एक यात्रा, दो मुस्लिम ड्राइवर और दोनों की सोच….सूरत-ए-हाल गौरतलब!

नीलेश द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश

अभी एक तारीख को किसी जरूरी काम से भोपाल से पन्ना जाना हुआ। वहाँ ट्रेन की सुविधा नहीं है, इसलिए छतरपुर रेलवे स्टेशन तक रेलगाड़ी से और फिर वहाँ से आने-जाने की टैक्सी करने का विचार बना। इसलिए क्योंकि उसी दिन छतरपुर से भोपाल के लिए वापसी की ट्रेन भी थी। हम तीन लोग थे, मगर लौटना सिर्फ मुझे था। इसलिए ड्राइवर के साथ वाली टैक्सी का विकल्प चुना। हालाँकि मेरे एक मित्र के माध्यम से पहचान वाले की कार भी उपलब्ध हो रही थी। उसे खुद चलाकर ले जाने का विकल्प भी था। पर उससे थकान होने की सम्भावना थी और समय भी अधिक लग सकता था। इसलिए दूसरा विकल्प चुना गया। 

तो जैसे ही हम छतरपुर स्टेशन पर उतरे, हमें पता चला कि टैक्सी आने में 15-20 मिनट का समय लग सकता है। सो, इतनी देर क्या करते? इसलिए स्टेशन से पैदल ही बाहर निकले और एक टपरी पर चाय पीने बैठ गए। अभी चाय बनती कि उससे पहली ही गाड़ी आ गई। हमने औपचारिकता निभाते हुए ड्राइवर से पूछा, ‘भइया चाय पियोगे?’, उसने बड़ी सज्जनता से जवाब दिया, ‘जी नहीं सर, रोजे से हूँ।’ उसका जवाब सुनते ही हमारे माथे पर असहजता की शिकन पड़ी। लेकिन जल्दी ही हमने उसे झटक दिया। 

वैसे भी, हमारे पास समय कम था और कोई दूसरा विकल्प नहीं था। और फिर विचार यह भी आया कि हर मुसलमान पर शंका की जाए, यह ठीक बात नहीं है। और सच मानिए, हमारी आगे की यात्रा में हमारा यह दूसरा विचार ही काफी हद तक सही साबित हुआ। वह ड्राइवर सज्जन और व्यवहारकुशल सा लगा। रास्ते भर हमें वह कुछ न कुछ जानकारियाँ देता रहा। मसलन- आस-पास के पर्यटन स्थलों के बारे में, वहाँ चल रहे विकास कार्यों से जुड़ी, और पन्ना टाइगर रिजर्व से संबंधित, आदि। यद्यपि मुझे ये जानकारियाँ पहले से थीं, क्योंकि मेरा तो जन्म उस इलाके में हुआ है और पूरी पढ़ाई-लिखाई भी। फिर भी मैं सुनता रहा। 

महज डेढ़ घण्टे में हम पन्ना पहुँच गए। जहाँ, जिससे मिलना था, मिले। इस क्रम में हमें शाम के साढे चार-पाँच बज गए। अब इस वक्त मैं अकेला ही रह गया था। मेरे साथ आए साले साहब और उनकी पत्नी पन्ना में ही अपने रिश्तेदार के घर पर रुक गए थे। मेरे पास अब दो विकल्प थे। पहला- मैं तुरंत छतरपुर के लिए वापस लौट चलूँ। ड्राइवर भी शायद यही चाहता था। ऐसा होने पर उसे अपने घर पर रोजा खोलने का मौका मिलता। लेकिन मेरे दूसरे विकल्प की तरफ मेरा ज्यादा झुकाव था। मैं पन्ना में श्री जुगलकिशोर जी के मन्दिर में दर्शन करने जाना चाहता था। मन्दिर रोज शाम सात बजे खुलता है। लिहाजा, मैंने ड्राइवर से अपने मन की बात कही और वह तुरंत तैयार हो गया। बोला, ‘कोई बात नहीं सर, मैं यहीं किसी मस्जिद में रोजा खोल लूँगा।” 

हम दोनों पन्ना बस-स्टैण्ड के पास बनी मस्जिद तक आ पहुँचे। उसने वहीं गाड़ी खड़ी कर दी और मैं भीतर बैठकर कुछ देर अपना काम करता रहा। ड्राइवर बाहर नमाज पढ़ने चला गया। फिर लौटा तो बाहर ही टहलता रहा। इतने में शाम के छह-सवा छह बज गए, तो मैंने उससे कहा, “चलो अब मन्दिर चलते हैं। वहीं पार्किंग में गाड़ी खड़ी कर देना। मैं दर्शन कर के लौटूँगा और हम सीधे वहाँ से छतरपुर के लिए निकल पड़ेंगे।”

लेकिन मेरा आश्चर्य कि उसने वहाँ जाने से मना कर दिया, बोला, “सर आप हो आइए, मैं आपको यहीं मिल जाऊँगा। होली, रमजान का समय है। और आजकल कभी भी लोग मन्दिरों के आस-पास, खासकर हम जैसे लोगों का आधार-कार्ड देखने लगते हैं। हमारी पहचान होने पर धक्का-मुक्की, मार-पीट करने लगते हैं। मैं नहीं चाहता कि कोई मसला खड़ा हो। आप ई-रिक्शा से हो आइए।” मैंने उसकी बात काटी नहीं।

दर्शन के बाद मैं लौटा तो वह रोजा खोल चुका था। वक्त भी हो चुका था। इसलिए हमने तुरंत वापसी की राह पकड़ ली। रास्ते में ड्राइवर के साथ मेरी सामान्य बातचीत होती रही। और ठीक रात सवा नौ के करीब हम छतरपुर रेलवे स्टेशन पर वापस पहुँच गए। मुझे छोड़कर वह वापस चला गया। कुछ देर बाद मेरी ट्रेन आ गई और मैं भोपाल की ओर से रवाना हो लिया। सुबह-सुबह साढ़े चार बजे भोपाल के संत हिरदाराम नगर स्टेशन पर उतरा तो वहाँ से घर तक जाने के लिए जो ऑटो मिला, संयोग से उसका ड्राइवर भी मुस्लिम था। मैंने उसे अपने घर के पास स्थित मुस्लिम समुदाय की निजामुद्दीन कॉलोनी का नाम बताया, ताकि वह जल्दी समझ सके। शायद इसीलिए उसने मुझे भी अपने समुदाय वाला समझ लिया और दोस्ताना सा बरतने लगा। 

और इस दोस्ताने में पता है, वह मुझे क्या बताने की कोशिश कर रहा था? यही कि शहर का “प्रशासन और पुलिस भीतर ही भीतर अपन से खौफजदा है। इसीलिए, होली के मद्देनजर बन्दिश लगाता हे तो रमजान को देखक उनको ढीला भी कर देता है।” ऐसा कुछ-कुछ और भी बताते हुए वह बार-बार भद्दी गालियाँ निकालते जा रहा था। मानो अपना सीना चौड़ा कर रहा हो। साथ में दावा यह भी कि “अपन लोग (मुझे अपने साथ वाला समझते हुए) तो पूरा भाईचारा बनाकर रखते ई हें, नईं क्या? पर कोई अपने को छेड़ेगा तो चुप थोड़ेई बेठेंगे। ओर बेठना भी क्यूँ चाहिए? बताइए सई हे कि नईं?” 

अब इन दो घटनाओं से कोई भी अंदाज लगा सकता है कि हमारे समाज का ताना-बाना आखिर कैसा आकार लेता जा रहा है या ले चुका है!          

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