लगातार भारहीन होते जाना ही जीवन है

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से 9/10/2021

‘न्यूटन’ फिल्म में अभिनेता राजकुमार राव दूरस्थ आदिवासी गाँव में चुनाव करवा रहे हैं। वे बूथ पर अपने सहयोगियों से पूछते हैं कि क्या वे निराशावादी हैं? ये सवाल जब वे अभिनेत्री अंजलि पाटिल से पूछते हैं तो वे जवाब देती हैं, “नहीं सर मैं आदिवासी हूँ” और राजकुमार राव चुप हो जाते हैं। इस ज़वाब का क्या मतलब है? यही कि जो जल, जंगल, ज़मीन पर निर्भर है, जिसने प्रकृति से जीवन को जोड़कर अपने को दुनिया से मुक्त कर लिया है, जिसने न्यूनतम साधनों से जीवन की लय को जोड़कर मस्त रहना सीख लिया है, वह निराशावादी हो नहीं सकता। कबीर कहते हैं, “जब मन मस्त हुआ तो फिर क्या बोले।” आशा यहीं से उपजती है।

गर्मियों के मौसम में बाज़ार जाओ या घर रहो, पके हुए आम की स्वर्गिक ख़ुशबू मन-मस्तिष्क को बौरा देती है। एक अज़ीब से नशे में बँधे हम आम के लालच में खिंचे चले जाते हैं आम की ओर। याद कीजिए जब बौर आ रहे थे, तेज हवाएँ थी, कड़ी धूप में गुठली से आम बनने की प्रक्रिया कितनी जटिल रही होगी। हम तेज हवाओं के कारण बौर के टूट जाने को लेकर चिन्तित थे। पर वे नन्हे से बौर पेड़ से जुड़े रहे, महीन तन्तुओं से पेड़ से हिलगे रहे और कड़ी धूप में आम बनते गए। जितना आवरण झीना हुआ उतना रस भरता गया। गुठली का जितना भार कम हुआ उतनी महक पकती गई। एक दिन ऐसा आया कि वह बौर जो हवा में काँप रहा था, पक गया अपने पूरे आकार में और चमकदार बन गया। हमारे गहरे नैराश्य को धता बताकर आम पक कर हमारी झोली में टपक गया और हमारी जिव्हाओं को आत्मिक सुख दे गया। आशाओं का यह बेहद छोटा सफ़र था, मात्र तीन से चार माह का।

आज सुबह जल्दी उठ गया था तो दूर खेतों की ओर निकल गया। मुझे लगा था कि भुनसार में मैं ही हूँगा अकेला औचक सा धरती को निहारता हुआ, सूर्योदय को देखता हुआ। पर जब गया तो देखा पसीने से लथपथ कुछ लोग घर लौट रहे थे। पूछा तो बोले, “बोअनी कर रहे हैं। पानी आएगा और अबकी बार झूमकर, फिर सोयाबीन, मक्का लहलहाएगा। मक्का के दानों में जब दूध फूटेगा तो चैन पड़ेगा हमें। यह किस प्रचंड आशा की बात कर रहे थे वे लोग। कहते हैं- जागती आँखों से देखे भोर के सपने सच होते हैं। मैं अब लौट रहा था, बुदबुदाते हुए प्रार्थना करते हुए कि सदियों से जमा उनका विश्वास ख़ारिज़ न हो कहीं। उनकी भुनसार की मेहनत व्यर्थ न चली जाए कहीं।

घर के गुलमोहर के आधे हिस्से को पड़ोसी ने कटवा दिया। फिर भी उससे फूल झरने लगे हैं। टिड्डियों के हमले के बाद भी फूल आए थे और अब भी इस धूप और बूँदों के बीच फूल उगते हैं, झरते हैं। हालाँकि अब खाली सा हो गया है ये गुलमोहर। पत्तियाँ बेजान हो गई हैं और टहनियों के बीच एक व्योम सा बन गया है, जहाँ से धरती-आसमान दोनों को ताका जा सकता है। फिर भी हर साल फूल आते हैं। टेसू हो या गुलमोहर, एक चटक रंग साल में एक बार ज़रूर खिलता है। यह आशा नहीं आस्था है, जिससे डिगा नहीं जा सकता।

मैं लगातार चौवन वर्षों से अपने रेशा-रेशा शरीर में, आत्मा में आम की ख़ुशबू और स्वाद को महसूसता हूँ। गुलमोहर के चटक रंग देखता हूँ। हर बार मुतमईन रहता हूँ कि अगले बरस इससे बेहतर स्वाद, ख़ुशबू और रंगीनियत को जिऊँगा। पर अब दिल नाउम्मीद है कि जीवन में ये ख़ुशबुएँ, ये स्वाद जो इन्द्रियों को उत्प्रेरित करते हैं, ये रंगों की महफ़िल और अपने इस गुलमोहर के फूलों को फिर कब देख पाऊँगा। ये एक सतर्कता भरी आशा है। 

कड़ी धूप में आवरण पतला होने के साथ भारहीन होते जाने का नाम जीवन है। ताकि स्वाद, रंग और खुशबू की सम्पूर्ण परिपक्वता सबको सही समय पर सही मात्रा में मिल सके। यही आशाओं का दीप्त संसार है, जो विरासत में छोड़कर जाना है।

