फैसला आते ही आरोपियों को जमानत और पिछले दरवाज़े से रिहाई

विजय मनोहर तिवारी की पुस्तक, ‘भोपाल गैस त्रासदी: आधी रात का सच’ से, 5/12/2021

हादसे के बाद सात दिसंबर 1984 को एंडरसन भोपाल आया था। हनुमानगंज थाना पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया। वह 25 हजार के मुचलके पर रिहा कर दिया गया। मुचलके की भाषा गोखले ने एंडरसन को पढ़कर सुनाई थी। इसके बाद एंडरसन ने उस पर दस्तखत किए थे। फिर उसे सरकारी विमान से दिल्ली रवाना कर दिया गया। 25 साल (अब 37) बीत गए हैं। इस बीच दुनिया बदल चुकी है। लेकिन हादसे के पीड़ितों के लिए वक्त वहीं ठहर गया। जिंदगी एक बोझ बन गई, जिसे वे अब तक ढो रहे हैं।…

इनमें से एक रानी नीलोफर हैं, जिनके मां-बाप जहरीली गैस से मारे गए। हादसे के वक्त रानी डेढ़ साल की थी। उसके अम्मी-अब्बा जिंदगी से आजाद होने के बाद अब तस्वीरों और उसकी यादों में कैद हैं। हाऊसिंग बोर्ड कॉलोनी के 48 साल के मोहम्मद अनीस के घाव भी हरे हैं। भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर में लंबे इलाज के बाद डेढ़ साल पहले ही उनके बड़े भाई हनीफ अल्लाह को प्यार हुए हैं। हनीफ का बेटा रोजी-रोटी कमाने की जद्दोजहद में है। छोटे भाई को दिमागी हालत ठीक नहीं है। खुद अनीस चाय की गुमटी चलाते हैं। तीस साल के राजा मियां मिनी बस चलाते हैं। हादसे के छह महीने बाद ही उनके पिता की मौत हो गई। राजा को बचाने के लिए उनकी मां ने हादसे के समय उन्हें एक गीले बोरे में लपेट दिया था।…. इस वक्त राजा मियां कह रहे हैं कि अब किसी को सजा मिले या न मिले, हमें क्या फर्क पड़ता है। मुलजिम वे हैं, लेकिन इधर सजा तो हम भुगत रहे हैं। इससे बड़ी और क्या सजा उन्हें अदालत दे सकती है?…

हर बार की तरह एक ही सवाल कई दिनों तक भीतर घुमड़ता रहा था कि आखिर इनका कुसूर क्या है?… क्यों है और असल कुसूरवारों को सजा क्यों नहीं मिलती? क्या अंतहीन सुविधाओं के बीच ठाठबाट से रहते हुए कभी हमारी सरकार के मंत्रियों और अफसरों का दिल नहीं कचोटता? इसी भोपाल के एक हिस्से में यह नर्क रचा हुआ है ओर इसी भोपाल के श्यामला हिल्स, 45 बंगलों, 74 बंगलों, चार इमली, तुलसीनगर, टीटीनगर और शिवाजी नगर के शानदार सरकारी आवासों में सपरिवार आराम से रह रहे हैं। क्या लोकतंत्र के चारों स्तंभों के इन वैध-अवैध सुविधाभोगी कर्णधारों को ठीक से नींद आती होगी?…

हम अपने साफ सुथरे और सुविधा संपन्न घरों में व्यवस्थित जिंदगी गुजारते हुए कभी कल्पना भी नहीं कर सकते कि जिन लोगों ने गैस हादसे में अपनों को खो दिया और खुद बच गए, आज उनके हाल क्या हैं? वे क्या कर रहे हैं? उनके सपनों का क्या हुआ? चारदीवारी में उनकी सुबह कैसी होती हैं और शामें कैसी? जिंदगी जब अस्पताल, डॉक्टर, दवा और जांच पड़ताल के दायरे में ही घूमने लगती है तो क्या होता है?

मुझे लगता है कि गैस ने तो सिर्फ चंद घंटों में ही अपना काम कर दिया, लेकिन इन 25 सालों (अब 37)  में हमारी व्यवस्था ने उन्हें हर दिन मौत से बदतर बनाया है। बहरहाल…

….सीजेएम के रूप मोहन पी. तिवारी का यह आखिरी फैसला होगा, क्योंकि वे प्रमोट हो चुके हैं। फैसले के दूसरे दिन भोपाल अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (एडीजे) की कुर्सी संभालेंगे। बतौर जज, यह फैसला उनके पूरे करियर में सबसे अहम फैसलों में ऊपर होगा। जाहिर है, ऐसे मौके जजों को भी रोज नहीं मिलते, जब देश-दुनिया की निगाहें हों। इस वक्त वक्त सब उन्हीं तरफ टकटकी लगाए हैं।.. 

