बैंक अमीरों को आसानी से कर्ज देते हैं और आम आदमी को परेशान करते हैं, क्या ये सच है?

टीम डायरी

देश की शीर्ष अदालत ने एक मामले की सुनवाई के दौरान बड़ी अहम बात कही है। न्यायाधीशों के मुताबिक, “अदालत के संज्ञान में यह बात आई है कि आम तौर पर बैंक- जिनमें भारतीय स्टेट बैंक भी शामिल है- बड़ी संस्थाओं को भारी कर्ज देने के मामले में भी काफी ‘लापरवाह रवैया’ अपनाते हैं। लेकिन वहीं दूसरी ओर, जब आम लोग निजी जरूरतों के लिए छोटे कर्ज लेने आते हैं, तो बैंक उनके साथ बहुत ज्यादा सख्ती बरतते हैं। वे ऐसे लोगों पर कड़ी शर्तें थोपते हैं और उन्हें एक थकाऊ प्रक्रिया से गुजरने को मजबूर करते हैं। कुछ मामलों में तो बैंकों का यह व्यवहार आम आदमी के लिए ‘उत्पीड़न’ की सीमा तक भी पहुँच जाता है।” 

मामला हरियाणा की एक कम्पनी से जुड़ा है। उसे भारतीय स्टेट बैंक ने 2019 में आठ करोड़ नौ लाख रुपए का कर्ज बिना जाँच-पड़ताल या हीला-हवाली के यूँ ही दे दिया था। अलबत्ता कर्ज देने के पाँच-छह महीनों के भीतर ही कम्पनी ने उसकी किश्तें चुकाने में असमर्थता जता दी। वह एक भी किश्त नहीं चुका पाई। इसके बाद बैंक ने कर्ज की रकम को बट्‌टे खाते में डाल दिया। उसकी भरपाई के लिए यमुना नगर जिला अदालत में कानूनी प्रक्रिया शुरू की। इसके तहत अदालत से कम्पनी की संपत्ति जब्त करने की अनुमति माँगी गई। फैसला बैंक के पक्ष में आया, पर जब्ती की कार्रवाई नहीं हो पाई। तब बैंक ने पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय में अपील की। उच्च न्यायालय ने भी बैंक के पक्ष में ही फैसला सुनाया और सरकारी अफसरों को आदेश दिया कि वे जब्ती की कार्रवाई में बैंक की मदद करें। इसी बीच कम्पनी की ओर से उच्चतम न्यायालय में याचिका लगा दी गई। 

इसी की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कम्पनी की याचिका तो खारिज कर दी। लेकिन बैंक की कार्यप्रणाली पर भी तीखी टिप्पणी की, जिसके एक हिस्से का उल्लेख शुरू में किया गया। आगे अदालत ने बैंक को चेतावनी देते हुए कहा, “हम भारतीय स्टेट बैंक के रवैये से आँखें नहीं फेर सकते। हमने पाया है कि बैंक और उसके अधिकारियों ने कंपनी को 8.09 करोड़ रुपए का भारी-भरकम कर्ज देने/मंजूर करने में लापरवाही बरती है। बैंक के संबंधित अधिकारियों ने कर्ज लेने वाले की इस क्षमता का ठीक से आकलन तक नहीं किया कि वह उसे चुका भी पाएगा या नहीं। ऐसी हरकतों के खिलाफ भविष्य में खास आदेश देने की जरूरत पड़ सकती है।” 

तो यह हुआ मामला एक विशेष कम्पनी का। मगर क्या ऐसा नहीं लगता कि बैंकों की यह कार्यप्रणाली एक सामान्य चलन ही हो चुकी है? क्योंकि अगर ऐसा नहीं होता तो विजय माल्या, मेहुल चौकसी, नीरव मोदी, जैसे कई अरबपति कारोबारी भारतीयों बैंकों को हजारों करोड़ का चूना कैसे लगाते? 

क्या लगता है? 

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Neelesh Dwivedi

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