मृच्छकटिकम्-14 : इस संसार में धनरहित मनुष्य का जीवन व्यर्थ है

अनुज राज पाठक, दिल्ली से

वसंतसेना अपने सेवक के साथ चारुदत्त के घर जाने के लिए निकलती है। बादल आकाशीय बिजली की चमक और तेज बारिश के साथ बरस रहे हैं। वसंतसेना बादलों को और साथ ही वर्षा के देव इंद्र को उलाहना देती है। सेवक वसंतसेना से कहता है, इन्हें उलाहना न दें, ये तो चमककर आप को अंधेरी रात में मार्ग दिखा रहे हैं।

वसंतसेना और उसका सेवक चारुदत्त के घर के पास पहुँचकर…

सेवक : आप समस्त कलाओं को जानती हैं, इसलिए उपदेश की आवश्यकता नहीं, लेकिन प्रेमी के पास जाते समय क्रोध नहीं करना चाहिए। यदि तुम अपने प्रिय पर क्रोध करोगी तो अनुराग कैसे होगा अथवा क्रोध के बिना अनुराग में आनंद कैसे आएगा? तुम भी क्रोध करना और प्रिय को भी क्रोधित होने के लिए उद्दीप्त करना इसके पश्चात ही दोनों परस्पर प्रेम से प्रसन्न हो जाना। (यदि कुप्यसि नास्ति रतिः कोपेन विनाऽथवा कुतः कामः, कुप्य च कोपय च त्वं प्रसीद च त्वं प्रसादय च कान्तम्।) अच्छा ठीक है, चलो अब चारुदत्त को मेरे आने की सूचना दे दो।

सेवक : कदंब के पुष्पों से सुगंधित, बादलों से सुशोभित समय में, अनुराग से युक्त हृदय लेकर, प्रसन्न मन और मुख वाली, बादलों की गर्जना से भयभीत, आपके दर्शनों की इच्छुक प्रेमी के घर आई हुई यह वसंतसेना पायलों में लगे कीचड़ को धोती हुई आपके द्वार पर खड़ी है।

चारुदत्त  (सुनकर) : मित्र! देखो क्या है? 

विदूषक : (वसंतसेना के पास जाकर) श्रीमति! आपका कल्याण हो।

वसंतसेना : प्रणाम, आपका जुआरी कहाँ है?

विदूषक (अपने मन में) : जुआरी शब्द से प्रिय मित्र को सुशोभित कर रही है। (प्रकट में) श्रीमति! वे सूखे वृक्षों वाली फुलवारी में।

वसंतसेना : सूखे वृक्षों वाली फुलवारी कौन सी है?

विदूषक : जहाँ कुछ खाया-पिया न जाता हो।

वसंतसेना (चारुदत्त के पास जाकर) : अरे जुआरी जी! आप की संध्यावेला सुखद है न?

चारुदत्त ( प्रसन्नतापूर्वक उठकर) : आइए प्रिये! हमेशा यह सायंकाल जागते हुए बीतता है। हमेशा साँसें भरते हुए रात बीतती है। हे विशालाक्षी! आज तुम्हारे साथ से यह शाम शोकनाशक होगी। (सदा प्रदोषो मम याति जाग्रतः, सदा च मे निश्वसतो गता निशा। त्वया समेतस्य विशाललोचने ममाद्य शोकान्तकरः प्रदोषः) 

आपका स्वागत है। आइए, आसन लीजिए, बैठिए। मित्र! देखो वसंतसेना के वस्त्र गीले हैं दूसरे वस्त्र लाकर दो।

विदूषक : मित्र ! मैं वसंतसेना से कुछ पूछना चाहता हूँ।

चेटी (वसंतसेना से) : ब्राह्मण बहुत सीधा है।

वसंतसेना : ब्राह्मण बहुत चालाक है। हाँ मैत्रेय कहो।

चेटी : मान्या वसंतसेना यह पूछने आई हैं कि इस रत्नमालिका का मूल्य क्या है?

विदूषक : (धीरे से) मैंने तो कहा था, कि इस रत्नमालिका से यह संतुष्ट नहीं है। इसलिए कुछ और लेने आई है।

चेटी : मान्या वसंतसेना वह रत्नमालिका जुए में हार गई हैं। और वह द्यूताध्यक्ष संदेशवाहक न जाने कहाँ चला गया है।

विदूषक : श्रीमति! जैसा मैंने कहा था, वैसा आपने भी कह दिया।

चेटी : जब तक वह द्यूताध्यक्ष खोजा जाता है तब तक यह स्वर्णपात्र अपने पास रखें।

विदूषक : (प्रसन्नतापूर्वक) मित्र! क्या यह वही स्वर्णपात्र है जो हमारे यहाँ से चोरी हुआ था?

