नरेन्द्र मोदी को ‘सँपेरा’ बताने वालों ने तो वास्तव में भारत और प्रधानमंत्री का लोहा माना है!

टीम डायरी

नॉर्वे के एक बड़े अखबार में छपे कार्टून में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ‘सँपेरे’ के रूप दिखा दिया गया। वह भी उस वक्त जब प्रधानमंत्री नॉर्वे की यात्रा पर थे। अखबाार का नाम ‘आफ्टेनपोस्टेन’ है, जो दुनिया के चर्चित अखबारों में गिना जाता है। इस अखबार में छपे एक लेख में प्रधानमंत्री का विवादित कार्टून छापा गया। उसमें वह सँपेरे की तरह पालथी मारकर बैठे बीन बजा रहे हैं और उनके सामने साँप के रूप में वाहनों में पेट्रोल डालने वाला यंत्र दिख रहा है। नीचे वह कार्टून है, देखा जा सकता है। इसके छपने के बाद से पूरी दुनिया में बहस छिड़ी है। 

अधिकांश लोग इस कार्टून को आपत्तिजनक कह रहे हैं। उस नस्लवादी मानसिकता का प्रतीक कह रहे हैं, जो अंग्रेज और अंग्रेजों जैसी सोच रखने वाले लोग अक्सर आम भारतीयों के प्रति दिखाते हैं। अखबार और कार्टूनिस्ट पर उनके कृत्य के लिए लानतें भेजी जा रही हैं। वास्तव में ऐसी तीखी प्रतिक्रिया होनी भी चाहिए क्योंकि यह तरीका निश्चित रूप से गलत है। यह एक देश के शीर्ष नेता को नीचा दिखाने की कोशिश है।

लेकिन जैसे हर सिक्का का दूसरा-तीसरा पहलू होता है, वैसा ही इस मामले में भी है। और वह क्या है? वह दरअसल एक खीज है, एक झुँझलाहट है, एक गुस्सा है, जो भारत और उसके प्रधानमंत्री से अपेक्षित प्रतिक्रिया न मिलने के कारण पैदा हुआ है। गौर करें, भारत और भारतीय प्रधानमंत्री के प्रति यही खीज, यही झुँझलाहट अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के व्यवहार में भी इन दिनों लगातार नजर आ रही है। और यह खीज है क्यों? इसका जवाब इसी विवादित कार्टून के साथ छपे लेख में ही मिल जाता है। फ्रेंक रोजविक नाम के स्तंभकार ने यह लेख लिखा है। इसका शीर्षक है, “एक चालाक और थोड़ा खीज दिलाने वाला आदमी।”   

इस लेख में स्तम्भकार ने प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति को ‘कुछ ज्यादा ही व्यावहारिक’ बताया है। इसमें लिखा है कि वह विचारधारा से ज्यादा राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसके लिए वह ऐसे अलग-अलग देशों से एक साथ अच्छे रिश्ते बना रहे हैं, जो एक-दूसरे के विरोधी तक हो सकते हैं। मसलन- वर्तमान में रूस और यूक्रेन-यूरोप के देश। ऐसे ही इजराइल और ईरान। इसी तरह, अमेरिका के साथ रूस और चीन जैसे प्रतिद्वंद्वी देश। नरेन्द्र मोदी की इस कूटनीति को लेख में ‘रियलपॉलिटिक’ कहा गया है, यानि राजनीति में व्यावहारिक हितों के हिसाब से फैसले लेना। लेख में भारत को उभरती वैश्विक शक्ति भी बताया गया है, जो व्यापार, तकनीक, ऊर्जा और रणनीति के क्षेत्र में विभिन्न देशों के साथ साझेदारी बढ़ा रहा है। बताते चलें कि प्रधानमंत्री ने 15 से 20 मई 2026 तक पाँच देशों- संयुक्त अरब अमीरात, नीदरलैण्ड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली की यात्रा की है। इस छह-दिनी यात्रा का मुख्य उद्देश्य दुनिया में लगातार बढ़ती अस्थिरता के बीच भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना था। साथ ही, उन देशों के साथ भारत के द्विपक्षीय व्यापार, जलवायु परिवर्तन और उन्नत तकनीकी सहयोग को मजबूत करना भी था। 

