तेलंगाना कृषि विद्यालय के परिसर में वनीकरण के लिए मौजूदा पेड़ों को काटा गया है।
टीम डायरी
लगता है, तेलंगाना की रेवन्त रेड्डी सरकार ने नई नीति बना ली है कि ‘सरकारी जंगल’ लगाने के लिए ‘प्रकृति का जंगल’ उजाड़ना है। यह ‘सरकारी जंगल’ विभिन्न रूपों में सामने आ रहे हैं। कभी विकास सम्बन्धी किसी परियोजना के तौर पर तो कभी हास्यास्पद ‘वनीकरण’ के ही रूप में। अभी प्रोफेसर जयशंकर तेलंगाना कृषि विश्वविद्यालय परिसर में यह ‘वनीकरण’ के रूप में सामने आया है।
दरअस्ल, सोमवार, सात जुलाई को मुख्यमंत्री रेवन्त रेड्डी ने इस विश्वविद्यालय परिसर से ‘वन महोत्सव’ की शुरुआत की है। यह ‘सरकारी पौधारोपण अभियान’ है। इसके लिए परिसर के ‘वनस्पति उद्यान’ (बॉटनिकल गार्डन) के लगभग 20 एकड़ क्षेत्र में लगे सदियों पुराने हरे-भरे वृक्षों (लगभग 500 विभिन्न प्रजातियों के) को उजाड़ कर मैदान समतल कर दिया गया। यह कार्रवाई इसी शनिवार और रविवार (पाँच-छह जुलाई) को हुई है, ताकि मुख्यमंत्री यहाँ 3,000 नए पौधे (जैसा सरकार दावा कर रही है) रोप सकें।
सरकार की इस कार्रवाई का विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों और छात्र-छात्राओं ने भारी विरोध किया। लेकिन जिस तरह 20 बुलडोजरों से पेड़ों को उखाड़ फेंका गया, उसी तरह पुलिस के जवानों ने विरोध करने वालों को भी बलपूर्वक बुलडोज कर दिया। यानि धकियाकर उन्हें उन्हीं के ठिकानों (छात्रावास, आदि) तक सीमित कर दिया। इसके बाद वृक्षों को हटाने के कार्रवाई पर लीपापोती भी शुरू हो गई हे।
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर एल्डस जनैया तो इस कार्रवाई को उचित ठहराने में ही लग गए। उनका कहना है कि इस “कार्रवाई के तहत सिर्फ सुबबूल और यूकेलिप्टस के पेड़ हटाए गए हैं। वे मिट्टी और पर्यावरण को नुकसान पहुँचा रहे थे। वह भी 40 एकड़ में सिर्फ पाँच एकड़ के क्षेत्र में।” वहीं, सरकारी कार्रवाई का विरोध करने वालों का दावा है कि ‘वनस्पति उद्यान’ में विभिन्न औषधियों के लगभग 500 प्रजातियों के पेड़-पौधे थे, जिसे नुकसान पहुँचाया गया है। कार्रवाई भी पाँच एकड़ में नहीं, 20 एकड़ में हुई है।
अलबत्ता, ‘सरकारी जंगल’ के लिए ‘प्रकृति का जंगल’ उजाड़ने की यह कार्रवाई तेलंगाना में पहली बार नहीं हुई है। याद कीजिए, हैदराबाद विश्वविद्यालय परिसर से सटे कांचा गचीबावली के घने जंगल का मामला। इसे ‘हैदराबाद के फेंफड़े’ कहा जाता है। यह विशेषण जंगल की एहमियत बताता है। फिर भी सरकार ने बुलडोजरों की फौज भेजकर वहाँ करीब 104 एकड़ का क्षेत्र समतल करा दिया था। इसी फरवरी महीने में हुई कार्रवाई के वीडियो खूब सार्वजनिक हुए थे, जिनमें बेजुबान पशु-पक्षी जान बचाकर भागते दिखे थे।
इस कार्रवाई से देशभर के पर्यावरणप्रेमियों में आक्रोश फूट पड़ा था। कार्रवाई के विरोध में मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुँचा। शीर्ष अदालत ने एक विशेष दल बनाया, जिसने निष्कर्ष दिया कि पहली नजर में “पूरा क्षेत्र एक ‘घने जंगल’ की विशिष्टताएँ अपने आप में समेटे हुए है। यह क्षेत्र पारिस्थितिक रूप से सम्वेदनशील है।” इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल में सरकार को चेतावनी भरे लहजे में निर्देश दिया था कि या तो “उजाड़े गए जंगल को फिर से लगाएँ या फिर राज्य के मुख्य सचिव और अन्य अफसर जेल जाने को तैयार रहें।”
कांचा गचीबावली का जंगल 2,374 एकड़ में फैला है। इसमें से 400 एकड़ का क्षेत्र साल 2004 में एक निजी खेल अकादमी को आवंटित किया गया था। उसका काम शुरू हो नहीं पाया। इसलिए सरकार ने 2024 में जमीन वापस ले ली और इसे राज्य के उद्योग विभाग को हस्तान्तरित कर दिया। वहाँ विभाग को सूचना-प्रौद्योगिकी और मूलभूत ढाँचे से जुड़ी विकास परियोजनाएँ (सरकारी जंगल) शुरू करनी थीं।
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