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जैव राज-नीति समझते हैं? नहीं समझते ताे यह कहानी पढ़िए, समझ जाएँगे!

समीर शिवाजीराव पाटिल, भोपाल, मध्य प्रदेश

दुनिया के अधिकांश देशों में जब से लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था मजबूत हुई है, तभी से हुक्मरानी (राज करना) की एक और नीति भी प्रचलन में आई है। उसके लिए एक शब्द गढ़ा गया है, ‘बायो-पॉलिटिक्स’ यानी ‘जैव राज-नीति’। फ्रांस के एक चिंतक, दार्शनिक हुए हैं माइकल फॉकाल्ट। उन्होंने 1970 के दशक के दौरान अपने लेखन में पहली बार इस ‘जैव राज-नीति’ की अवधारणा का उल्लेख किया, ऐसा माना जाता है। मोटे तौर पर इस अवधारणा का अर्थ यूँ लगाते हैं कि कारोबारी-उद्योगपति घराने आम जनता की छोटी से छोटी आदतों पर भी अपना पूरा नियंत्रण स्थापित करें और सरकारें इस काम में उनकी मदद करें। इस तरह दोनों के गठजोड़ से शासन किया जाए।

मतलब आम आदमी क्या खाएगा, क्या पहनेगा, कब सोएगा, कब उठेगा, किस बीमारी से बीमार पड़ेगा, इलाज के लिए कौन सी दवा लेगा, आदि सब कुछ सरकारों की मदद से कारोबारी-उद्योगपतियों की मर्जी और उनके नफे-नुकसान के हिसाब से तय होता है, इस जैव राज-नीति में। सामान्यीकरण करें, तो इसे यूँ भी कह सकते हैं कि बाजार यह निर्धारित करता है कि हमें कब-क्या खाना चाहिए और क्या नहीं, कब-कितना सोना चाहिए, क्या पहनना चाहिए, इत्यादि। मिसाल के तौर पर कोरोना महामारी को लीजिए। इस महामारी से कब, कहाँ, कितने लोग बीमार पड़ेंगे और उन्हें किस कंपनी के टीके, लगाए जाएँगे, यह किसने तय किया? बाजार ने या कहें कि बड़े दवा कारोबारियों ने। 

इसी तरह, हमें अपने देशों की परंपरागत वेश-भूषा की जगह जींस-टीशर्ट पहनना चाहिए, यह किसने बताया? बाजार ने। सामान्य परंपरागत तरीके से चूल्हे पर खाना पकाना, तेल की जगह रिफाइण्ड ऑयल, शुद्ध साफ पानी की जगह आरओ का या बोतलबंद पानी, दातून की जगह ब्रश और टूथपेस्ट, वगैरा। ऐसा सब किसने तय किया? बाजार ने। शिक्षा पद्धति भी परंपरागत के बजाय निजी विद्यालयों और विश्वविद्यालयों की ज्यादा बेहतर है, पाठ्यक्रम उन्हीं का अच्छा है, यह किसने बताया? बाजार ने। मतलब रोजमर्रा के जीवन में हमारी कोई आदत ऐसी नहीं बची, जो बाजार से या कहें कि ‘जैव राज-नीति’ से निर्देशित न होती हो। इसी कारण ‘जैव राज-नीति’ को दूसरे शब्दों में, लोगों को गुलाम बनाने की नई आधुनिक नीति के तौर पर भी परिभाषित किया जाता है और यह कुछ गलत भी नहीं। 

अब यही बात इस कहानी के जरिए समझिए। आसानी से जल्दी समझ आएगा। और यह भी कि वास्तव में हमें करना चाहिए… 

सन् 2047। दिल्ली के नए हवाई अड्‌डे के पास के इलाके ‘जेवर’ नाम बदलकर ‘मेडिसिटी’ हो चुका है। पुराना जुमला ‘स्मार्ट सिटी’ खप चुका है। ‘मेडिसिटी’ देश-विदेश से बड़ी मुद्रा अर्जित कर रहा है। इसलिए यह अपना लिया गया है। शहर के हर चौराहे पर अब एक बड़ा होर्डिंग लगा दिखता है, ‘इंजेक्शन लें, स्वस्थ रहें।‘ हर नागरिक की कलाई पर एक छोटी चिप बँधी हुई है, जो उसकी दवाइयों का हिसाब रखती है। जिस दिन भी किसी ने कोई गोली नहीं खाई, चिप लाल हो जाती है। इसी ‘मेडिसिटी’ में अर्जुन शर्मा रहता है। यही कोई 45 साल की उम्र का पत्रकार। ‘मेडिसिटी’ का इकलौता आदमी, जिसकी चिप पिछले छह महीने से हरी नहीं हुई है। इसलिए नहीं कि वह बीमार है, बल्कि इसलिए कि उसने कोई दवा ही ली नहीं ली है। क्योंकि वह बीमार ही नहीं पड़ा है। 

