झूठ बोले कौआ काटे, काले कौअे से डरियो… क्योंकि ये ज़िन्दगी भर चोंच मारता है!

टीम डायरी

साल 1973 में एक फिल्म आई थी, ‘बॉबी’। ऋषि कपूर और डिम्पल कपाड़िया की पहली फिल्म थी। इसका एक गाना खूब चर्चित हुआ था उस समय, जिसे आज भी सुना जाता है। बोल कुछ यूँ थे उसके कि, ‘झूठ बोले कौआ काटे, काले कौअे से डरियो’। इस गीत की याद आज ऐसे आ गई कि अभी ही एक सुर्खी निगाह से गुजरी। उसके निष्कर्ष भी कुछ-कुछ इस गीत के बोल के आस-पास ठहरते हैं। बल्कि ठहरकर बताते हैं कि ‘झूठ बोलने पर काले कौअे के काटने से डरने की जरूरत’ इसलिए भी है क्योंकि वह किसी न किसी रूप में ज़िन्दगी भर चोंच मारता रहता है। 

इस सुर्खी के मुताबिक कुछ समय पहले ‘जर्नल ऑफ एक्सपेरिमेंटल चाइल्ड साइकोलॉजी’ में शोध अध्ययन के निष्कर्ष प्रकाशित हुए हैं। इस अध्ययन में 11-12 साल के बच्चों और उनके अभिभावकों को मिलाकर करीब 1,000 लोगों को शामिल किया गया। इसके नतीजे में सामने आया कि माता-पिता मामूली तौर पर भी जो झूठ बोलते हैं, वे बच्चों की आदत हमेशा के लिए ख़राब कर सकते हैं, कर देते हैं। बच्चों के मस्तिष्क में ज़िन्दगी भर के लिए यह धारणा बैठ जाती है कि झूठ बोलना बुरी बात नहीं है। अपना काम बनाने या कोई लाभ लेने के लिए झूठ बोला जा सकता है।

अब इसकी शुरुआत कैसे होती है, वह देखिए। बच्चे की जब समझ भी विकसित नहीं होती तो माता-पिता उसे खाना खिलाने, सुलाने, नहलाने, कहीं आने-जाने से रोकने के लिए यूँ ही कह देते हैं, “खा लो नहीं तो बिल्ली छीन ले जाएगी”, “सो जाओ नहीं तो भूत आ जाएगा”, ‘वहाँ मत जाओ, जूजू काट लेगा”, “खाना नहीं खाया तो लम्बाई नहीं बढ़ेगी”, आदि। इसमें भी सबसे मज़ेदार तथा आम तो यह है कि अगर हमें किसी से मिलना नहीं है और वह घर आ गया है तो हम बच्चों से ही कहलवाते हैं, “जाओ, कह देना कि पिताजी (या माँ भी) घर पर नहीं हैं।” ऐसे और भी तमाम हैं। 

हम इस तरह के झूठों को कुछ ज़्यादा ही हल्के में लेते हैं। मानकर चलते हैं कि इससे कोई नुकसान नहीं होता। जबकि सच्चाई ये है कि बच्चे हमारे इन झूठों को सच मान लेते हैं। क्योंकि वे माता-पिता पर आँख बन्द कर के भरोसा करते हैं। यह सोच भी नहीं सकते कि उनके माता-पिता उनसे झूठ बोल रहे हैं। इतना ही नहीं, फिर जब वे बड़े होते हैं तो उनके दिमाग़ में यह धारणा स्थायी रूप से बैठ चुकी होती है कि अपना काम निकालने के लिए बोले गए छोटे-मोटे झूठ से कोई नुक़सान नहीं। लिहाज़ा वे फिर छोटे से बड़े और बड़े से ज़्यादा बड़े झूठ का सहारा लेने लगते हैं। 

अब इन नतीज़ों को दिमाग़ में रखकर सोचिए कि क्या यह ज़िन्दगी भर काले कौअे के चोंच मारने जैसी स्थिति नहीं, जो झूठ बोलने और उसकी तरफ़ बेपरवा रहने की वज़ह से पैदा होती है? लिहाज़ा, थोड़ी अतिरिक्त सावधानी बरतिए। सुनिश्चित कीजिए कि किसी भी कीमत पर झूठ का सहारा न लें। ताकि काला कौआ हमें और हमारे बच्चों को ज़िन्दगी भर परेशान न करे। पीछे न पड़ा रहे। चोंच मार-मार कर व्यक्तित्त्व काे घायल न करता रहे। 

सोशल मीडिया पर शेयर करें
Neelesh Dwivedi

Share
Published by
Neelesh Dwivedi

Recent Posts

56 साल के ‘युवा’ सत्ता के लिए आग भड़का रहे और 28 साल के देश को नई ऊँचाई दे रहे!

अभी सोमवार, 20 जुलाई को संसद का मॉनसून सत्र शुरू हुआ। इससे कुछ समय पहले… Read More

3 hours ago

वंदेमातरम

जय जय श्री राधे Read More

1 day ago

‘सरल भक्तमाल’- 11..: तर्क कोई कितने भी दे, वैष्णव भक्ति के मूल सम्प्रदाय तो चार ही हैं!

कलि युग में भक्ति मार्ग पाखण्ड से घिरा रहता है, इसलिए भगवान के भजन-पूजन, नाम… Read More

3 days ago

फिल्म ‘थ्री इडियट’ के फुनसुक वाँगड़ू नहीं हैं सोनम वाँगचुक, फिर भी ऐसा प्रचार क्यों?

शिक्षा प्रणाली में मूलभूत सुधार और केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की माँग… Read More

4 days ago

केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा मण्डल ने अंग्रेजी को ‘विदेशी भाषा’ कह दिया, तो हाय-तौबा क्यों?

भाषा को लेकर बेवजह की हाय-तौबा मची हुई इन दिनों। वजह वही, पीढ़ियों से भारतीय… Read More

5 days ago

जिन्हें सच्ची खुशी की तलाश, वे आईआईटी प्रवेश परीक्षा में जानबूझकर फेल भी हो जाते हैं!

जिन्दगी अपनी है, चुनाव भी अपने ही होते हैं। ऐसा अक्सर कहा जाता है। लेकिन… Read More

6 days ago