धुरंधर : तमाम अस्वीकरण के बावजूद साफगोई से अपनी बात कहने वाली फिल्म!

समीर शिवाजीराव पाटिल, भोपाल, मध्य प्रदेश

फिल्में कालखण्ड का प्रतिनिधित्त्व करती हैं। वे अपने समय के भाषा-विचार, बिम्ब-पूर्वाग्रह-तकनीक और मूल्यों का चित्रण करती हैं। लेकिन कुछ फिल्में प्रवाहमान काल के बदलावों काे समेटे होती हैं। वे लीक से हटकर भावों को प्रस्तुत करने के लिए भाषा गढ़ती हैं। वे समाज की चेतना का साक्ष्य बनकर इतिहास में दर्ज हो जाती है। हालिया रिलीज फिल्म ‘धुरंधर’ सम्भवत: इसी श्रेणी की है। इस फिल्म की कामयाबी यही है कि यह हमारे बदलते काल का सचल दस्तावेज है। बेशक, समसामयिक होने के कारण दर्शक इसे दिलचस्प, आशा और ऊर्जा से भरा अनुभव कर रहे हैं। मगर यह न केवल हिन्दी सिनेमा के बदलते कालखण्ड की गवाह के रूप में याद की जाएगी, बल्कि आने वाले सिनेमा शिल्प के लिए एक भाषा, एक व्याकरण देगी।

ऐसा कहने के लिए जो मेरी मुख्य तर्कणा है, उस पर गौर कीजिए। फिल्म के आरम्भ में ही पुनरावृत्ति भरे अस्वीकरण (डिस्क्लेमर) हैं।  उनमें बार-बार, प्रकारांतर से यही दावा किया गया है कि इसमें सब कुछ गल्प है, काल्पनिक है। फिल्म का उद्देश्य मात्र मनोरंजन है। इसके बाद यह भी देखिए कि ‘धुरंधर’ बड़ी नकारात्मक समीक्षाओं और विवादित बयानों के साथ दर्शकों के बीच आई। नामी और प्रतिष्ठित आलोचकों ने इसे ‘इस्लाम विरोधी’, ‘पाकिस्तान के’ प्रति वीभत्स हिंसा भाव से भरी से लेकर ‘हिन्दुत्व की पोषक’ तक कहा गया। तो सवाल यह कि ‘समझदार फिल्म आलोचकों’ ने इसके अस्वीकरण पर ध्यान क्यों नहीं दिया?

दरअसल, समीक्षाओं, टिप्पणियों और विवादित बयानों भरी स्थापित सत्ता की यह नकारात्मकता ही फिल्म के लिए एक प्रभावी प्रचार अभियान साबित हुई है, ऐसा लगता है। वैसे सिनेमा तो गल्प होता ही है। हम इसे इसी तरह लेते हैं। फिर ‘धुरंधर’ से ही सत्यनिष्ठा की इतनी कठोर अग्निपरीक्षा की अपेक्षा क्यों? तो बात यह है कि हर गल्प का एक परा-यथार्थ होता है। वह नए नजरिए को स्थापित कर पुराने शब्द-बिम्बों को बदल कर रख देता है। ‘धुरंधर’ स्थापित प्रतिमानों का आवाहन नहीं करती। यह उन्हें सरका देती है और अपने परायथार्थ में नए अर्थ, व्यंजनाएँ और नए प्रतिमान गढ़ती है। वैसे, मजे की बात है कि यथार्थवादी समानांतर सिनेमा भी गल्प ही रहा है! वह बस, एक बौद्धिक दम्भ का लिहाफभर लपेटे था, जो मानसिक गुलामी और जड़ता के चलते हटा नहीं था।

हालाँकि, अभी यहाँ ‘धुरंधर’ की बात करेंगे, जिसके कथानक में परतों की तकनीक का इस्तेमाल हुआ है। इस तकनीक को अपनाने के पीछे सम्भवत: वे विखण्डित खबरें हैं, जो इस्लामोफोबिया और बहुसंस्कृतिवाद की मजबूरी में अक्सर दिखाई जाती हैं। ऐसा करके सच को छिपाने, उसे अलग दिशा देने या तोड़ने-मरोड़ने की कोशिश होती है। उदारहण के लिए ऑस्ट्रेलिया में सिडनी के बॉन्डी बीच (समुद्र तट) पर रविवार, 14 दिसम्बर को हुए हत्याकाण्ड को ही ले लें। वहाँ धार्मिक उत्सव मना रहे यहूदियों का कत्लेआम करने की कोशिश की गई। इस कोशिश में 16 निर्दोष लोगों की जान चली गई। अलबत्ता, इस हत्याकाण्ड की खबरें जब मीडिया में जारी हुईं, तो सबसे पहले अहमद-अल-अहमद का नाम प्रमुखता से सुर्खियों में आया, जिन्हाेंने हमलावरों से बन्दूक छीनकर कई लोगों की जान बचाई। अच्छी बात है। पर इसके बाद जब हमलावरों की पहचान के संकेत मिले, तो उस सूचना को सीधे देने के बजाय उसे अलग दिशा देने की कोशिश की जाने लगी, क्योंकि हमलावर भी मुस्लिम ही थे। पाकिस्तानी मूल के नागरिक साजिद अकरम और उसके बेटे नवीद अकरम ने इस हत्याकाण्ड को अंजाम दिया, यह सोमवार सुबह तक पता चला। 

