अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 6/4/2021
भरत अपने ननिहाल से वापस अयोध्या पहुँचते हैं। अयोध्या में स्थितियाँ बहुत विकट थीं। एक तरफ राज सिंहासन प्रतीक्षा कर रहा था। दूसरी तरफ पिता की मृत्यु और अग्रज के वन गमन के दुःख से हृदय संतप्त था। किसका चयन करें। धर्मज्ञ भरत अपने कुल की मर्यादा के अनुरूप पुत्रधर्म के निर्वाह के बाद दलबल के साथ श्रीराम को मनाकर वापस लाने निकल पड़ते हैं। श्रीराम के पास पहुँचकर मनाने के क्रम में ऋषि जाबालि श्रीराम से कहते हैं, “आप व्यर्थ वन जा रहे हो। मृत्यु के साथ सभी सम्बन्ध समाप्त हो जाते हैं। अब दशरथ आप के पिता नहीं हैं, न आप उनके पुत्र (वाल्मीकिविरचित रामायण, अयोध्याकाण्ड, सर्ग-108 श्लोक-10)। इस लोक को छोड़कर अन्य कोई लोक नहीं है। आप व्यर्थ परलोक के लाभ के लिए आज का सुख त्याग रहे हैं (वाल्मीकिविरचित रामायण, अयोध्याकाण्ड, सर्ग-108, श्लोक-17)।”
महर्षि वाल्मीकि ने जाबालि को “ब्राह्मण-शिरोमणि” कहकर सम्बोधित किया है। और रामायण काल में यही जाबालि ऋषि चार्वाक या कहें कि नास्तिक दर्शन के पुरोधा रहे हैं। जिनका धर्मज्ञ श्रीराम सम्मानपूर्वक स्मरण करते हैं। जाबालि ने इस प्रसङ्ग में अपना मत नहीं, बल्कि चार्वाक दर्शन के आदि आचार्य वृहस्पति के मत को ही उद्धृत किया है। आचार्य बृहस्पति कहते हैं, “न स्वर्गो नापवर्गो नैवात्मा पारलौकिक।” न स्वर्ग है, न मोक्ष और न ही कोई परलोक है, जिसकी चिन्ता में आज के सुख को छोड़ दिया जाए। मृत्यु ही मोक्ष है। मृत्यु के बाद कुछ भी शेष नहीं रहता। न आत्म, न सम्बन्ध।
भारतीय संस्कृति के आधार वेद भी निरर्थकत्व की घोषणा तक कर देते हैं। आचार्य वृहस्पति एक स्थान पर कहते हैं कि यज्ञ, तप ,दान आदि कर्मकांड करना तो पौरूषहीन लोगों के कार्य हैं। इन वेदों को लिखने वाले धूर्त लोग होगें, जिन्होंने अपनी आजीविका चलाने के लिए लोगों को भरमाया है। “त्रयो वेदस्य कर्तारो भण्डधूर्तनिशाचरा:(सर्वदर्शनसंग्रह)।”
असल में भारतीय संस्कृति का यही सौन्दर्य है कि वह सभी के विचारों को सहज रूप से स्वयं में समाहित कर लेती हैं। आचार्य यास्क ने आचार्य कौत्स का नाम बड़े ही स्नेह से लिया है। आचार्य कौत्स वेद मंत्रों के निरर्थक होने की सप्रमाण घोषणा करते हैं। और विशेष बात ये कि इस तरह के जिन भी आचार्यों ने वेदविरूद्ध मान्यताओं की स्थापना की, उन सभी को सामान्य समाज में ही नहीं, अपितु विद्वत् समाज में भी सहज सम्मान प्राप्त था।
भारतीय संस्कृति विचारों की दृढ़ता से युक्त है। इसमें विचार-विरुद्ध का भी आदर है, न कि वैचारिक विरोधी के हत्या की कामना।
भारतीय संस्कृति एक तरफ अपने मत के प्रति दृढ़ता सिखाती है। वहीं दूसरी तरफ विरुद्ध-मत के प्रति उदरता। यही कारण है कि आचार्य बृहस्पति, चार्वाक, जाबालि आदि अपने विचारों का प्रसार सरलतापूर्वक कर सके। आचार्य चार्वाक के मत का दूसरा नाम “लोकायत” सम्भवतः इसी कारण पड़ा होगा। लोक=संसार, आयत=प्रसार। समस्त लोक में प्रसार इसीलिए लोकायत। यह प्रसार भारतीय संस्कृति के गुण समन्वय, सौहार्द और स्वतंत्रता के कारण ही हो पाया।
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(अनुज, मूल रूप से बरेली, उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। दिल्ली में रहते हैं और अध्यापन कार्य से जुड़े हैं। वे #अपनीडिजिटलडायरी के संस्थापक सदस्यों में से हैं। यह लेख, उनकी ‘भारतीय दर्शन’ श्रृंखला की पाँचवीं कड़ी है।)
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