“तुमने आज सुबह की एंटी-एंजाइटी वाली गोली नहीं ली?” पत्नी रीना ने नाश्ते की मेज पर बैठते ही सवाल दागा।  “मुझे कोई चिंता नहीं है, तो दवाई क्यों लेना?” अर्जुन ने कहा। “अरे, यही तो चिंता की बात है”, ऐसा कहते हुए रीना ने गोली उसकी तरफ सरका दी। हालाँकि अर्जुन ने उसकी तरफ देखा भी नहीं। इससे रीना चिंतित हो उठी।

अर्जुन एक पुराने कस्बाई अखबार ‘दिल्ली दर्पण’ में काम करता है। अलबत्ता, अखबारों में खबरें कम और विज्ञापन अधिक छपने लगे हैं। अखबार के हर पन्ने पर किसी न किसी दवा का विज्ञापन। खबरें उनके बीच में, इतनी छोटी, जैसे दवाई की पर्ची पर कहीं साइड-इफेक्ट्स लिख दिए गए हों। अब सोचिए कि जब खबरें ही नहीं, तो सरकार को जगाने, उसकी आलोचना वाली खबरें कहाँ होंगीं? सब नदारद। लेकिन अर्जुन अपना काम मुकम्मल तरीके से कर रहा है। पूरी ईमानदारी और शिद्दत के साथ। वह एक बड़े मामले की पड़ताल कर रहा है। 

अर्जुन ने देखा था कि पिछले 20 सालों में देश की आबादी का 94 प्रतिशत हिस्सा हर रोज औसतन सात दवाइयाँ खा रहा है। पैदा होते ही बच्चे को 22 टीके लगाए जाते हैं, न सिर्फ बीमारियों के लिए, बल्कि ‘भविष्य की संभावित बीमारियों’ के भी। इन्हीं में एक टीका था, ‘वैक्स हैप्पी-7’। किसलिए? भविष्य में उदासी की संभावना को 40% कम करने के लिए। मतलब जो अभी-अभी पैदा हुआ है, उसके बारे में यह मान और मनवा लिया गया है कि वह आने वाले वक्त में उदासी का शिकार होगा ही। इसलिए पहले से बचाव का इंतजाम किया जा रहा है!!

‘लेकिन क्या कोई सच में बीमार है?’ अर्जुन ने अपनी डायरी में लिखा।

एक शाम अर्जुन ‘केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय’ की पत्रकार वार्ता में पहुँचा है। मंत्री जी का नाम- डॉ. प्रफुल्ल वाधवा। एक बड़ी फार्मा कंपनी के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी। वर्तमान में देश के स्वास्थ्य के रक्षक। वे बता रहे हैं, “इस साल हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि देश में मौतों की दर 12% कम हुई है।” तालियाँ। बहुत सारी तालियाँ।

इसी बीच अर्जुन ने हाथ उठाया, “सर, क्या यह सच है कि जिन बीमारियों की दवाएँ हम ले रहे हैं, उनमें से 60% बीमारियाँ 2020 से पहले अस्तित्त्व में ही नहीं थीं?” तालियाँ बंद, अब कमरे में सन्नाटा है। 

डॉक्टर वाधवा मुस्कुराए और बोले, “देखिए, विज्ञान की एक प्रक्रिया है। हम भविष्य की नई बीमारियों को पहले ही  पहचान लेते हैं और उनका इलाज करते हैं। यही प्रगति है।”

“लेकिन सर, क्या प्रगति यह नहीं होनी चाहिए कि बीमारियाँ कम हों, न कि दवाइयाँ ज्यादा?” सन्नाटा, इस बार लंबा खिंचा, जवाब कोई नहीं आया।

