जयन्ती विशेषः अपने प्रिय कवि माखनलाल चतुर्वेदी की याद और पुष्प की अभिलाषा

आकाश कुमार सिंह, छपरा, बिहार से, 04/04/2021

आज फेसबुक स्क्रॉल करते हुए ‘डायरी’ की एक पोस्ट सामने आ गई। पोस्ट में एक सुन्दर तस्वीर पर माखनलाल चतुर्वेदी जी की कविता लिखी थी। ‘पुष्प की अभिलाषा’। उसी से याद आया कि आज माखनलाल चतुर्वेदी जी की जयन्ती है। वरना हम भूल चुके हैं अपने कवियों, लेखकों और समाज के वास्तुकारों को। साथ ही ताज़ा हो गईं इस कविता से जुड़ी कुछ पुरानी यादें। 

मैंने पहले मन ही मन टीम ‘डायरी’ का शुक्रिया अदा किया। अपनी यादों के घरौंदे तक वापस ले जाने के लिए। अपने प्रिय कवि की याद दिलाने के लिए। मैंने फेसबुक पोस्ट पर कमेन्ट किया। लिखा “मुझे मंच से ये कविता पढ़ने का गौरव मिला था।” ‘डायरी’ से जवाब मिला, फिर तो याद आ गया होगा पूरा दृश्य। मैंने कहा, “हाँ बिल्कुल”। अब डायरी की ओर से अगला जवाब नहीं था। बल्कि प्रोत्साहन था। मुझे उन्होंने अपनी यादों को लिखकर बाँटने के लिए प्रोत्साहित किया और मैं तुरन्त डायरी लिखने बैठ गया। जो यादें, जो बातें, जो किस्से आपके दिल के सबसे करीब होते हैं, उन्हें लिखते हुए एक अलग किस्म की ख़ुशी मिलती है। सन्तोष मिलता है। मैं ये डायरी लिखते हुए इसी सन्तोष से भरा हुआ हूँ।
 
बात तब की है जब हम कक्षा में ‘पुष्प की अभिलाषा’ का सस्वर वाचन करते थे। और हमारे गुरुजी उससे भी ज़ोर से कविता का भावार्थ समझाते थे। तब हमें वीर रस तो क्या, किसी भी रस का दूर-दूर तक ज्ञान नहीं था। हाँ, पढ़ने और सुनने के क्रम में जोश बहुत आता था। तब मन में बस यही ख़्याल आता था कि बड़े होकर सेना का जवान ही बनना है। बाद में पता चला कि यही तो वीर रस था।
 
जवान हुए, पर सेना में न जा सके। हालांकि तब तो कक्षा के सभी साथियों को सेना में ही जाना था। कक्षा में शायद ही कोई बच्चा होगा जिसे यह कविता कंठस्थ न हो। कविता इतनी सरल थी कि मन में स्वतः रच बस जाए। भाव ऐसा कि दिलों में जोश भर दे। भाषा ऐसी कि आसानी से हृदय में समा जाए। वही भाव, वही अर्थ, वही शब्द आज भी हृदयस्थ हैं।
 
स्कूल से निकले, कॉलेज गए। माखनलाल जी पीछे छूट गए। फिर कॉलेज से निकले और दिल्ली पहुँच गए। भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी)। स्कूल के उन दिनों के बीतने के कई बरस बाद यहाँ एक बार फिर इस कविता को जीने का अवसर मिला। कविता तो पहले से याद थी और उसके भाव भी ज़ेहन में थे। बस चुनौती थी माखनलाल चतुर्वेदी जी का व्यक्तित्व।
 
यह बहुत बड़ी चुनौती थी। उनकी वेशभूषा में कविता को पढ़ना था। न सिर्फ़ पढ़ना था, बल्कि उस भाव को लोगों के मन में जगाना भी था। असली काम यही था। क्योंकि सामने सातवीं कक्षा के वे बच्चे नहीं थे जो भावावेश में तिलमिला उठते थे। ये परिपक्व लोग थे। पेशेवर। व्यस्त न रहते हुए भी अतिरिक्त व्यस्तता दिखाने वाले। स्वार्थी भी। लेकिन हम अपनी तैयारी में जुटे रहे। दो दिन बाद मंच पर जाने का मौका मिला। मैंने कविता पढ़ी। दिल से पढ़ी। पूरे हॉल में तालियों की अनुगूँज थी। मैं कितना सफल रहा, मुझे आज भी नहीं पता। पर ये लम्हा बहुत ख़ास था। और आज भी उतना ही ख़ास है। मैं एक बार फिर उन्हीं भावों में भरा इस कविता का पाठ कर रहा हूँ और ख़ुश हो रहा हूँ।
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(आकाश ने भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली से हिन्दी पत्रकारिता की पढ़ाई की। समाचार चैनलों की नौकरी की, पर पसंद नहीं आई तो छोड़ दी। इन दिनों छपरा में पुष्प वाटिका चलाते हैं। यह लेख उन्होंने अपने #अपनीडिजिटलडायरी को वॉट्सऐप के ज़रिये भेजा है। ‘डायरी’ के अपने सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक सरोकार को देखते हुए) 

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