भ्रष्ट-आचार अब एक शिष्ट-विचार, इसे खत्म करना मुश्किल, दो उदाहरणों से समझिए कैसे?

टीम डायरी

‘भ्रष्ट’ का अर्थ है- जब कोई अपने धर्म (कर्तव्य-पथ) से दूर हट जाए और ‘आचार’ का मतलब है- आचरण या व्यवहार अथवा चाल-चलन। इस तरह ‘भ्रष्ट-आचार’ का मायना हुआ अपने धर्म से हटकर, उसे भूलकर किया गया आचरण। यानि यह सिर्फ रिश्वत लेने-देने तक सीमित नहीं। इसी तरह, ‘विचार’ का अर्थ है- सोच या विचारधारा और ‘शिष्ट’ शब्द के कई अर्थों में से एक है- महीन अथवा बारीक। तो ‘शिष्ट-विचार’ का मतलब हुआ- महीन विचारधारा, बारीक सोच। और भ्रष्ट-आचार से सम्बन्धित विचार आजकल इतना महीन हो चुका है कि उसमें किसी तरह छाँट-बीन करना संभव नहीं रह गया है। इसीलिए भ्रष्ट-आचार को जड़ से खत्म करना भी लगभग नामुमकिन है। 

यह किसी नकारात्मक मानसिकता से निकाला गया निष्कर्ष नहीं है। पुख्ता प्रमाण और उदाहरण के साथ इसे साबित किया जा सकता है। मसलन- अभी हाल में दो समाचार ऐसे आए, जिनसे बात साबित होता है कि भ्रष्ट-आचार अब इतना शिष्ट, इतना महीन हो चुका है कि लोग अपने भ्रष्ट-आचरण को तो सही मानते हैं, उसके पक्ष में दलीलें देते हैं, मगर दूसरे के वैसे ही व्यवहार को पूरी तरह गलत और उसके खिलाफ कार्रवाई की बात करते हैं। यानि हमारा भ्रष्टाचार तो हो गया शिष्टाचार मगर दूसरे का समाज के लिए दीमक, जिसका इलाज होना चाहिए! 

अब पढ़िए समाचार, भारत संचार निगम लिमिटेड यानि बीएसएनएल के एक निदेशक हैं। विवेक बंजल नाम है उनका। उन्हें दो दिन के लिए इसी 25-26 फरवरी को प्रयागराज जाना था। उन्हें त्रिवेणी संगम में स्नान करना था, फिर नौकायन होना था। इसके बाद बड़े हनुमान जी के दर्शन तथा अक्षयवट और पातालपुरी भी जाना था। इस यात्रा के लिए प्रयागराज के करीब 50 अफसरों को उनके सत्कार की जिम्मेदारी सौंपी गई। इस सत्कार में क्या? साहब के लिए हर मौके पर अलग-अलग नए जाँघिया-बनियान, साबुन-शैम्पू, मंजन-ब्रश, तेल-कंघी, चप्पल-चादर, सूखे मेवे-फल, आदि का इंतजाम किया जाना था। इस तरह के कुल 20 कामों की जिम्मेदारी अफसरों को दी गई थी। 

यद्यपि, बंजल की यात्रा के पहले ही मामला उजागर हो गया। मीडिया-सोशल मीडिया के रास्ते केन्द्रीय दूरसंचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया तक पहुँच गया। उन्होंने कारण बताओ नोटिस जारी कर कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी। यात्रा रद्द हो गई। अब आगे जो हो, सो हो। पर सवाल रह गया- मंत्री ने भ्रष्टाचार के ऐसे मामले पर संज्ञान लिया, अच्छी बात है, मगर क्या कभी अपने आस-पास भी देखा है? मध्य प्रदेश में उनके समर्थक राज्य सरकार के मंत्री खुले तौर पर भ्रष्टाचार में लिप्त बताए जाते हैं, उनका क्या? उनके समर्थक विधायक और अफसर, विशेष रूप से परिवहन विभाग में, करोड़ों रुपयों के अवैध लेन-देन में शामिल पाए जाते हैं, उनका क्या? क्या वह शिष्टाचार है?

अब ठीक इसी तरह का दूसरा मामला। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान परिषद (एनसीईआरटी) की आठवीं की सामाजिक विज्ञान की किताबों में एक प्रसंग आ गया, न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का। यह गलती से हुआ या किसी ने जानबूझकर किया, इसकी जानकारी जाँच के बाद सामने आएगी। लेकिन शीर्ष अदालत ने इस पर जिस तेजी से संज्ञान लिया और एनसीईआरटी के निदेशक समेत पूरी सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया, उससे लगा मानो अदालती भ्रष्टाचार के मामले पर बात करना गंभीर श्रेणी का अपराध हो! हाँ, यह ठीक है कि इतने छोटे बच्चों के दिमागों में इस तरह की बातें न भरी जाएँ तो ही अच्छा है। इसीलिए आनन-फानन में वह प्रसंग हटाया भी गया। 

हालाँकि क्या इससे न्यायपालिका पाक-साफ है, ऐसा पूरे भरोसे के साथ कहा जा सकता है? सर्वोच्च न्यायालय के एक बड़े वकील प्रशांत भूषण के लेख में इसका जवाब मिलता है। एक अंग्रेजी अखबार में लिखे उनके लेख के अनुसार, साल 2007 में ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की सर्वेक्षण रपट कहती है कि भारत के 77 प्रतिशत लोग मानते हैं कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है। अलबत्ता, अदालत की अवमानना के डर से न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के मामले उजागर करना मुश्किल होता है। यहाँ तक कि शीर्ष अदालत के न्यायाधीश भी यह बात सही मानते हैं।

दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश वर्मा के घर पर मिली अवैध जली हुई नगदी का मामला तो अब तक अनसुलझा ही है। पता तक नहीं चल सका कि उनके घर मिली नगदी किसकी थी, कैसे वहाँ तक पहुँची, उसमें आग लगी या किसी  कार्रवाई के डर से लगवाई गई? जबकि इसी न्याय-व्यवस्था के वरिष्ठ न्यायाधीश भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की सुनवाई करते वक्त अक्सर गंभीर किस्म की टिप्पणियाँ करने से नहीं चूकते। यूँ कि मानो वे खुद जिस वातावरण में हैं, वहाँ सभी का दामन एकदम झक सफेद हो!! यह विचित्र किस्म का विरोधाभास है, जो छोटे से लेकर बड़े तक और गाँवों-कस्बों से लेकर राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर करीब-करीब हर जगह पाया जा रहा है अब। 

इसीलिए ऊपर यह लिखा गया है, भ्रष्ट-आचार अब एक शिष्ट-विचार, इसे खत्म करना मुश्किल। अब कोई यह बात माने या न माने, क्या फर्क पड़ता है। सच्चाई तो यही है। 

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Neelesh Dwivedi

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