तो इसमें गलत क्या है? शायद ही कोई प्रधानमंत्री की इस विदेश नीति को गलत कहेगा। लेकिन अमेरिका जैसे कई असरदार देशों को इसमें ‘कुछ गलत’ दिखाई देता है। और वह ‘कुछ गलत’ क्या है? सिर्फ इतना कि भारत किसी भी देश का न तो पिछलग्गू बन रहा है और न ही उसका प्रतिद्वंद्वी। भारत ने दुनिया में अपनी स्थिति इस तरह की बना ली है कि कोई देश उसे अनदेखा नहीं कर सकता। उससे अपने सम्बन्ध खराब करने का जोखिम मोल नहीं ले सकता। भले ही वह अमेरिका और चीन जैसे देश क्यों न हों। उन सभी को भारत के साथ उसकी तय की हुई शर्तों पर रिश्ते रखने पड़ रहे हैं। यही उनकी खीझ, उनकी झुँझलाहट और उनके गुस्से की वजह है। 

अभी अप्रैल के महीने में ठीक इसी तरह की बात अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के इजराइली विश्लेषक शाय गल ने कही थी। उन्होंने अपने लेख लिखा था, “भारत कोई महाशक्ति नहीं है, बल्कि वह दुनिया की पहले नम्बर की सम्पर्क-शक्ति बन चुका है। भारत के साथ अच्छे रिश्ते रखना हर देश की मजबूरी बन चुकी है, फिर चाहे उसकी इच्छा हो या न हो।” उन्होंने अपने लेख का समापन कुछ इन शब्दों के साथ किया था, “भारत मध्य पूर्व में स्थिरता नहीं लाएगा। वह युद्धों को समाप्त करने की पहल नहीं करेगा। वह कोई व्यवस्था भी लागू नहीं करेगा। लेकिन वह ऐसा खिलाड़ी जरूर बन जाएगा, जिसके बिना कोई भी व्यवस्था खड़ी नहीं हो सकती। दुनिया ने भारत को इस भूमिका के लिए नहीं चुना है। बस, यह मान लिया गया है कि उसके बिना काम चल ही नहीं सकता।” 

अब बताइए क्या कहेंगे? मोदी को ‘सँपेरा’ बताने वालों ने भारत और उसके प्रधानमंत्री का लोहा माना या नहीं? एक ऐसा कारगुजार, जो अपनी बीन की धुन पर दुनिया को नचा रहा है। और हाँ, शायद देश के भीतर भी तो प्रधानमंत्री यही कर रहे हैं। इसीलिए यहाँ भी कई ‘रियासती सोच वाले राजनेता’ अपनी खीज, अपनी झुँझलाहट, अपना गुस्सा निकालने के लिए जब-तब उनके खिलाफ अपमानजनक भाषा का प्रयोग करते हैं। नहीं क्या?  

सोशल मीडिया पर शेयर करें
Neelesh Dwivedi

Share
Published by
Neelesh Dwivedi

Recent Posts

पर्यावरण दिवस, ईंधन बचाने की बातें और निजी कारों का ऐसा तमाम-जाम, दिलचस्प है न?

मैं बेंगलुरू में जहाँ रहता हूँ, वहाँ अपने घर के सामने रोज इस तरह का… Read More

2 hours ago

लिंक्डइन के जरिए नौकरी का जाल, चीन से पाँच देशों की जासूसी, भारतीय भी सावधान रहें!

लिंक्डइन के जरिए नौकरी का जाल बिछाकर, रोजगार की तलाश कर रहे लोगों को काम… Read More

1 day ago

‘शिक्षक’ ने अपने कौड़ी के ज्ञान से ‘पत्रकार’ को दो कौड़ी का साबित कर दिया, देखिए वीडियो!

देश की एक जानी-मानी ‘पत्रकार’ ने ऑनलाइन पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए कह दिया कि… Read More

2 days ago

क्या हम भारतीयों को सार्वजनिक नियम-कायदे मानने की तमीज नहीं? अभी बहस तो यही है!

अभी एक-दो दिन से मीडिया-सोशल मीडिया में यह बहस चल रही है कि हम भारतीयों… Read More

3 days ago

अपने हिस्से का योगदान दीजिए, वरना लू के थपेड़ों से रोज 3,400 लोग मरने लग जाएँगे!

एक नया अध्ययन हुआ है। इसमें भारत और उसके आस-पास के देशों में लगातार बढ़ती… Read More

4 days ago

इस लड़की ने दो लाख की नौकरी छोड़कर 60 हजार रुपए महीने में खुशी खरीदी है!

खुशी पाने के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते। ज्यादातर लोग अमूमन बड़ी से बड़ी नौकरी… Read More

5 days ago