सेवा-तीर्थ में ‘भारतीय भाषाओं’ की सेवा नहीं हुई, आगे शायद ही हो!! वीडियो से समझिए!

टीम डायरी

भारत के प्रधानमंत्री कार्यालय के नए परिसर का उद्घाटन 13 फरवरी 2026 को हुआ। इसे नया नाम भी मिला ‘सेवा-तीर्थ’। क्यों? ताकि यह नाम याद दिलाता रहे कि प्रधानमंत्री और उनकी सरकार के मंत्री देश के नागरिकों की सेवा के लिए हैं, आधिपत्यपूर्ण शासन चलाने के लिए नहीं। इस सेवा-तीर्थ का ध्येय वाक्य, ‘नागरिक देवो भव’ है, अर्थात् (देश के) नागरिक देव यानि ईश्वर के समान हैं।

इस तरह का संदेश ओर विचार सुनकर अच्छा लगता है। इसके साथ ही अपेक्षाएँ भी बढ़ जाती हैं। लगने लगता है कि शायद अब सरकारी तंत्र देश के नागरिकों, उनकी भाषा, उनकी संस्कृति, उनकी परंपरा, उनके क्षेत्र, आदि सभी चीजों को सम-भाव से देखेगा, न कि गुलाम-सोच की प्रतीक अंग्रेजी के चश्मे से। अलबत्ता, कुछ ही देर में पता चलता है कि इस तरह की अपेक्षा रखना बेमानी है। 

नीचे दिया पहला वीडियो देखिए। देश के जाने-जाने भाषाविद् और संस्कृत के विद्वान नित्यानंद मिश्र जी बता रहे हैं कि कैसे ‘सेवातीर्थ’ के बाबू-तंत्र ने संस्कृत, हिन्दी जैसी भारतीय भाषाओं में अर्थ-अनर्थ कर रखा है।    

सिर्फ इतना ही नहीं। सेवा-तीर्थ का ध्येय-वाक्य ‘नागरिक देवो भव’ भी सहज सरलीकरण की मानसिकता वाली कार्य संस्कृति की मिसाल देता है। इस बारे में भी नित्यानंद जी ने नीचे दिए गए इस दूसरे वीडियो में विस्तार से बताया है। यह भी बताया है कि बेहतर विकल्प क्या हो सकते थे। 

अगर इन दोनों वीडियो को देख चुके हों तो अब बताइए, क्या ऊपर शीर्षक में जो लिखा वह गलत है कि “आगे भी सेवा-तीर्थ में भारतीय भाषाओं की सेवा शायद ही” हो? 

 

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