चारुदत्त : हे मित्र! वसंतसेना के धरोहर की क्षतिपूर्ति हेतु हमने जो बहाना सोचा था। हमारे लिए वही बहाना इन्होंने उपस्थित कर दिया है। किंतु यह धोखाधड़ी है। हाँ यह वही पात्र है।

विदूषक : हे मित्र! मैं ब्राह्मणत्व की शपथ खाकर कहता हूँ कि यह वही पात्र है।

चारुदत्त : तो यह अच्छी बात है। कल्याणी ( सेविका को संबोधन) क्या यह वही पात्र है?

चेटी : हाँ वही पात्र है।

चारुदत्त : मैंने किसी के प्रिय वचन को खाली नहीं जाने दिया। इसलिए पुरस्कार में यह अँगूठी स्वीकार करो। (लेकिन ऐसा कहने के बाद अपने अँगूठीरहित हाथ देखकर लज्जित होता है)

वसंतसेना (मन में) : तभी तो मैं इसे चाहती हूँ।

चारुदत्त : हाँ। दुःख है। इस संसार में धनरहित मनुष्य का जीवन व्यर्थ है। क्योंकि वह क्रोधित होने पर न तो किसी का कुछ बिगाड़ सकता है और प्रसन्न होने पर न किसी को कुछ दे ही सकता है। (धर्नैवियुक्तस्य नरस्य लोके किं जीवितेनादित एव तावत्, यस्य प्रतीकारनिरर्थकत्वात् कोपप्रसादा विफलीभवन्ति।)

विदूषक : मित्र! अधिक शोक करना उचित नहीं।

वसंतसेना : आर्य! इस रत्नावली से मुझे तौलना उचित नहीं।

चारुदत्त : वसंतसेना! देखो, सत्य घटित घटना पर कौन विश्वास करेगा( सभी मुझे तौलेंगे। अर्थात् बेईमान समझेंगे। क्योंकि इस संसार में निर्बल निर्धनता शंका का घर है। (कः श्रद्धास्यति भूतार्थं सर्वो मां तूलयिष्यति। शङ्कनीया हि लोकेऽस्मिन् निष्प्रतापा दरिद्रता।)

विदूषक : चेटी! क्या आप की आर्या यहाँ ही रूकेगीं?

चेटी : आर्य मैत्रेय! इस समय आप अपने आप को बहुत सीधा क्यों दिखा रहे हैं?

विदूषक : हे मित्र! सुखपूर्वक बैठे हुए लोगों को दूर करता हुआ यह बादल फिर बड़ी-बड़ी बूंदों के साथ घिर आया है।

चारुदत्त : आप ठीक कह रहे हैं… देखो! बादलों से अनुरक्त मिलने की अपनी इच्छा से आई हुई प्रियतमा की तरह यह बिजली, कांतियुक्त बादलों से अनुलिप्त, तीव्र सुगंधित, शीतल, संध्यापवन से पंखा झलते हुए प्रेमी के समान आकाश का आलिंगन कर रही है। (वसंतसेना चारुदत्त का आलिंगन करती है)

चारुदत्त : हे बादल! तुम जोर से गरजो, तुम्हारी कृपा से स्नेहिल मेरा शरीर प्रिय के स्पर्श से रोमांचित होता हुआ कदंब पुष्प की समानता को प्राप्त हो रहा है। (भो मेघ ! गम्भीरतरं नद त्वं तव प्रसादात् स्मरपीडितं मे। संस्पर्शरोमाञ्चितजातरागं कदम्बपुष्पत्वमुपैति गात्रम्)

इस प्रकार चारुदत्त और वसंतसेना का स्नेहिल मिलन होता है।

जारी….
—-
(अनुज राज पाठक की ‘मृच्छकटिकम्’ श्रृंखला हर बुधवार को। अनुज संस्कृत शिक्षक हैं। उत्तर प्रदेश के बरेली से ताल्लुक रखते हैं। दिल्ली में पढ़ाते हैं। वहीं रहते हैं। #अपनीडिजिटलडायरी के संस्थापक सदस्यों में एक हैं। इससे पहले ‘भारतीय-दर्शन’ के नाम से डायरी पर 51 से अधिक कड़ियों की लोकप्रिय श्रृंखला चला चुके हैं।)

पिछली कड़ियाँ
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मृच्छकटिकम्-10 : मनुष्य अपने दोषों के कारण ही शंकित है
मृच्छकटिकम्-9 : पति की धन से सहायता करने वाली स्त्री, पुरुष-तुल्य हो जाती है
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मृच्छकटिकम्-2 : व्यक्ति के गुण अनुराग के कारण होते हैं, बलात् आप किसी का प्रेम नहीं पा सकते
मृच्छकटिकम्-1 : बताओ मित्र, मरण और निर्धनता में तुम्हें क्या अच्छा लगेगा?
परिचय : डायरी पर नई श्रृंखला- ‘मृच्छकटिकम्’… हर मंगलवार

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