‘मदर्स डे’ : ये जो मैं थोड़ा सा इंसान हो सका हूँ, सब अम्मा का ही करम है!

दीपक गौतम, सतना मध्य प्रदेश

अम्मा नहीं जानतीं, ‘मदर्स डे’ क्या बला है! उन्हें तो बस चूल्हा-चौकी और गृहस्थी के खबार से ही फुर्सत नहीं है। उन्होंने पढ़ने की उम्र में किताबों से दुश्मनी कर ली। बस] इसीलिए घर-गृहस्थी और चूल्हा-चौकी में ही अपना जीवन होम कर दिया। उन्हें खुद की खबर भले न रहे, लेकिन हम सबकी खबर हमेशा रहती है। एक बात जो वह कभी नहीं भूलती कि क्या खाया और कब खाया। समय से खाया या नहीं खाया। यह हर उस शख्स के प्रति उनकी एक वाजिब चिन्ता होती है, जो घर से दूर है। इसका बड़ा कारण यह भी है कि अपना सारा जीवन उन्होंने सम्मिलित परिवार में रहकर परिवार की सेवा में ही खपाया है। महज 14 साल की थीं, जब ब्याह कर आईं। उस समय नानी जिन्दा थीं, तो उन्होंने कहा, “16 साल की उम्र में ही लड़की का दुसरता (पगफेरा- मायके जाकर दूसरी बार ससुराल लौटना) होगा।” हुआ भी वैसा ही।

अम्मा पढ़ी-लिखी नहीं हैं। जब भी इस विषय में बात होती है, तो कहने लगती हैं कि बचपन में उनके गाँव के स्कूल में किसी शिक्षक ने डंडा मार दिया था। वही डंडा उनकी आत्मा पर घाव कर गया। अम्मा कहती हैं कि बिना किसी गलती के उनको डंडा मार दिया गया। वह स्कूल के बगल में पानी पीने कुएँ पर गईं थीं, लेकिन माटसाहब ने कहा कि बगल के खेत में मिर्च तोड़ रही थी और उन्हें डंडा जड़ दिया। बस फिर क्या था, स्कूली किताबें और गाँव का स्कूल वहीं पीछे छूट गया। अम्मा जिन्दगी का ककहरा सीखते हुए आगे निकल आईं। मैं दावे से कह सकता हूँ कि उनका सीखा और सिखाया हुआ किसी किताब में नहीं मिलेगा। वह तो सिर्फ और सिर्फ जिंदगी की किताब में ही मिल सकता है।

नाना-नानी की लाड़ली थीं अम्मा। दो भाईयों के बीच में अकेली बहन थीं, तो न पढ़ने की जिद पूरी होती चली गई। घर में जबरिया पढ़ाने वाले शिक्षक लगाए गए, लेकिन मजाल की अम्मा अक्षर अभ्यास को तरजीह देतीं। उन्हें मार से नफरत थी और पहले हर पढ़ाने वाले शिक्षक गाहे-बगाहे एक दो चाँटे तो रसीद कर ही देते थे। बड़े मामा यानि अम्मा के बड़े भाई ने उन्हें पढ़ाने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने भी चनकटिया दिया। चाँटा मारने की उनकी इसी भूल ने अम्मा को पढ़ाई शब्द ही बिसरा दिया। अम्मा को पढ़ाई से नहीं मार खाने से चिढ़ थी। हालाँकि गिनती, दुनिया, ककहरा और थोड़ा-बहुत नाम लिखने का अभ्यास उन्हें है। चिठ्ठियों, लिफाफों और शादी के कार्ड वगैरा पर पिताजी का या उनका अपना लिखा नाम भी पढ़ लेती हैं। कभी हमने उन्हें हस्ताक्षर सिखाने की कोशिश की थी। वह भी सफल रही।

