली- ये ‘कू क्लक्स क्लान’ क्या है? और दूसरी- क्या वाकई अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों में भारत, हिन्दू व आरएसएस के बारे में सही समझ की है? शुरू करते हैं, पहले सवाल के जवाब से। ‘कू क्लक्स क्लान’ असल में अमेरिका तथा अन्य पश्चिमी देशों में गोरे लोगों का आन्दोलन है। उनका अपना समुदाय है। यह समुदाय विशुद्ध नस्लवादी माना जाता है, जो अपने आप को अन्य सभी नस्लों से श्रेष्ठ समझता है। बाकियों को नीची नजर से देखता है। गोरे लोगों के इस आन्दोलन का पहला चरण अमेरिका में गृह युद्ध की समाप्ति के ठीक बाद 1866 में शुरू हुआ था। यह 1870 के दशक तक चला। जबकि दूसरे चरण में 1915 के दौरान यह आन्दोलन फिर से उभरा और अब तक लगातार जारी है, ऐसा माना जाता है।

ग्रीक (यूनानी या यवन) भाषा में एक शब्द है ‘काय क्लोस’। वह अमेरिका की अंग्रेजी में आकर हो गया- ‘कू क्लक्स’। इसका मतलब होता है, ‘सर्किल’, जिसका एक अर्थ है- कई मुहल्लों, गाँवों, कस्बों, आदि का समूह जो किसी काम के लिए नियत हो। जबकि ‘क्लान’ मतलब- कुल, कुटुम्ब या जनजाति। दोनों का मिलाकर अर्थ हुआ- एक खास जनजातीय समूह। तो जैसा पहले ही बताया- ‘कू क्लक्स क्लान’ सिर्फ गोरे लोगों को ही श्रेष्ठ मानते हैं। अन्य समुदायों से घृणा करते हैं। उन्हें अपमानित करने और उनके प्रति हिंसक बर्ताव से भी बाज नहीं आते। लिहाजा पश्चिम के देशों में अक्सर दूसरे समुदायों, नस्लों के विरुद्ध जो नफरती हिंसा (हेट क्राइम) फैलती है, उसका स्रोत ‘कू क्लक्स क्लान’ से ही माना जाता है, जिसमें हर स्तर के लोग शामिल हैं। 

दिलचस्प है कि ‘कू क्लक्स क्लान’ वाले लोग भारत और भारतवंशियों को यूँ तो अपने से निम्न ही समझते हैं, लेकिन जब वे भारत के भीतर की सामाजिक परिस्थिति पर निष्कर्ष निकालते हैं, तो हिन्दुओं को अपने जैसा ही मान लेते हैं। यानि उनके मुताबिक, भारत में हिन्दू भी एक तरह से ‘कू क्लक्स क्लान’ ही है, जो देश में रहने वाले अन्य समुदायों पर अपनी श्रेष्ठता थोपने की कोशिश करता है। उनके विरुद्ध हिंसात्मक कार्रवाइयाँ करता रहता है! चूँकि इसी क्रम में आरएसएस को हिन्दुओं का संगठन मानने की भी धारणा है, तो उसे भारतीय ‘कू क्लक्स क्लान’ का प्रतिनिधि समझने की बात आती है। यही भ्रान्ति होसबोले ने दूर की है। 

इसके बाद अब बात करें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की कि क्या वह भी ‘कू क्लक्स क्लान’ से प्रभावित हैं या उसके सदस्य हैं? तो इसका जवाब ‘हाँ’ हो सकता है। इसका एक प्रमाण बिल्कुल अभी-अभी का है। ट्रम्प ने एक दिन पहले ही सोशल मीडिया पर अपने आधिकारिक अकाउण्ट से एक पोस्ट साझा की है। इसमें ‘भारत, सहित कुछ देशों को ‘नर्क के गड्‌ढे’ बताया गया था।” सीधी भाषा में यह भी कह सकते हैं गंदी नालियों जैसे बजबजाते मुल्क। यद्यपि यह पोस्ट उन्होंने नहीं लिखी थी। वहाँ एक नामी रेडियो उद्घोषक हैं माइकल सावेज। उन्होंने यह पोस्ट लिखी थी, जिसे ट्रम्प ने आगे बढ़ा दिया। क्यों? क्योंकि निश्चित रूप से वह सावेज की बात से सहमत रहे होंगे। अलबत्ता, भारत के सख्त विरोध के बाद ट्रम्प ने यह पोस्ट हटा भी ली थी। 

लेकिन क्या इससे एक बात स्पष्ट नहीं होती कि भारत और भारतीयों को अमेरिका जैसे देशों पर भरोसा नहीं करना चाहिए? खास तौर पर अगर हम आत्मसम्मान के साथ दुनिया में सिर उठाकर रहना चाहते हैं तो? इस प्रश्न पर विचार जरूर कीजिएगा!  

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Neelesh Dwivedi

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