‘धुरंधर’ का कथानक अपनी परतदार तकनीक से इसी विखण्डित सोच से सच को देखने-दिखाने की परम्परा को तोड़ता है। साथ ही, फिल्म दर्शकों के लिए गुंजाइश भी छोड़ती है कि वे अपनी समझ के विस्तार और गहराई के हिसाब से रसास्वादन कर सकें। इसमें घटनाक्रम बहुत तेजी से बदलते हैं। नाट्य, संगीत का अतिआभासी प्रयोग भी है। गल्प में इतिहास, भूराजनीति, ऐतिहासिक नाम काल्पनिक कथानक में गूॅथे गए हैं। पटकथा, छायांकन और कथानक पर जबरदस्त और निष्ठुर नियंत्रण रखा गया है। यही वजह है कि पूरी फिल्म में कहीं वैसी कमजोरी नहीं जो उसे कमजोर साबित कर दे। फिल्म का निर्देशन, मार-धाड़, संगीत सब नए फार्मूले गढ़ते दिखते हैं।

अक्षय खन्ना, रणवीर सिंह, राकेश बेदी आदि कलाकारों के अभिनय का कमाल बयां करने के लिए तो सोशल मीडिया पर हजारों रील्स चल रही हैं। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि ‘धुरंधर’ प्रचलित मान्यताओं को बेपर्दा कर देती है। फिल्म अपना कथानक खेदरहित होकर रखती है। उसमें कहीं न कहीं भारतीयों का आत्मविश्वास भी झलकता है, जो अपने अनुभवों के आस्वादन में दूसरों की स्वीकृति की लालसा नहीं करता। जो दुनिया को अपनी नज़र से देखने, समझने के लिए तैयार है, भले इससे दूसरों की प्रचलित मान्यताएँ आहत होती हों। फिल्म अपना नजरिया बिना किसी लाग-लपेट या महानता के बोझ के बस यूँ ही प्रस्तुत कर देती है। शायद यही साफगोई दर्शकों के अंतस को झंकृत करती है। 

(नोट : समीर #अपनीडिजिटलडायरी की स्थापना से ही साथ जुड़े सुधी-सदस्यों में से एक हैं। भोपाल, मध्य प्रदेश में नौकरी करते हैं। उज्जैन के रहने वाले हैं। पढ़ने, लिखने में स्वाभाविक रुचि हैं। वैचारिक लेखों के साथ कभी-कभी उतनी ही विचारशील कविताएँ लिखते हैं। डायरी के पन्नों पर लगातार उपस्थिति दर्ज़ कराते हैं। सनातन धर्म, संस्कृति, परम्परा तथा वैश्विक मसलों पर अक्सर श्रृंखलाबद्ध लेख भी लिखते हैं।) 

—– 

समीर के पिछले 10 लेख 

20 – वैश्विक अर्थव्यवस्था के दुष्चक्र में फँसा भारत इससे बाहर कैसे निकल सकता है?
19- भारत के मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई सेवानिवृत्त हो रहे हैं, मगर सवाल छोड़ जा रहे हैं
18 – क्या डोनाल्ड ट्रम्प एक ‘विदूषक’ और अमेरिकी सत्ता ‘प्रहसन’ बन गई है?
17- भारत पर अमेरिका का 50 फीसद सीमा शुल्क भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद कैसे? 
16- विवाह के योग्य न रह जाना भारतीय समाज में आज आम प्रचलित बात कैसे हो गई? 
15- खुद के मूल्यों पर खड़ा होना ही भारत के लिए चुनौती और अवसर भी!
14- समझने की बात है कि अमेरिकी-चीनी मानदंडों वाला विकास भारत में नहीं चल सकता! 
(दूसरा भाग)
13- अमेरिकी ‘रिलीजियस लिबर्टी कमीशन’, यानि भारत में ईसाई धर्मान्तरण का षड्यंत्र फिर तेज!
12- इजरायल-ईरान संघर्ष क्या तीसरे महायुद्ध की सुगबुगाहट है?
(पहला भाग)  
11- ‘आज्ञा सम न सुसाहिब सेवा’ यानि बड़ों की आज्ञा मानना ही उनकी सबसे बड़ी सेवा है!

सोशल मीडिया पर शेयर करें
From Visitor

Share
Published by
From Visitor

Recent Posts

पर्यावरण दिवस, ईंधन बचाने की बातें और निजी कारों का ऐसा तमाम-जाम, दिलचस्प है न?

मैं बेंगलुरू में जहाँ रहता हूँ, वहाँ अपने घर के सामने रोज इस तरह का… Read More

3 hours ago

लिंक्डइन के जरिए नौकरी का जाल, चीन से पाँच देशों की जासूसी, भारतीय भी सावधान रहें!

लिंक्डइन के जरिए नौकरी का जाल बिछाकर, रोजगार की तलाश कर रहे लोगों को काम… Read More

1 day ago

‘शिक्षक’ ने अपने कौड़ी के ज्ञान से ‘पत्रकार’ को दो कौड़ी का साबित कर दिया, देखिए वीडियो!

देश की एक जानी-मानी ‘पत्रकार’ ने ऑनलाइन पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए कह दिया कि… Read More

2 days ago

क्या हम भारतीयों को सार्वजनिक नियम-कायदे मानने की तमीज नहीं? अभी बहस तो यही है!

अभी एक-दो दिन से मीडिया-सोशल मीडिया में यह बहस चल रही है कि हम भारतीयों… Read More

3 days ago

अपने हिस्से का योगदान दीजिए, वरना लू के थपेड़ों से रोज 3,400 लोग मरने लग जाएँगे!

एक नया अध्ययन हुआ है। इसमें भारत और उसके आस-पास के देशों में लगातार बढ़ती… Read More

4 days ago

इस लड़की ने दो लाख की नौकरी छोड़कर 60 हजार रुपए महीने में खुशी खरीदी है!

खुशी पाने के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते। ज्यादातर लोग अमूमन बड़ी से बड़ी नौकरी… Read More

5 days ago