सेना प्रमुख उपेंद्र द्विवेदी में भारतीय संस्कृति की समझ और शत्रु-बोध की कमी है क्या?

अनुज राज पाठक, दिल्ली

भारत के सेना प्रमुख उपेंद्र द्विवेदी जी ने हाल ही में कहा है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना उस समय हमला नहीं करती थी, जिस समय उस तरफ (पाकिस्तान में) नमाज का समय होता था। क्योंकि ‘सबका मालिक एक’ है! यह कथन अत्यधिक चिंताजनक है। इसलिए कि एक विशाल देश के सेना प्रमुख ऐसी बातें केवल सोच नहीं रहे है, अपितु उन्हें युद्ध के दौरान व्यवहार में भी ला रहे हैं।

सेना प्रमुख के कथन से प्रश्न उठता है कि उनमें भारतीय संस्कृति की समझ और शत्रुबोध की कमी है क्या? इसे हम ‘रामायण’ के उदाहरण से समझ सकते हैं। राम-रावण युद्ध चल रहा था। रावण के पुत्र इंद्रजित ने देखा कि विरोधी पक्ष बहुत मजबूत है, तो उसने शत्रु पर अपराजेय शक्ति प्राप्त करने हेतु अपनी कुल देवी की आराधना शुरू कर दी। इसकी जानकारी श्रीराम के योद्धाओं को हो गई। तब मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने आज्ञा दी और उनके योद्धाओं ने इंद्रजित की उस आराधना में व्यवधान उपस्थित कर उसकी पूजा भंग कर दी। ताकि वह अपराजेय शक्ति प्राप्त न कर सके।

यहाँ देखने की बात है कि श्रीराम और रावण के पक्षों की पूजा पद्धति समान थी। दोनों पक्षों के आराध्य भी समान थे। यहाँ तक कि दोनों पक्षों की संस्कृति भी समान थी। इसके बाद भी श्रीराम सेना के योद्धाओं ने शत्रु की पूजा भंग की,  क्योंकि उनमें शत्रु-बोध था। जबकि इसके ठीक उलट हमारे वर्तमान सेना प्रमुख में वह शत्रुबोध दिखाई नहीं देता। अब सोचिए, जिस सेना प्रमुख के पास शत्रु-बोध ही नहीं, उसकी सेना जीत कैसे सकती है? सिर्फ ही एक ही सूरत है कि शत्रु सेना में पौरुष ही न हो, अन्यथा ऐसे नेतृत्त्व वाली सेनाएँ प्रत्यक्ष युद्ध में पराजित ही होती हैं। भारतीय इतिहास ऐसे कई उदाहरणों से भरा पड़ा है, जहाँ भारतीय राजाओं-सेनापतियों में मात्र शत्रु-बोध के अभाव के कारण उनकी सेनाओं को शत्रुओं के हाथ से पराजय का सामना करना पड़ा है। इसीलिए सेना प्रमुख उपेन्द्र द्विवेदी का कथन चिंतनीय है।

सेना प्रमुख ने यह बयान किस कारण दिया, यह ज्ञात नहीं लेकिन उनका कथन निश्चित रूप से सामान्य जनमानस के मन पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला है। क्योंकि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद भारत के पर्वों, अमरनाथ जैसी धार्मिक यात्राओं और स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्वों तक का लिहाज नहीं करता। फिर हमें उनका लिहाज क्यों करना चाहिए? ऐसी अनावश्यक श्रेष्ठता के भाव के कारण ही भारत को सैकड़ों साल गुलाम रहना पड़ा, यह हम भूल क्यों रहे हैं? 

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(नोट : अनुज राज पाठक दिल्ली में संस्कृत विषय के शिक्षक हैं। #अपनीडिजिटलडायरी की स्थापना से ही साथ जुड़े सदस्यों में शामिल हैं। अच्छे लेख और कविताएँ लिखते हैं। कभी-कभी श्रृंखलाबद्ध लेखन भी करते हैं।) 

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