पत्रकार वार्ता के बाद दो आदमी अर्जुन के पास आए। उनके हाथों की चिपें गहरी नीली थीं। मतलब था कि वे सरकारी अधिकारी थे और नीली चिप यानि ‘विश्वसनीय।’ आते ही उन्होंने अर्जुन से सवाल किया, “आपकी चिप छह महीने से लाल है। क्यों भला?” “क्योंकि मैं स्वस्थ हूँ इसलिए”, अर्जुन ने जवाब दिया। “यही तो दिक्कत है कि…” दूसरे ने कहा। उसकी आवाज में चिंता झलक रही थी।

अगले हफ्ते अर्जुन को ‘स्वास्थ्य मूल्यांकन केन्द्र’ बुलाया गया। एक बड़ी इमारत, जिसकी दीवारें सफेद और जिन पर हर जगह ‘हैल्थ फर्स्ट फार्मा’ के इश्तिहार चस्पा थे। वही कंपनी जिसमें डॉ. वाधवा के परिवार की हिस्सेदारी थी। मूल्यांकन केन्द्र में अर्जुन की विस्तृत स्वास्थ्य जाँच हुई। डॉक्टर सुनीता कपूर ने अर्जुन की सारी रिपोर्ट देखीं और देखते हुी उनके माथे पर बल पड़ गए, “आपका ब्लड प्रेशर परफेक्ट है।” “शुगर नॉर्मल है।” “कोलेस्ट्रॉल एकदम ठीक है।” “पर ऐसा कैसे हो सकता है? यह बहुत असामान्य बात है।”

“स्वस्थ होना असामान्य है?” अर्जुन ने पूछा। 

“इस उम्र में, इस शहर में, हांँ” और डॉक्टर ने एक नुस्खा लिखा, “यह लीजिए। यह ‘प्री-हाइपरटेंशन रिस्क रिड्यूसर’ है। आपको अभी हाई बीपी नहीं है, लेकिन हो सकता है।”

“पर मैं तो बीमार नहीं हूँ?”

“आप अभी बीमार नहीं हैं। लेकिन बीमार होने की स्थिति में हैं।”

अर्जुन को कुछ समझ नहीं आया। उसने पर्ची ली, बाहर गया, और उसे कचरादान में डाल दिया। मगर उसे यह ध्यान नहीं रहा कि वहीं एक कैमरा लगा हुआ है। उसकी हरकत रिकॉर्ड हो चुकी है।   

तीन दिन बाद अर्जुन के दरवाजे पर दस्तक हुई, सुबह के छह बजे।

“अर्जुन शर्मा?” उसके घार आए एक अधिकारी ने पूछा। उसके पीछे चार और खड़े थे।

“हाँ।”

“आपको ‘जन स्वास्थ्य संरक्षण अधिनियम-2039’ की धारा 47-बी के तहत सूचित किया जाता है कि आपकी जीवनशैली अन्य नागरिकों के लिए खतरा है। आप संभावित बीमारियों से पूर्व सुरक्षा के लिए टीके नहीं लगवा रहे हैं और अनुशंसित दवाइयों का सेवन भी नहीं कर रहे हैं।”

“लेकिन मैं तो स्वस्थ हूँ। मुझे इस सब की आवश्यकता नहीं है और मैं किसी को संक्रमित भी नहीं कर रहा हूँ।”

“ऐसी बात नहीं है,” अधिकारी ने समझाया, “आपकी मौजूदगी एक ‘वैकल्पिक आदर्श’ प्रस्तुत करती है। लोग देखते हैं कि आप दवा नहीं खाते और ठीक हैं। यह अस्थिरकारी है।”

उसकी बात सुनकर अर्जुन को हँसी आ गई। उसे सँभालते हुए उसने पूछा,  “तो मेरा अपराध यह है कि मैं ठीक हूँ?”

“आपका अपराध यह है कि आप ठीक हैं और वैसे दिखते भी हैं।”

अगले कुछ दिनों में अर्जुन को सरकारी अफसरों ने जबरन ‘अरण्यक्षेत्र’ भेज दिया। देश के उत्तर-पूर्व में एक दूरदराज के इलाके में। वहाँ उन सभी को भेजा जाता है, जो ‘दवा-प्रतिरोधी’ हैं। यानि दवाएँ लिए बिना ही स्वस्थ हैं। 