अम्मा,अब 64 साल की हो चली हैं। और सही मायने में कहूँ कि अब तक कायदे से अम्मा ने कभी ककहरा नहीं सीखा। लेकिन जिन्दगी की किताब को उनसे बेहतर कोई नहीं पढ़ सकता। मैं आज स्वभावतः जो भी हूँ, शायद थोड़ा-बहुत मनुष्य हो सका हूँ, तो अम्मा और चाची के बेहिसाब लाड़-प्यार की बदौलत। लापरवाह भी इसी लाड़ ने किया है और थोड़ी सी परवाह करना भी माताओं के ही बेहिसाब प्रेम की देन है। हे ईश्वर! सबके जीवन में अम्मा का ये लाड़ बना रहने देना। सारी मातृ शक्ति को प्रणाम है। 

अम्मा से ही सीखा है मैंने दोस्तों से लेकर प्रेमिकाओं तक सबको एक सरीखा प्यार लुटाना। दूसरों के दर्द में अपने आँसू बहाने का हुनर भी अम्मा की देन है। खुद भले कठिनाईयों और परेशानियों से झूझते रहो, लेकिन बात-बात पर झूठी ही सही पर एक मुस्कान हमेशा चेहरे पर सजाए रखना। ये जो मैं जानवर से थोड़ा सा इंसान हो सका हूँ, सब अम्मा का ही करम है। फिर भी अब तलक बहुत कुछ सीखना बाकी रह गया है, क्योंकि अम्मा जिन्दगी की किताब हैं। उन्हें पढ़कर सीख पाने में शायद ये जन्म चुक जाएगा। मैं धनी हूँ कि मुझे अम्मा का लाड़ तीनों भाईयों में सबसे ज्यादा मिला। किस्मत वाला भी हूँ कि अब जब उम्र के चौथे दशक की ओर बढ़ रहा हूँ, तो मुझे अम्मा का लाड़ औरों की तरह केवल वीडियो कॉल पर नहीं बल्कि सदृश्य, जब चाहता हूँ, तब मिल जाता है। इसके लिए ईश्वर का धन्यवाद।

आज घर की कच्ची रसोई पर बैठकर जब कलेबा करते हुए यह सब लिख रहा हूँ, तो अम्मा झाड़ू बुहारते हुए कह रही हैं, “बेटा उठ बैठ। मोबाइल मा न घुसे रौ। जा देख आपन काम निपटाव। नहीं ता सतना जांय खाँ अबयार होई जई”। तो मैं अब लिखना बन्द कर रहा हूँ। उन सभी महिलाओं को ‘‘हैप्पी मदर्स डे’  जिन्होंने बहन, दोस्त, प्रेमिका, काकी, भाभी या और दूसरे रूपों में मुझ जैसे बिगडैल, बेपरवाह और आवारा इंसान को थोड़ा सा ही सही मनुष्य होने में मदद की है। लव यू ऑल। 

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(दीपक मध्यप्रदेश के सतना जिले के छोटे से गाँव जसो में जन्मे हैं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग से 2007-09 में ‘मास्टर ऑफ जर्नलिज्म’ (एमजे) में स्नातकोत्तर किया। मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में लगभग डेढ़ दशक तक राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, राज एक्सप्रेस और लोकमत जैसे संस्थानों में कार्यरत रहे। साथ में लगभग डेढ़ साल मध्यप्रदेश माध्यम के लिए रचनात्मक लेखन भी किया। इन दिनों स्वतंत्र लेखन करते हैं। बीते 15 सालों से शहर-दर-शहर भटकने के बाद फिलवक्त गाँव को जी रहे हैं। बस, वहीं अपनी अनुभूतियों को शब्दों के सहारे उकेर दिया करते हैं। उन उकेरी हुई अनुभूतियों काे #अपनीडिजिटलडायरी के साथ साझा करते हैं, ताकि वे #डायरी के पाठकों तक भी पहुँचें। ये लेख उन्हीं प्रयासों का हिस्सा है।) 

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