पंडित रविशंकर, एक प्रेरक शख़्सियत, जिसने ‘ज़िन्दगी’ को थामा तो उसके मायने बदल दिए

नीलेश द्विवेदी, भोपाल, मध्य प्रदेश से 7/4/2021

पंडित रविशंकर आज 101 साल के हो गए। ऐसा इसलिए कहना ठीक है, क्योंकि उनके जैसे लोगों की सिर्फ़ देह ही दुनिया छोड़ती है। शख़्सियत यहीं रह जाती है, हमेशा के लिए। पर एक समय शायद ऐसा भी आया था, जब उनकी शख़्सियत ने इतना बड़ा आकार नहीं लिया था। उसके निर्माण का क्रम चल रहा था कि तभी एक दिन रबीन्द्र शंकर चौधरी (पंडित रविशंकर का शुरुआती नाम) ‘ज़िन्दगी’ छोड़ने चल दिए थे। 

किस्से-कहानियों में यह बात कही जाती है। वाक़या तब का है, जब रबीन्द्र शंकर मध्य प्रदेश के मैहर में अपने गुरु उस्ताद अलाउद्दीन खाँ से संगीत सीख रहे थे। अभी ज़्यादा समय नहीं हुआ था कि एक रोज उनके उस्ताद ने उन्हें झिड़क दिया। रबीन्द्र शंकर उनकी बताई ‘तान’ को ठीक से बजा नहीं पा रहे थे। उस्ताद नाराज़ हो गए। कहने लगे, “ठीक से बजा नहीं सकते तो लड़कियों की तरह चूड़ियाँ पहनकर बैठ जाओ।”

सम्वेदनशील रबीन्द्र शंकर को उस्ताद की झिड़की नाग़वार गुज़री। वे तुरन्त कमरे से उठकर चले गए। कहते हैं, उस रोज़ गुस्से में रबीन्द्र शंकर अपनी जीवन लीला समाप्त करने चल दिए थे। लेकिन किसी परिचित ने उन्हें रोक लिया। हालाँकि इस किस्से का किसी प्रामाणिक दस्तावेज में ज़िक्र नहीं है। पर चूँकि कई बड़े कलाकारों के साथ ऐसे वाक़ये सच में घटे हैं, जब वे जानलेवा अवसाद से घिरे। लेकिन फिर दोगुनी ताकत से उससे बाहर आए। सो, पंडित रविशंकर के जीवन से जुड़े इस किस्से को भी एकदम ख़ारिज़ नहीं किया जा सकता। 

इस किस्से का सच जो भी हो अलबत्ता। पर ये सौ फ़ीसदी सच है कि जब रबीन्द्र शंकर ने ‘ज़िन्दगी’ (सितार उनकी ज़िन्दगी की तरह था) को थामा तो इसके मायने बदल दिए। उस वक़्त किसी ने जो सोचा भी नहीं था, वह रबीन्द्र शंकर ने पंडित रविशंकर बनकर कर दिखाया। पूरब-पश्चिम के संगीत को साथ लाने का प्रयोग (एलबम, ‘वेस्ट मीट्स ईस्ट’ 1967) ऐसा ही था। फिर नए बने बांग्लादेश की मदद को कल्याणार्थ कार्यक्रम (चैरिटी शो, 1971) भी शायद ऐसा पहला ही प्रयोग था। इसी से वे सितार का दूसरा नाम बन गए।

बनारस में बंगाली ब्राह्मण परिवार में सात अप्रैल 1920 को पैदा हुए पंडित रविशंकर की उपलब्धियों पर बहुत कुछ लिखा-कहा जा चुका है। लेकिन आज उन उपलब्धियों से ज़्यादा अगर कुछ प्रासंगिक लग रहा है तो उनके जीवन का अहम प्रेरणास्पद परिवर्तन कालखंड। इसीलिए बात सिर्फ़ उतने तक ही सीमित रखना ज़्यादा उचित रहेगा।

आज जब देश-दुनिया के लोग कोरोना जैसी वैश्विक महामारी से मुकाबले के लिए परेशान हैं। निराशा व अवसाद से जूझ रहे हैं। ऐसे समय में पंडित रविशंकर की संघर्ष यात्रा का छोटा-सा किस्सा बड़ी-सी सीख देता है। बताता है, ‘छोटी-बड़ी बाधा को पार करने के बाद ही विशाल कृति का निर्माण होता है।’ और फिर पंडित रविशंकर का संगीत भी तो है, जो मुश्किल की हद में बेहद सूकून देने में सक्षम है। 

सोशल मीडिया पर शेयर करें
Apni Digital Diary

Share
Published by
Apni Digital Diary

Recent Posts

पर्यावरण दिवस, ईंधन बचाने की बातें और निजी कारों का ऐसा तमाम-जाम, दिलचस्प है न?

मैं बेंगलुरू में जहाँ रहता हूँ, वहाँ अपने घर के सामने रोज इस तरह का… Read More

3 hours ago

लिंक्डइन के जरिए नौकरी का जाल, चीन से पाँच देशों की जासूसी, भारतीय भी सावधान रहें!

लिंक्डइन के जरिए नौकरी का जाल बिछाकर, रोजगार की तलाश कर रहे लोगों को काम… Read More

1 day ago

‘शिक्षक’ ने अपने कौड़ी के ज्ञान से ‘पत्रकार’ को दो कौड़ी का साबित कर दिया, देखिए वीडियो!

देश की एक जानी-मानी ‘पत्रकार’ ने ऑनलाइन पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए कह दिया कि… Read More

2 days ago

क्या हम भारतीयों को सार्वजनिक नियम-कायदे मानने की तमीज नहीं? अभी बहस तो यही है!

अभी एक-दो दिन से मीडिया-सोशल मीडिया में यह बहस चल रही है कि हम भारतीयों… Read More

3 days ago

अपने हिस्से का योगदान दीजिए, वरना लू के थपेड़ों से रोज 3,400 लोग मरने लग जाएँगे!

एक नया अध्ययन हुआ है। इसमें भारत और उसके आस-पास के देशों में लगातार बढ़ती… Read More

4 days ago

इस लड़की ने दो लाख की नौकरी छोड़कर 60 हजार रुपए महीने में खुशी खरीदी है!

खुशी पाने के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते। ज्यादातर लोग अमूमन बड़ी से बड़ी नौकरी… Read More

5 days ago