‘दुर्योधन’ पर भरोसा रखो, युद्ध तो होकर रहेगा! देखिए, ‘आज के दुर्योधन’ कहाँ-कौन हैं!!

नीलेश द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश

महाभारत युद्ध से ठीक पहले का प्रसंग है। धर्मराज युधिष्ठिर चाहते थे कि किसी तरह युद्ध टाला जा सके तो अच्छा हो। आखिर युद्ध से कभी किसी का भला नहीं हुआ। लिहाजा, उन्होंने श्रीकृष्ण से आग्रह किया कि एक बार शांति का अंतिम प्रयास कर लिया जाए। उन्होंने श्रीकृष्ण से ही शांतिदूत बनकर हस्तिनापुर जाने का अनुरोध किया। उनसे पाण्डवों की ओर से दुर्योधन को आश्वासन देने को कहा कि अगर वह सिर्फ पाँच गाँव उन्हें देने को राजी हो जाए, तो पाण्डव उतने में ही संतोष कर लेंगे। युद्ध टल जाएगा। अज्ञातवास के बाद पाण्डवों के ठिकाने पर भोजन के दौरान यह चर्चा हो रही थी। श्रीकृष्ण रिश्ते में युधिष्ठिर के छोटे भाई (मामाजी के लड़के) थे। उन्होंने उनकी बात को आज्ञा माना और शांतिदूत बनकर जाने के लिए अपनी सहमति दे दी। यह देख द्रौपदी परेशान हो गईं। भोजन के बाद वह श्रीकृष्ण के हाथ धुलाने के लिए जब बाहर आईं तो उन्होंने पूछा, “केशव, तो क्या अब युद्ध नहीं होगा?” तब श्रीकृष्ण ने उनसे कहा, “कृष्णे, तुम दुर्योधन पर भरोसा रखो, वह शांति के मेरे सभी प्रयास विफल कर देगा, युद्ध तो होकर रहेगा।” 

यह कहानी बरसों-बरस से यूँ ही चली आ रही है। युग बदले, लेकिन ‘दुर्योधन’ नहीं बदला। वक्त के साथ उसके चेहरे बदले। सनकी शासकों की सूरत में बार-बार लौटा। उसने दुनिया को युद्धों, महायुद्धों, विश्व युद्धों में धकेला। सिकंदर, मुसोलिनी, हिटलर, अय्यूब, याह्या, और ऐसे ही कई। इस वक्त फिर एक ‘दुर्योधन’ (अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प) जिद पर अड़ा है। वह दुनिया को अपनी सनक के हिसाब से चलाना चाहता है। उसने अपने पड़ोसी (वेनेजुएला) देश पर हमला कर उसे अपने कब्जे में कर लिया है। वहाँ के राष्ट्रपति (निकोलस मादुरो) को बंदी बना लिया है। वह एक अन्य देश (ईरान) के शासक को खुली धमकियाँ दे रहा है। उन्हें सत्ता छोड़ने पर मजबूर करने के लिए वहाँ के युवाओं को हिंसा के लिए भड़का रहा है। उन प्रदर्शनकारियों सैन्य मदद देने को भी तैयार बैठा है।

वह अपने ही बरसों पुराने सहयोगी मुल्कों (यूरोप के) के एक द्वीप (डेनमार्क के ग्रीनलैण्ड, जहाँ पिटुफिक में अमेरिकी सैन्य अड्डा है) पर कब्जा करने की तैयारियाँ कर रहा है। धमकियाँ दे रहा है। यहाँ तक कि वहाँ कब्जे के इरादे से फौज भेजना भी शुरू कर दिया है। यही नहीं, हिन्द महासागर के एक अन्य द्वीप (मॉरीशस के चागोस, जहाँ के डियेगो गार्सिया पर अमेरिकी सैन्य अड्डा है) पर भी कब्जे का इरादा जता चुका है। वह डण्डे (विभिन्न देशों के साथ द्विपक्षीय व्यापार पर मनमाना सीमा शुल्क लगाना या उसकी धमकी देना) के जोर पर मध्य पूर्व के एक क्षेत्र (फिलिस्तीन के गाजा) में ‘स्थायी शांति’ स्थापित करने की इच्छा रखता है। इसके लिए अपने मनमुताबिक बनाए शांति समूह में जबर्दस्ती तमाम ऐसे देशों को शामिल होने का दबाव बना रहा है, जो एक-दूसरे की बराबरी से किसी आधार पर खड़े नहीं होते (जैसे- रूस-यूक्रेन, भारत-पाकिस्तान, आदि)। इससे भी बड़ा विरोधाभासी पहलू यह कि वह ‘सनकी शासक’ हमेशा से शांतिप्रिय छवि वाले देश (भारत) में अशांति और आतंकवाद फैलाने वाले मुल्क (पाकिस्तान) को भरपूर शह दे रहा है। ताकि शांतिप्रिय देश के शासक उसकी मनमानी शर्तें मानें और झुकें, या पड़ोसी का आतंकवाद बर्दाश्त करें। 

विचित्र बात है कि वह ऐसी सनकी हरकतों के बावजूद खुद को दुनिया में ‘शांति का मसीहा’ मानता है। बार-बार इच्छा जताता है कि उसे शांति का सर्वोच्च पुरस्कार दिया जाए। नहीं दिया जाता, तो वह उस पुरस्कार को लूट लेता है। साथ ही साथ उस पुरस्कार के लिए आधिकारिक रूप से उसे न चुनने वाले देश (नॉर्वे) को खुले पत्र में धमकी देता है कि अब वह दुनिया में शांति बनाए रखने के लिए कतई जिम्मेदार नहीं है। अब वह वही करेगा, जो उसे ठीक लगेगा। और इससे भी दिलचस्प बात कि उससे शह पाया हुआ ‘जिहादी जनरल’ (पाकिस्तान का फेल्ड मार्शल आसिम मुनीर) भी पड़ोसी देश (भारत) को खुली धमकी दे रहा है कि वह अपने लक्ष्य के बेहद करीब आ चुका है। 

अब बताइए, युद्ध टलेगा या होकर रहेगा? जवाब सभी को पता है, जो युद्ध के लिए फड़फड़ा रहे हैं उन्हें और जो अब तक किसी तरह उसे टालने की कोशिश कर रहे हैं उन्हें भी। लेकिन एक बात ‘आज के दुर्योधनों’ को निश्चित रूप से नहीं पता है। महाभारत के युद्ध के अंत में दुर्योधन को उसकी पराजय (भीमसेन से गदा युद्ध में) के बाद तड़प-तड़प कर मर जाने के लिए छोड़ दिया गया था। और उसकी तो छोड़िए, अभी हमारे युग में, कुछेक साल पहले हिटलर जैसे नाम, सूरत वाले जितने ‘दुर्योधन’ हुए हैं न, उनका भी हश्र अंत समय में वैसा ही हुआ है। ध्यान रहे।   

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