प्रतीकात्मक तस्वीर
ज़ीनत ज़ैदी, दिल्ली
कितना अच्छा होता कि
कोई उम्मीद अधूरी न होती
किसी के बदल जाने से तक़लीफ़ न होती
दुनिया में कोई जंग न होती
न ये ज़मी तेरी और मेरी होती
न फूल बिछड़ते पेड़ो से
न रंग उजड़ते फूलो के
तो कितना अच्छा होता।
कितना अच्छा होता कि
दिलो में नफ़रत न होके बस प्यार होता
हर लब पर अमन का पैगाम होता
होती न जात न कोई धरम होता
हमारी पहचान बस हमारा करम होता।
कितना अच्छा होता कि
उजड़ते न आशियाने बेज़ुबानों के
बिखरते न रिश्ते रूठ जाने से
घरो में ख़ामोशी का पहरा न होता
दिल में ख़ौफ़ लिए कोई चेहरा न होता।
कितना अच्छा होता कि
होता तो बस एक विश्वास
दुनिया को स्वर्ग बना देने की आस
अगर हो जाता ये सब सच तो सोचो ज़रा
कितना अच्छा होता।।
——
(ज़ीनत #अपनीडिजिटलडायरी के सजग पाठक और नियमित लेखकों में से है। दिल्ली के सूरजमलविहार स्कूल से 12वीं पढ़ाई करने के बाद अब उच्च शिक्षा के लिए क़दम बढ़ा रही हैं। इस उम्र में ही अपने लेखों के जरिए बड़े मसले उठाती है। अच्छी कविताएँ भी लिखती है।)
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