सुबह 11.15 बजे सीजीएम तिवारी डायस पर पहुंचे। उन्होंने आरोपियों के नाम बोले तो आरोपियों ने हाथ उठाकर उपस्थिति दर्ज कराई। एएसपी एके पांडे और 30 पीड़ित संगठनों से जुड़े लोगों के बीच प्रवेश को लेकर बहस शुरू हुई और हंगामे की स्थिति बन गई। इस बीच अंदर से खबर आई कि कोर्ट ने सभी आरोपियों को दोषी माना है। अचानक बाहर हलचल बढ़ गई। अंदर सजा पर जिरह शुरू हो चुकी है। बचाव पक्ष के वकीलों ने आरोपियों को कम से कम सजा का आग्रह किया। 

दोपहर 12.45 बजे बहस पूरी होने के बाद सीजेएम फैसला लिखवाने कक्ष में चले गए। तभी बाहर आकर एक वकील ने बताया कि सजा डेढ़ बजे सुनाई जाएगी। 

दोपहर 2.40 बजे सीजेएम ने आईपीसी की धारा 304 ए (लापरवाही से मौत) के तहत आठ आरोपियों को दोषी माना और दो-दो साल की कैद और एक लाख रुपए से अधिक के जुर्माने की सजा सुनाई। इसी धारा में यूनियन कार्बाइड पर पांच लाख रुपए जुर्माना किया गया। धारा 338 के तहत केशुब महिंद्रा समेत सातों आरोपियों को एक साल की जेल और एक-एक हजार रुपए जुर्माना। धारा 337 के तहत छह महीने की जेल और पांच सौ रुपए जुर्माना। धारा 336 के तहत तीन माह की जेल और ढाई-ढाई सौ रुपए जुर्माना। 85 साल के महिंद्रा फिलहाल महेंद्रा एंड महेंद्रा लिमिटेड के चेयरमैन हैं। एंडरसन को फरार घोषित कर उसका नाम फैसले में शामिल नहीं किया गया।

दोपहर 2.45 बजे सीजेएम सजा का एलान कर दोबारा अपने कक्ष में चले गए। सजा के बारे में पता चलते ही बाहर फिर मीडिया वालों की भागदौड़ तेज हो गई। इधर कोर्ट के अंदर आरोपियों के वकीलों ने जमानत के कागजात पहले से तैयार कर रखे थे, जो उन्होंने तत्काल पेश कर दिए। इसके साथ ही जुर्माने की राशि भी जमा कर दी। सजा मिलते ही सभी आरोपियों को 25-25 हजार रुपए की जमानत पर छोड़ दिया गया। तब तक कोर्ट रूम के बाहर जमा भीड़ छंट चुकी थी। कुछ लोग आरोपियों के बाहर निकलने के इंतजार में डटे रहे। 

फैसले की खबर अदालत के बाहर आने पर गैस पीड़ितों ने नारेबाजी करते हुए सरकार पर आरोप लगाने शुरू कर दिए। गैस पीड़ित फैसले से नाराज हैं। वह मामले को हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक ले जाने की चर्चा करते रहे। गुस्साई भीड़ के अदालत के अंदर दाखिल होने की कोशिश को पुलिस ने सफल नहीं होने दिया। 

आरोपियों को शाम करीब पांच बजे अदालत के पिछले गेट से रवाना किया गया। यहां भी पुलिस बल तैनात था। मीडिया ने आरोपियों को रोककर फैसले पर उनकी प्रतिक्रिया जाननी चाही लेकिन वह रुके नहीं और अपनी-अपनी गाड़ियों में सवार होकर तुरंत अदालत से निकल गए। मुझे लगता है कि अब इन सब सूरमाओं को पिछले दरवाजे से निकलने की जरूरत नहीं थी। उन्हें सीना तानकर अदालत के प्रवेश द्वार से ही निकलना चाहिए था। अब तो यह सिद्ध था कि उन्होंने कोई बड़ा गुनाह नहीं किया था। ठीक है, गलती हो जाती है। लापरवाही के लिए कितनी सजा दीजिएगा? रात गई बात गई। इन सबको मीडिया के सामने आना ही चाहिए था। ताकि दुनिया जानती तो कि न्याय व्यवस्था पर ये महानुभाव क्या फरमाते हैं? लेकिन पिछले दरवाजे से निकलना एक प्रतीक भी है। ऐसा चोर ही करते हैं।
(जारी….)
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(नोट : विजय मनोहर तिवारी जी, मध्य प्रदेश के सूचना आयुक्त, वरिष्ठ लेखक और पत्रकार हैं। उन्हें हाल ही में मध्य प्रदेश सरकार ने 2020 का शरद जोशी सम्मान भी दिया है। उनकी पूर्व-अनुमति और पुस्तक के प्रकाशक ‘बेंतेन बुक्स’ के सान्निध्य अग्रवाल की सहमति से #अपनीडिजिटलडायरी पर यह विशेष श्रृंखला चलाई जा रही है। इसके पीछे डायरी की अभिरुचि सिर्फ अपने सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक सरोकार तक सीमित है। इस श्रृंखला में पुस्तक की सामग्री अक्षरश: नहीं, बल्कि संपादित अंश के रूप में प्रकाशित की जा रही है। इसका कॉपीराइट पूरी तरह लेखक विजय मनोहर जी और बेंतेन बुक्स के पास सुरक्षित है। उनकी पूर्व अनुमति के बिना सामग्री का किसी भी रूप में इस्तेमाल कानूनी कार्यवाही का कारण बन सकता है।)
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श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ 
2. फैसला, जिसमें देर भी गजब की और अंधेर भी जबर्दस्त!
1. गैस त्रासदी…जिसने लोकतंत्र के तीनों स्तंभों को सरे बाजार नंगा किया!

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