हादसे के जिम्मेदारों को ऐसी सजा मिलनी चाहिए थी, जो मिसाल बनती, लेकिन…

विजय मनोहर तिवारी की पुस्तक, ‘भोपाल गैस त्रासदी: आधी रात का सच’ से, 7/12/2021

फैसला सामने आते ही दोपहर बाद दिल्ली से लेकर भोपाल तक जानकारों की प्रतिक्रियाएं आने लगीं… 

25 साल (अब 37) से गैस त्रासदी के मामले से या तो बेखवर या तमाशे की तरह देख रहे नेताओं ने घड़ियाली आंसू बहाए। जांच एजेंसियों ने सरकारी किस्म के बयान दिए। गैस पीड़ित संगठनों ने अफसोस जताने की रस्म अदायगी की। 

केंद्रीय विधि मंत्री वीरप्पा मोइली ने दिल्ली में कहा कि इंसाफ को दफना दिया गया है। इस तरह के मामलों की त्वरित गति से सुनवाई और उचित जांच सुनिश्चित करने की जरूरत है। यह इस तरह का मामला है, जिसमें न्याय में विलंब हुआ है और व्यवहारिक तौर पर न्याय नहीं दिया गया है। यह दोहराया नहीं जाना चाहिए। ऐसे में मामलों में विलंब पर अंकुश लगाने के लिए क्या सरकार कदम उठाएगी? इस सवाल पर वीरप्पा मोइली ने कहा कि हां, कदम उठाएंगे। 

सीबीआई ने फैसले को अपनी जीत बताते हुए कहा कि उसकी ठोस जांच के कारण ही सात लोगों को सजा हुई। सीबीआई के प्रवक्ता हर्ष भाल ने दिल्ली में कहा कि जांच एजेंसी ने वॉरेन एंडरसन को भगोड़ा साबित करने के अलावा अमेरिका जाकर सबूत इकट्ठे किए। जांच में पाया गया कि कारखाने में डिजाइन संबंधी गंभीर खामियां थीं। साथ ही कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों ने लापरवाही बरती, जिससे हजारों लोग मारे गए। हालांकि सीबीआई यह मानने को तैयार नहीं है कि मुकदमे की धाराएं कमजोर थीं। 

भोपाल में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को अब जाकर लगने लगा है कि औद्योगिक दुर्घटनाओं में दोषियों को सजा दिलाने में वर्तमान कानून नाकाफी है। वे कह रहे हैं कि कानून में संशोधन करने या नए कानून बनाने के लिए केंद्र से आग्रह करेंगे। गैस त्रासदी के मामले में 26 साल बाद फैसला आया है, जो न्याय की जन अपेक्षाओं को ठेस पहुंचाने वाला है। इस जैसे बड़े अपराधों में सजा भी वाजिब होना चाहिए। 

गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन के अब्दुल जब्बार (अब दिवंगत) ने कहा कि जिस धारा में केस चला उसको लेकर शुरू से ही हम संतुष्ट नहीं थे। चूंकि भोपाल गैस त्रासदी का फैसला इस तरह के मामलों में एक उदाहरण बनेगा, इसलिए सभी चाहते थे कि यह केस गैर-इरादतन हत्या की धारा में चले। सुनवाई के दौरान अपना पक्ष रखते हुए कहा भी गया था कि कोर्ट साक्ष्य आने पर धाराएं बढ़ा भी सकती है। हम सीबीआई से भी संतुष्ट नहीं हैं। फैसले का अध्ययन कर इसे चुनौती देंगे। 

गैस पीड़ित निराश्रित पेंशनभोगी संघर्ष मोर्चा के बालकृष्ण नामदेव ने कहा कि फैसले से हम निराश हैं। गंभीर धाराओं में प्रकरण बनना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। केंद्र सरकार की नीतियां बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हिसाब से हैं, शायद इसी वजह से केंद्र सरकार ने भी इस मामले में धाराएं बढ़ाने में कोई रुचि नहीं ली। 

गैस पीड़ित संघर्ष मोर्चा की साधना कर्णिक कह रही हैं कि सीबीआई और केंद्र सरकार ने भोपाल गैस त्रासदी के सही तथ्यों को कोर्ट में नहीं रखा। कोर्ट में सीबीआई ने जो आंकड़े पेश किए वे गलत हैं। सही आंकड़े कोर्ट को दिए जाने पर गैस पीड़ितों को न केवल ज्यादा मुआवजा बनता, बल्कि आरोपियों की सजा भी ज्यादा होती। 

भोपाल ग्रुप फॉर इन्फॉर्मेशन एंड एक्शन के सतीनाथ षड़ंगी ने कहा कि एक बात साबित हो गई है कि बहुराष्ट्रीय कंपनी हजारों लोगों को मौत की नींद सुलाने के बाद मामूली जुर्माना देकर जेल जाने से बच सकती हैं। 

वकील साधना पाठक ने कहा कि जिन धाराओं में मुकदमा चला उसमें जितनी अधिकतम सजा दी जा सकती थी, उतनी कोर्ट ने दी है। धारा 304ए में मुकदमा चलना ही दुर्भाग्यपूर्ण था। 

