कविता लिखते हो? पढ़ते तो होगे ही? ऐसे प्रश्न मुझे हमेशा असहज करते हैं क्योंकि…

अनुज राज पाठक, दिल्ली

यूँ ही कल किसी के विवाह में जाना हुआ। वहाँ मेरे परिचय के क्रम में एक व्यक्ति ने मुझे सभ्य समाज के अनुकूल शमश्रु और केशविन्यास में न पाकर बहुत सहज भाव से पूछ लिया, “भाई कविता करते हो?” यद्यपि मैं कविता तो करता नहीं। इसलिए क्या ही बोलता। चुप ही रह गया। लेकिन भीतर एक पल में बहुत शोर शुरू हो गया। 

एक आवाज थी, जो कहती थी कि तुम कहाँ के कवि हुए? जब मेघदूत, रघुवंश के रचनाकार कवि कालिदास स्वयं को अल्पमति कह रहे हो (क्व चाल्पविषया मतिः, तितीर्षुर्दुस्तरं मोहादुडुपेनास्मि सागरं। मन्दः कवियशः प्रार्थी गमिष्याम्युपहास्यतां। प्रांशुलभ्ये फले लोभादुद्वाहुरिव वामनः। अर्थात् : कहाँ मेरी बहुत ही सीमित बुद्धि! मैं तो उस मूर्ख की तरह हूँ, जो छोटी सी डोंगी (नाव – उडुपेन) के सहारे ही विशाल और दुस्तर (कठिनता से पार होने वाले) समुद्र (सागर) को पार करना चाहता है। मन्दबुद्धि (मन्दः) होने के बावजूद, मैं कवियों का यश (कवियशः प्रार्थी) पाने की चाहत में अपनी हँसी (उपहास्यतां) करवाऊँगा, ठीक वैसे ही, जैसे कोई बौना (वामन) ऊँचे स्थान पर लगे फल को पाने के लोभ में अपना हाथ ऊपर उठाता है (प्रांशुलभ्ये फले लोभादुद्वाहुरिव वामनः)।” )  

यही नहीं, जन-जन तक श्रीरामचरित मानस को प्रसारित करने वाले तुलसीदास जी कहते हैं, “कबि न होउँ नहिं बचन प्रबीनू. सकल कला सब बिद्या हीनू।” फिर मैं कैसे कह सकता हूँ कि “कविता करता हूँ।” और क्या ही कहूँ जब तुलसी महाराज कह रहे हैं कि “कबि न होउँ नहिं चतुर कहावउँ. मति अनुरूप राम गुन गावउँ।” यद्यपि इसके बाद भी वह प्रभु श्रीराम के गुण गाने का सामर्थ्य रखते हैं। मुझ से तो भगवान का नाम जप भी नहीं हो रहा। तो ऐसे में भला मैं अल्पमति यह मानने का भी दुस्साहस कैसे करता कि “मैं कविता करता हूँ।” 

उन सज्जन के पहले प्रश्न से ऐसे तमाम विचार मेरे दिमाग में उथल-पुथल मचाने लगे। मैं आत्मग्लानि से गलित हो रहा था कि तभी उन्होंने फिर एक प्रश्न उछाल दिया, “अच्छा पढ़ते तो होगे ही? बताओ फिर प्रिय कवि, प्रिय लेखक कौन है?” उनके इस प्रश्न का भी मेरे पास कोई उत्तर नहीं था। किसे प्रिय कहूँ? जिसे पढ़ता हूँ, वही प्रिय लगता है। उसी का काव्य मन हर लेता है। जैसे- कालिदास की उपमाएँ पढ़ते ही मन अभिभूत हो उठता है।

वह कहते हैं, “अनाघ्रातं पुष्पं किसलयमलूनं कररुहैरनाविद्धं रत्न मधु नवमनास्वादितरसम् |अखण्डं पुण्यानां फलमिव च तद्रूपमनघं न जाने भोक्तारं कमिह समुपस्थास्यति विधिः||” -अभिज्ञानशाकुन्तल (2/10) अर्थात्- शकुंतला का वह निर्दोष सौन्दर्य एवं रूप लावण्य ऐसा फूल है, जो सूँघा नहीं गया है। वह नाखूनों से न कटा हुआ अक्षत कोंपल है, ऐसा जो बिंधा नहीं है तथा ऐसा नवीन मधु है, जिसके रस का आस्वादन ही नहीं किया गया | उसका वह रूप मानो उसके जन्म-जमान्तर के लिए पुण्यों का अखण्ड फल है| पता नहीं, विधाता किस को उसके उपभोग करने वाले के रूप में प्रस्तुत करेगा। 

