अपने खोल से बाहर निकलिए, पटियों पर पाँव धरिए, दोस्तों से गपियाइए, खुशी के कई पायदान ऊपर चढ़ जाएँगे

टीम डायरी

नए साल की शुरुआत से ही बीते साल (2022) की एक रिपोर्ट कई जगहों पर सुर्ख़ियों में है। रिपोर्ट में ख़ुशियों के पैमाने पर दुनिया के विभिन्न देशों की स्थिति बताई गई है। ‘वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट’ के नाम से एक संस्था है। इसी नाम की उसकी आधिकारिक वेबसाइट पर यह रिपोर्ट हर साल अमूमन मार्च महीने में आया करती है। मार्च महीने की 20 तारीख़ काे ‘विश्व खुशहाली दिवस’ या अंग्रेजी में कहें तो ‘वर्ल्ड हैप्पीनेस डे’ होता है। उसी के आस-पास रिपोर्ट जारी की जाती है। मुमकिन है, अभी कुछ लोगों ने नए साल की शुरुआत अच्छी जानकारियों से हो, ऐसा सोचकर बीते साल की यह रिपोर्ट साझा कर दी हो। ख़ैर। यह कोई बड़ी बात नहीं। बड़ी बात ये है कि इस रिपोर्ट में शामिल 146 देशों की सूची में हमारा हिन्दुस्तान कहाँ है? तो ज़वाब है, सबसे नीचे 136वें नंबर पर।  

मतलब सीधे शब्दों में कहें तो हिन्दुस्तान के लोग दुनिया में सबसे अधिक हैरान, परेशान और तनावग्रस्त लोगों में शुमार होते हैं। महज 10 देशों की दशा इस मामले में हमसे खराब है। बाकी सब हमसे बेहतर हैं। इन ‘बेहतर’ मुल्कों में नेपाल, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश जैसे हमारे पड़ोसी तक शामिल हैं, जहाँ रोज़मर्रा की ज़िन्दगी के संघर्ष हिन्दुस्तान की तुलना में कई गुना ज़्यादा हैं। फिर भी वे हमसे अधिक ख़ुश हैं, कैसे? शायद इसलिए कि वे पारिवारिक और सामाजिक रूप से हम हिन्दुस्तानियों के मुक़ाबले आपस में कहीं अधिक और सहज रूप से जुड़े रहते होंगे। क्योंकि यही वह दवा है, जो इंसान को उसके तमाम तनावों से बहुत आसानी से दूर करती है। दिल के जाले हटाती है। दिमाग़ की ख़िड़कियाँ खोलती है। ये बात कुछ दिनों पहले सामने आए एक अध्ययन से भी साबित हुई है। 

अमेरिका के न्यू जर्सी में एक रटगर्स यूनिवर्सिटी है। वहाँ हुए अध्ययन के मुताबिक, जो लोग परिवार, दोस्त-यार और पड़ोसियों के साथ मिल-जुलकर रहते हैं, उनके खुशहाल और लंबे जीवन की संभावना अधिक हो जाती है। वहीं जो लोग ऐसा नहीं करते, वे तनाव, अवसाद के शिकार हो जाते हैं। उनके शरीर का काल-क्रम (बॉडी क्लॉक) बिगड़ जाता है। डिमेंशिया जैसी बीमारी हो जाती है, जिसमें नींद नहीं आती और याददाश्त कमजोर हो जाती है। इसी तरह की और भी दिक़्क़तें हो जाती हैं। फिर समय से कुछ पहले उनके निधन की आशंका भी बन जाती है। 

तो फिर इससे बचने के लिए करना क्या चाहिए? सीधा सा जवाब है। अपने खोल से बाहर निकलना चाहिए। पटियों पर पाँव धरना चाहिए। दोस्तों के साथ गपियाना चाहिए। दिमाग़ हल्का हो जाएगा। दिल को सुकून मिलेगा। यक़ीन न आए तो अपने ही बीते वक़्त को याद कर के देख लीजिए। जब आप दोस्तों के साथ मटरगश्ती किया करते थे। परिवार के लोगों, नाते-रिश्तेदारों के साथ फ़िज़ूल में ही बहुत सा वक़्त बिता देते थे। दिल-ओ-दिमाग़ पर तब कितना हल्कापन रहता था। है न? वह वक़्त बिताने के बाद जब भी आप कोई काम करने या पढ़ने-लिखने बैठते थे, तो आपके काम की गति कितनी तेज रहती थी तब? इसी तरह, ये भी याद कीजिए कि कितने सालों से आपने अपने ‘सच्चे दोस्तों’ के साथ इस क़िस्म का वक़्त नहीं बिताया है। कितने दिनों, महीनों से आपने परिजनों, नाते-रिश्तेदारों के साथ फुर्सत के लम्हे नहीं ख़र्च किए हैं। कितने दिनों से आपने आस-पड़ोस वालों की ख़ोज-ख़बर नहीं ली है? कितना लम्बा अरसा हो गया है, जबसे आप ये सोच रहे हैं कि अब “मुझे किसी की ज़रूरत नहीं। मैं, मेरे पत्नी-बच्चे (और ज़्यादा से ज़्यादा माता-पिता या सहोदर भाई-बहन) ही पर्याप्त हैं।” दरअस्ल, यही सोच आपका खोल है, जिसमें आप घुट रहे हैं। 

आपका यही खोल, यही घुटन है, जिसने खुशहाली के पैमाने पर आपको, आपके मुल्क को दुनिया में 136वें नंबर पर खड़ा कर रखा है। पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल से भी बहुत नीचे। सोचिएगा, क्योंकि मसला ‘सोचक’ यानि सोचने लायक है। हो सके तो अपने तौर-तरीक़ों में कुछ बदलाव लाने की कोशिश कीजिएगा। वैसे, यहीं एक ‘रोचक’ जानकारी भी देते चलें कि स्पेन दुनिया में एक ऐसा मुल्क़ है, जहाँ सदियों से एक शानदार परम्परा चली आ रही है। उसे ‘अल्फ्रैस्को चैट’ कहा जाता है। इस परम्परा को निभाते हुए वहाँ के लोग हर रोज शाम ढलते ही अपने घरों के बाहर खुले में कुर्सियाँ डालकर बैठकर जाते हैं। अपने पड़ोसियों से घंटों बतियाते हैं। चाय की चुस्कियाँ लेते हैं। इस दौरान टीवी, मोबाइल से पूरी तरह दूर रहते हैं। यह सिलसिला आज भी चल रहा है। बल्कि अब तो इस परम्परा को ‘विश्व विरासत’ का हिस्सा बनवाने की मुहिम भी शुरू हो चुकी है। और हाँ, यक़ीनन इस परम्परा का भी कुछ असर हुआ ही होगा कि आज स्पेन खुशहाली के पैमाने पर दुनिया में 29वें पायदान पर जगह पाता है।

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