अमेरिका में रह रहे पुणे निवासी अभिजीत दिपके इन दिनों सुर्खियों में हैं।
टीम डायरी
छत्रपति संभाजीनगर, महाराष्ट्र के रहने वाले दंपति भगवान और अनीता दिपके इन दिनों बेहद परेशान हैं। हमेशा चिंतित रहते हैं। उनकी रातों की नींद छिन गई है। उन्हें डर लगा रहता है कि कहीं उन्हें, उनके परिवार या उनके बेटे को कुछ हो न जाए। कहीं भीड़ उनके घर पर हमला न कर दे। कोई अनहोनी न हो जाए। हालाँकि महाराष्ट्र पुलिस ने उनके घर पर 24 घण्टे की सुरक्षा का बंदोबस्त कर दिया है, फिर भी उनका डर है कि जाता नहीं है।
जानते हैं, ऐसा क्यों है? क्योंकि अपने जिस बेटे को उन्होंने अमेरिका पढ़ने के लिए भेजा था, वह वहीं से बैठे-बैठे भारत में सक्रिय अराजकतावादियों का मोहरा बन चुका है। नाम है- अभिजीत दिपके, जो यूँ तो बोस्टन, अमेरिका में पत्रकारिता की उच्चशिक्षा लेने गए थे, लेकिन इन दिनों अपनी ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ की वजह से देश ही नहीं, दुनिया में सुर्खियों बटोर रहे हैं। यह कोई राजनैतिक दल नहीं है, लेकिन कल को हो जाए तो कहा नहीं जा सकता। हालाँकि अभी तो यह एक ऑनलाइन मंच है। वेबसाइट और सोशल मीडिया के विशेष पेजों के माध्यम से लोगों के बीच जगह बनाने वाले इस मंच के साथ महज हफ्ते-10 दिन में ही 19 करोड़ से अधिक लोग जुड़ गए हैं, ऐसा बताते हैं।
अभिजीत का दावा है कि उन्होंने भारत के मुख्य न्यायाधीश के एक बयान की प्रतिक्रिया में महज मजाक में इंस्टाग्राम पर यह पेज शुरू किया था। उन्हें अंदाज नहीं था कि इसे इतनी जल्दी और ऐसी जबर्दस्त लोकप्रियता मिल जाएगी। अलबत्ता उनका यह भी कहना है कि अब उन्हें विभिन्न माध्यमों से तरह-तरह की धमकियाँ दी जा रही हैं। इसमें जान से मारने की धमकी और भारत लौटने पर गिरफ्तारी की चेतावनी भी शामिल है। यह भी दावा किया है कि उनके खिलाफ कार्रवाई हो रही है। उनके मंच की वेबसाइट और उससे जुड़े सोशल मीडिया पेज बंद कर दिए गए हैं।
अलबत्ता, बात इतनी सीधी नहीं है, जितनी अभिजीत बता रहे हैं। दरअसल, यह कहानी शुरू हुई तब, जब इसी मई की 15 तारीख को देश के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कुछ ‘विशेष युवाओं’ पर प्रतिकूल मौखिक टिप्पणी कर दी। उन्हें कॉकरोच और परजीवी जैसा बता दिया। उन्होंने एक दिन बाद ही इस पर सफाई भी दी और कहा कि उनकी टिप्पणी उन युवाओं पर थी जो फर्जी उपाधियों (डिग्रियों) के जरिए वकालत जैसे संभ्रांत पेशों में आ जाते हैं और वहाँ स्थापित व्यवस्था को कमजोर करने की कोशिश करते हैं। देश के काबिल युवाओं के प्रति उनके मन में कोई संदेह नहीं है। उन्हें तो वह देश का मजबूत स्तंभ मानते हैं। पर बात बनी नहीं।