महिला पुरुष संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष एम. इरफान का ख्याल है कि इस तरह के फैसले की उम्मीद नहीं थी। फैसले को एक मजाक बनाकर रख दिया गया है। कई सालों बाद भी गैस पीड़ितों के हाथ निराशा ही लगी है। 

गैस पीड़ित महिला स्टेशनरी कर्मचारी संघ की अध्यक्ष रशीदा भी कहा कि गैस पीड़ितों के साथ मजाक किया गया है। 25 सालों से अपने अधिकार की लड़ाई लड़ रहे गैस पीड़ितों को ठेंगा दिखाया गया है।

जयप्रकाश ने कहा कि हम हाईकोर्ट में अपील दायर करेंगे। इस मामले में मुजरिमों को आईपीसी की धारा 304 के तहत सजा होनी हिए थी।

अपने पति और दो बेटों को गैस हादसे में खोने वाली विधवा कॉलोनी की कुसुमबाई त्यागी ने कहा कि हादसे के जिम्मेदार गुनहगारों को दो साल की सजा बहुत कम है। हजारों मौत के कुसूरवारों को मौत से कम के को सजा नहीं होनी चाहिए थी। 

जेपी नगर गली नंबर सात की गफरुन्निसा ने भी अपने पति और दो बेटों को गंवाया। उन्होंने कहा कि आज भी वो दर्द पर नहीं छोड़ता, जब हमारा घर तबाह हो गया। हम जिंदगी दूसरों के भरोसे काटने को मजबूर कर दिए गए। हादसे के जिम्मेदारों को ऐसी सजा मिलनी चाहिए थी, जो मिसाल बनती, लेकिन…। 

यह सच है कि भारतीय दंड विधान की जिन धाराओं में यह मामला इस अदालत में चल रहा था, उसमें अधिकतम यही सजा होनी थी। नया यह था कि सजा सुनाने की अदालती खानापूर्ति हो गई थी, बस। लगभग सभी अखबारों में कवरेज कुछ इस अंदाज में हुआ, जैसे यह सब अचानक हो गया हो। इतने गंभीर हादसे के आरोपी उद्योगपतियों और यूनियन कार्बाइड के पदाधिकारियों को कोई सजा नहीं हुई। कानून एक मजाक बन गया। 

मीडिया में फैसले की जमकर आलोचना हुई। इसे कुछ इस तरह पेश किया गया जैसे जज ने जानबूझकर सिर्फ दो साल की सजा देकर 15,000 बेकसूर लोगों के हत्यारों को इतने सस्ते में निपटा दिया। जबकि ऐसा था नहीं। कानून के दायरे में सीजेएम ने वहीं किया जो कोई दूसरा जज करता। वे अंग्रेजों के जमाने में बनी आईपीसी की धाराओं में बहते हैं और वहीं पहुंचते हैं, जहां ये सड़ी-गली बदबूदार धाराएं ले जाती हैं। इसमें इंसाफ के प्रति उनकी अपनी तड़प, संवदेनशीलता और बुद्धि विवेक के इस्तेमाल की ज्यादा गुंजाइश नहीं है। इसे ही वे इंसाफ कहते हैं। जबकि यह उनकी नौकरी है, इसमें न्याय के प्रति प्रतिबद्धता का सवाल ही नहीं है। हालांकि कुछ स्पष्टवादी जज यह भी मानते हैं कि वे तो हर तीन साल में होने वाले तबादलों के बीच इस या उस अदालत में बैठकर सिर्फ पहले से लंबित मामले ही निपटाते हैं, इंसाफ नहीं करते।।
(जारी….)
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(नोट : विजय मनोहर तिवारी जी, मध्य प्रदेश के सूचना आयुक्त, वरिष्ठ लेखक और पत्रकार हैं। उन्हें हाल ही में मध्य प्रदेश सरकार ने 2020 का शरद जोशी सम्मान भी दिया है। उनकी पूर्व-अनुमति और पुस्तक के प्रकाशक ‘बेंतेन बुक्स’ के सान्निध्य अग्रवाल की सहमति से #अपनीडिजिटलडायरी पर यह विशेष श्रृंखला चलाई जा रही है। इसके पीछे डायरी की अभिरुचि सिर्फ अपने सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक सरोकार तक सीमित है। इस श्रृंखला में पुस्तक की सामग्री अक्षरश: नहीं, बल्कि संपादित अंश के रूप में प्रकाशित की जा रही है। इसका कॉपीराइट पूरी तरह लेखक विजय मनोहर जी और बेंतेन बुक्स के पास सुरक्षित है। उनकी पूर्व अनुमति के बिना सामग्री का किसी भी रूप में इस्तेमाल कानूनी कार्यवाही का कारण बन सकता है।)
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श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ 
3. फैसला आते ही आरोपियों को जमानत और पिछले दरवाज़े से रिहाई
2. फैसला, जिसमें देर भी गजब की और अंधेर भी जबर्दस्त!
1. गैस त्रासदी…जिसने लोकतंत्र के तीनों स्तंभों को सरे बाजार नंगा किया!

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