ऐसी उपमाएँ पढ़कर कालिदास जी किसे प्रिय नहीं लगेंगे? इंदुमती स्वयंवर में दीपशिखा के समान जिस राजा को छोड़ कर आगे बढ़ जाती है, उस राजा का मुख मलिन हो जाता है जैसे प्रकाश के आगे बढ़ जाने से पीछे घना अंधकार शेष रह जाता है। (संचारिणी दीपशिखेव रात्रौ यं यं व्यतीयाय पतिंवरा सा। नरेन्द्रमार्गाट्ट इव प्रपेदे विवर्णभावं स स भूमिपालः ॥ अभिज्ञान 6/67)

फिर भवभूति को देखिए, “एको रस: करुण एव” एक ही रस है, वह है करुण रस। ऐसा कहते हुए वह अपने काव्य से श्रीराम की हार्दिक पीड़ा व्यथा को पाठक के हृदय में स्पंदित कर देते हैं। अब ऐसे करुण प्रेम काव्य को करने वाला कवि किसी को भी प्रिय क्यों न होगा?

वैसे यहाँ ऐसा सोचा जा सकता है कि कहाँ संस्कृत कृवियों की बातें लेकर बैठ गया। आजकल इन्हें अकादमिक के अलावा पढ़ता ही कौन है? तो चलिए हिन्दी के कुछ कवियों की वेदनाओं को अनुभूत करते हैं। “वह तोड़ती थी पत्थर, देखा मैंने इलाहाबाद के पथ पर” मानवीय श्रम के ऐसे कारुण्य पक्ष को अभिव्यक्त करने वाले “निराला”(सूर्यकांत त्रिपाठी) ही हो सकते हैं। इसी तरह जिनके हृदय की गहराइयों से कविता फूट पड़ती है वे शंकर (जयशंकर प्रसाद) की तरह वेदना रूप विष को हृदय में समाते हुए कहते हैं, “इस करुणा कलित हृदय में अब विकल रागिनी बजती। क्यों हाहाकार स्वरों में वेदना असीम गरजती?” बताइए, कैसे इन वेदनामयी प्रश्नों का उत्तर दिया जा सकता है। और फिर विरह वेदना से आहत कवि हैं, जो अपनी प्रियतमा से कह उठते हैं, “छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया, बाले! तेरे बाल-जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन? भूल अभी से इस जग को!” ये पंत ( सुमित्रानंद) जी हैं। प्रकृति की ऐसी आराधना करने वाले किसे ही प्रिय नहीं होंगे?

इन्हीं कवियों की प्रेरणाओं से कभी-कभी कुछ पंक्तियाँ उकेरने का दुस्साहस मैं भी कर लेता हूँ। फिर भी कवि तो नहीं ही हूँ मैं। हाँ, मेरे प्रिय कवि बहुत हैं। वह मेरा प्रोत्साहन हैं, सृजन की प्रेरणा और ऊर्जा भी। वही ऊर्जा हमेशा मुझे जमीन से लगाकर रखती है। और वह जमीन मुझे अनुभव कराती है कि आगे की राह बहुत लम्बी है। उस पर चलते हुए अभी मैंने तिनका भी नहीं उठाया है। यही कारण है कि कविता लिखते हो? जैसे प्रश्न मुझे बेचैन करते हैं। 

—— 

(नोट : अनुज राज पाठक दिल्ली में संस्कृत विषय के शिक्षक हैं। #अपनीडिजिटलडायरी की स्थापना से ही साथ जुड़े सदस्यों में शामिल हैं। अच्छे लेख और कविताएँ लिखते हैं। कभी-कभी श्रृंखलाबद्ध लेखन भी करते हैं।) 

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