बात क्यों नहीं बनी? क्योंकि तब तक अभिजीत ‘अपना’ कॉकरोच जनता पार्टी मंच लेकर सामने आ चुके थे। देखते ही देखते उसकी लोकप्रियता जंगल की आग की तरह फैलने लगी थी। उस मंच से जुड़ने वालों की संख्या दिन दूनी, रात चौगुनी बढ़ती जा रही थी। अभिजीत के मंच से लगातार और बहुत पेशेवर तरीके से पोस्ट-दर-पोस्ट डाली जा रही थीं। यहाँ तक कि जब देश के सबसे पुराने राजनैतिक दल के ‘मालिक-नेता’ (नाम आसानी से समझा जा सकता है) ने ‘नीट’ (चिकित्सा महाविद्यालयों में प्रवेश के लिए राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा) पेपर-लीक की घटना के आधार पर केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की माँग की तो अभिजीत के मंच से उसे भी समर्थन दिया जाने लगा। इतना ही नहीं, ‘मालिक-नेता’ ने जब युवाओं से सरकार के खिलाफ आन्दोलन तेज करने की अपील की, तो उनके ‘पुश्तैनी राजनैतिक दल’ के नेताओं ने अभिजीत के मंच को आधार बनाकर अन्य कई मुद्दों पर मिलती-जुलती पोस्ट करनी शुरू कर दीं। ताकि अगर कहीं कोई चिंगारी सुलग रही है तो उसे सरकार के खिलाफ आग का रूप दिया जा सके। बता दें कि यही ‘मालिक-नेता’ जनवरी-2025 में कह चुके हैं कि उनकी लड़ाई भारत (राज्य) के खिलाफ है।
सो ऐसी कड़ियाँ जब जुड़ीं, तो देश की अंदरूनी खुफिया एजेंसी (इंटेलीजेंस ब्यूरो) सक्रिय हुई। उसकी जाँच में सामने आया कि अभिजीत की अपनी पृष्ठभूमि भी राजनैतिक रही है। वह साल 2020 से 2023 तक आम आदमी पार्टी की सोशल मीडिया अभियान शाखा के सदस्य रहे हैं। यही नहीं, अगस्त-2019 में भारत सरकार ने जब जम्मू-कश्मीर से हमेशा विवादित रहे संविधान के अनुच्छेद-370 को निष्क्रिय किया, तब उसके खिलाफ आवाज उठाने वालों में भी अभिजीत आगे रहे हैं। तब उनके खिलाफ लीगल राइट्स ऑब्जरवेटरी नामक संस्था ने पुणे पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई थी और कहा था कि वह अलगाववादी संगठन हुर्रियत की शैली में कश्मीर में अलगाववाद का समर्थन कर रहे हैं। ऐसे तथ्य सामने आने के बाद इंटेलीजेंस ब्यूरो ने सरकार को रिपोर्ट दी। उसमें आशंका जताई कि अभिजीत के मंच के जरिए देश में युवाओं को भड़काने, अराजकता फैलाने की कोशिश हो सकती है।
इसी रिपोर्ट के बाद अभिजीत के मंच के विरुद्ध कार्रवाई सख्त हुई। वैसे, यहाँ एक बात और ध्यान दिला दें। नरेन्द्र मोदी जब से देश के प्रधानमंत्री बने हैं, तब से ही अराजकतावादी तत्त्व देश में अस्थिरता फैलाने का कोई मौका छोड़ नहीं रहे हैं। पहले- नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ महीनों तक दिल्ली की सड़कों पर धरने हुए। किसानों के लिए लाए गए कानूनों के विरोध में आन्दोलन खड़ा करने की कोशिश की गई। यहाँ तक कि 26 जनवरी 2021 को तो लाल किले पर भी धावा बोल दिया गया। राष्ट्रीय ध्वज की भी अवमानना कर दी गई। ऐसे कई छोटे-बड़े आन्दोलनों के जरिए हर बार कोशिशों का लक्ष्य एक ही नजर आया कि कैसे भी नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, में हुए युवाओं के अराजक आन्दोलनों की तरह भारत में भी सरकार के खिलाफ देशव्यापी अराजकता फैला दी जाए। अलबत्ता अब तक तो देश के युवाओं ने ऐसे प्रयासों को सफल नहीं होने दिया है। पूरी उम्मीद है कि वह आगे भी ऐसा नहीं होने देंगे।
मगर अभिजीत जैसे कुछ युवा जब ‘अराजकतावादियों का मोहरा’ बनते हैं, तो जरूर थोड़ी चिंता होती है। जाहिर तौर पर इसीलिए उनके माता-पिता की चिंता और उनका डर भी बेवजह तो नहीं हो सकता!
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