वहाँ अर्जुन ने देखा कि एक बुढ़िया थी। उम्र 78 साल। इस उम्र में भी वह रोज सुबह स्वच्छ नदी के ठण्डे पानी से नहाती थी। उसे पिछले 40 साल से कोई बीमारी नहीं हुई थी। एक किसान था, जो अपनी जमीन पर काम करता था। उसका रोग प्रतिरोधक तंत्र, डॉक्टरों के अनुसार, “असामान्य रूप से मजबूत” था। एक छोटी बच्ची थी, नौ साल की। पहला टीका लगते ही वह बेहोश हो गई थी। उसके माता-पिता ने अगला टीका लगवाने से मना कर दिया था। उन्हें इसी अपराध में यहाँ भेजा गया था। लेकिन वह बच्ची और उसके माता-पिता यहाँ ज्यादा स्वस्थ और प्रसन्न थे। 

अरण्यक्षेत्र में पहुँचते ही अर्जुन को एहसास हो गया था कि यह जगह बुरी नहीं है। वहाँ पेड़ थे, नदी थी, हवा में ऑक्सीजन थी, वह भी असली वाली, किसी कंपनी की बोतल वाली नहीं। लोग थे, जो बिना लाल-हरी-नीली चिप लगाए आराम से जी रहे थे। वहाँ पहली रात अर्जुन को आसमान में तारे भी दिखे, जो ‘मेडिसिटी’ में नहीं दिखते थे। वहाँ तो रात को भी होर्डिंग जगमगाते थे। उनमें लिखा होता था, ‘नींद नहीं आती? स्ली-प्रो लें!’

अर्जुन ने वहाँ एक डायरी लिखनी शुरू की। आदत थी। उसने लिखा…

21 नवंबर 2047 : “आज यहाँ रमेश काका को बुखार हुआ। उन्होंने अदरक का काढ़ा पिया। कल ठीक हो गए। मेडिसिटी में इसका नाम होता- ‘एक्यूट फेब्राइल एपिसोड, संभावित वायरल एटियलजी, तत्काल एंटीवायरल उपचार आवश्यक। और बिल होता 12,000 रुपए।”

22 नवंबर 2047 : “यहाँ के बच्चे मिट्टी में खेलते हैं। उनके घुटनों पर चोट लगती है। वे रोते हैं, उठते हैं, फिर भागते हैं। मेडिसिटी में बच्चों को हर खरोंच पर एंटीबायोटिक दी जाती है। हर छींक पर एंटी-एलर्जिक दवा। उनका रोग प्रतिरोधक तंत्र कभी लड़ना नहीं सीखता। उसे लड़ने ही नहीं दिया जाता।”

24 नवंबर 2047 : “क्या हम जानते हैं कि स्वस्थ होना कैसा लगता है? या हमें बस यही बताया गया है कि बीमार होना ‘सामान्य’ है और दवा लेना ‘जिम्मेदारी’?”

25 नवंबर 2047 : अनसूया मौसी पिछले हफ्ते से बीमार थी। आज शाम चार बजे वह बोली, “मुझे जमीन पर लिटा दो, मेरा समय आ गया है।” नीचे मिट्‌टी गोबर से लिपे फर्श पर 82 साल की उम्र में उन्होंने शांतिपूर्वक देह को छोड़ अनंत की ओर प्रस्थान किया। सब  कितना सहज है, स्वाभाविक, एकदम आध्यात्मिक सा?

अर्जुन को वहाँ छह महीने हो चुके थे। आज मेडिसिटी से एक अधिकारी अरण्यक्षेत्र आया। उसके हाथ में एक फाइल थी। “अर्जुन शर्मा?”, “हाँ।”, “सरकार ने आपको एक प्रस्ताव भेजा है। आप वापस आ सकते हैं। बशर्ते आप सार्वजनिक बयान दें कि अरण्यक्षेत्र में जीवन कठिन है। साथ ही, छह महीने का टीकाकरण और दवाई का कोर्स पूरा करें।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा। उसके पीछे पहाड़ थे। नदी थी। बुढ़ी काकी अपने बगीचे से कुछ उखाड़ रही थीं। मैदान में एक बच्ची दौड़ रही थी। उसने कुछ देर सोचा और बोला, “अगर मैं ऐसा न करूँ तो?” “तो आप यहीं रहेंगे। हमेशा के लिए।” अधिकार ने फाइल बंद कर दी। अर्जुन ने एक पल सोचा, सिर्फ एक पल और न कर दिया। 

[समाप्त — या शायद नहीं] 

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