रविवार और देवशयनी एकादशी- मतलब काम के बाद आराम का समय, भगवान के लिए भी!

नीलेश द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश

इन दिनों कामकाजी लोगों की दुनिया में कुछ शब्द बड़े लोकप्रिय हैं। पहला- ‘वर्कहॉलिक’, यानि वह व्यक्ति जिसे काम का नशा या लत है। दूसरा- ‘मूनलाइटिंग’ मतलब दिन में अपने नियमित काम के साथ-साथ रात को अतिरिक्त काम भी करना। और तीसरा- ‘हशल कल्चर’ अर्थात भभ्भड़ संस्कृति या काम में दिन-रात जुटे रहते हुए आगे बढ़ने की संस्कृति। जिन लोगों को दुनियावी तरक्की पाने और दुनियाभर की सुख-सुविधाएँ जुटाने का नशा है, वे लोग इन तीनों शब्दों को अपने साथ जोड़ने में गर्व महसूस करते हैं। अपनी शान मानते हैं। 

लेकिन वास्तविकता क्या है? दुनिया के कई अध्ययनों से साबित हो चुका है कि ’वर्कहॉलिक’ होना असल में एक मनोरोग है। ऐसा, जिसमें व्यक्ति अपनी निजी और पेशेवर जीवन के बीच का भेद भूल जाता है। ऐसे लोग न तो अपने परिवार को समय देते हैं, न मौज-मस्ती करते हैं और न दोस्तों से मिलते-जुलते हैं। खाली वक्त बिताना या अधिक आराम करना इन्हें बिल्कुल पसन्द नहीं होता। हालाँकि, इस अवस्था से गुजरते हुए वे खुद तनाव, अवसाद, दिल की बीमारी, उच्च रक्तचाप, मस्तिष्क आघात जैसे रोगों के शिकार हो जाते हैं। हाँ, अपने पेशे में वे सफल हो सकते हैं। मगर इस सफलता के बदले उन्हें ऐसा नुकसान उठाना पड़ता है, जिसकी भरपाई नहीं होती।  

इसी तरह ‘मूनलाइटिंग’ का मामला है। इमसें व्यक्ति अधिक पैसे कमाने या जल्दी से बड़ी पेशेवर सफलता हासिल करने के लिए अक्सर दो या तीन तक नौकरियाँ करता है। इस तरह, सही मायने में वह किसी भी नौकरी के साथ न्याय नहीं कर पाता है। परिवार, समाज, दोस्त, और यहाँ तक कि खुद के साथ भी उसका रिश्ता टूटता सा चला जाता है। यहाँ तक कि कई बार तो ‘मूनलाइटिंग’ की यह आदत सार्वजनिक तौर पर अपमान का कारण भी बन जाती है। जैसा कि हाल ही में सोहम पारेख नाम के एक युवक के साथ हुआ। वह अमेरिका में सूचना-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में काम करते हैं। लेकिन किसी एक नहीं बल्कि तीन-चार कम्पनियों में साथ-साथ। इससे उन्होंने पैसे तो खूब कमाए। लेकिन अब सच्चाई उजागर होने के बाद उन्हें असहज स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। 

ऐसे ही ‘हशल कल्चर’ यानि भभ्भड़ संस्कृति तो कामकाजी व्यक्ति को सीधे अस्पताल ही पहुँचा सकती है। जैसे, पिछले साल सितम्बर के महीने में मुम्बई के एक युवा उद्यमी कृतार्थ मित्तल को पहुँचा दिया था। उन्हें अचानक एक दिन ‘नर्वस ब्रेकडाउन’ हो गया था। इस स्थिति में व्यक्ति अचानक जोर-जोर से रोने लगता है, बहुत अधिक चिन्तित हो जाता है या कुछ ज्यादा ही भयभीत हो जाता है। कृतार्थ के भी ऐसी ही किसी स्थिति के शिकार होने के बाद अस्पताल में भर्ती कराए गए थे। वहाँ से उन्होंने लोगों को ‘हशल कल्चर’ से सचेत करने की गरज से सोशल मीडिया पर एक चर्चित पोस्ट लिखी थी। लोगों को अपनी सेहत का ध्यान रखने की सलाह दी थी। 

आज इन बातों का खास उल्लेख इसलिए किया गया क्योंकि दिन रविवार का है और अवसर देवशयनी एकादशी का। रविवार के दिन के बारे में तो क्या ही कहना क्योंकि सब जानते हैं कि यह सप्ताहभर के काम के बाद फुर्सत का, आराम का एक समय होता है। लेकिन देवशयनी एकादशी के बारे में बात जरूर की जा सकती है। भारत की सनातन परम्परा में देवशयनी एकादशी का अवसर वह होता है, जब माना जाता है कि सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु अगले चार महीने के लिए विश्राम करने चले जाते हैं। इससे पहले वे सृष्टि के सभी कामों के संचालन की जिम्मेदारी देवाधिदेव महादेव को सौंप जाते हैं। तो प्रश्न ये कि इसका व्यावहारिक अर्थ क्या है? 

बहुत सीधा सा है कि अपनी जिम्मेदारी के तहत आए कामों को करना ईश्वरपर्यन्त हर एक का पहला कर्तव्य है। लेकिन इन कामों को करते हुए बीच-बीच में अपने आराम ख्याल रखना, अपनी सेहत की चिन्ता करना, अपने परिवार को समय देना भी बेहद जरूरी है। देवशयनी एकादशी से देवउत्थापन एकादशी तक सृष्टि के संचालक श्रीहरि विष्णु भी यही करते हैं। तो फिर हम सामान्य इंसान भला क्यों खुदा बनने में लगे हैं? 

सोचिए और काम, आराम तथा सेहत के बीच सन्तुलन स्थापित कीजिए। इसी में हम सबकी और हमारे परिवार, समाज और राष्ट्र की भी भलाई है। इसी में वास्तविक प्रगति का सूत्र है।  

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