मैं अगले जन्म में एक गुलमोहर का फूल, पका सा महकता हुआ रसीला आम होना चाहता हूँ। मैं मक्के के दानों का दूध बनकर धरती पर बिखर जाना चाहता हूँ। इसके लिए एक जन्म और लेना होगा पर यह निराशा नही, आशा है, प्रचंड आशा। 

(संदीप जी स्वतंत्र लेखक हैं। यह लेख उनकी ‘एकांत की अकुलाहट’ श्रृंखला की 31वीं कड़ी है। #अपनीडिजिटलडायरी की टीम को प्रोत्साहन देने के लिए उन्होंने इस श्रृंखला के सभी लेख अपनी स्वेच्छा से, सहर्ष उपलब्ध कराए हैं। वह भी बिना कोई पारिश्रमिक लिए। इस मायने में उनके निजी अनुभवों/विचारों की यह पठनीय श्रृंखला #अपनीडिजिटलडायरी की टीम के लिए पहली कमाई की तरह है। अपने पाठकों और सहभागियों को लगातार स्वस्थ, रोचक, प्रेरक, सरोकार से भरी पठनीय सामग्री उपलब्ध कराने का लक्ष्य लेकर सतत् प्रयास कर रही ‘डायरी’ टीम इसके लिए संदीप जी की आभारी है।) 
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इस श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ  ये रहीं : 

30वीं कड़ी : महामारी सिर्फ वह नहीं जो दिखाई दे रही है!
29वीं कड़ी : देखना सहज है, उसे भीतर उतार पाना विलक्षण, जिसने यह साध लिया वह…
28वीं कड़ी : पहचान खोना अभेद्य किले को जीतने सा है!
27वीं कड़ी :  पूर्णता ही ख़ोख़लेपन का सर्वोच्च और अनन्तिम सत्य है!
26वीं कड़ी : अधूरापन जीवन है और पूर्णता एक कल्पना!
25वीं कड़ी : हम जितने वाचाल, बहिर्मुखी होते हैं, अन्दर से उतने एकाकी, दुखी भी
24वीं कड़ी : अपने पिंजरे हमें ख़ुद ही तोड़ने होंगे
23वीं कड़ी : बड़ा दिल होने से जीवन लम्बा हो जाएगा, यह निश्चित नहीं है
22वीं कड़ी : जो जीवन को जितनी जल्दी समझ जाएगा, मर जाएगा 
21वीं कड़ी : लम्बी दूरी तय करनी हो तो सिर पर कम वज़न रखकर चलो 
20वीं कड़ी : हम सब कहीं न कही ग़लत हैं 
19वीं कड़ी : प्रकृति अपनी लय में जो चाहती है, हमें बनाकर ही छोड़ती है, हम चाहे जो कर लें! 
18वीं कड़ी : जो सहज और सरल है वही यह जंग भी जीत पाएगा 
17वीं कड़ी : विस्मृति बड़ी नेमत है और एक दिन मैं भी भुला ही दिया जाऊँगा! 
16वीं कड़ी : बता नीलकंठ, इस गरल विष का रहस्य क्या है? 
15वीं कड़ी : दूर कहीं पदचाप सुनाई देते हैं…‘वा घर सबसे न्यारा’ .. 
14वीं कड़ी : बाबू , तुम्हारा खून बहुत अलग है, इंसानों का खून नहीं है… 
13वीं कड़ी : रास्ते की धूप में ख़ुद ही चलना पड़ता है, निर्जन पथ पर अकेले ही निकलना होगा 
12वीं कड़ी : बीती जा रही है सबकी उमर पर हम मानने को तैयार ही नहीं हैं 
11वीं कड़ी : लगता है, हम सब एक टाइटैनिक में इस समय सवार हैं और जहाज डूब रहा है 
10वीं कड़ी : लगता है, अपना खाने-पीने का कोटा खत्म हो गया है! 
नौवीं कड़ी : मैं थककर मौत का इन्तज़ार नहीं करना चाहता… 
आठवीं कड़ी : गुरुदेव कहते हैं, ‘एकला चलो रे’ और मैं एकला चलता रहा, चलता रहा… 
सातवीं कड़ी : स्मृतियों के धागे से वक़्त को पकड़ता हूँ, ताकि पिंजर से आत्मा के निकलने का नाद गूँजे 
छठी कड़ीः आज मैं मुआफ़ी माँगने पलटकर पीछे आया हूँ, मुझे मुआफ़ कर दो  
पांचवीं कड़ीः ‘मत कर तू अभिमान’ सिर्फ गाने से या कहने से नहीं चलेगा! 
चौथी कड़ीः रातभर नदी के बहते पानी में पाँव डालकर बैठे रहना…फिर याद आता उसे अपना कमरा 
तीसरी कड़ीः काश, चाँद की आभा भी नीली होती, सितारे भी और अंधेरा भी नीला हो जाता! 
दूसरी कड़ीः जब कोई विमान अपने ताकतवर पंखों से चीरता हुआ इसके भीतर पहुँच जाता है तो… 
पहली कड़ीः किसी ने पूछा कि पेड़ का रंग कैसा हो, तो मैंने बहुत सोचकर देर से जवाब दिया- नीला!

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