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“अपने बच्चों को इतना मत पढ़ाओ कि वे आपको अकेला छोड़ दें!”

निकेश जैन, इन्दौर मध्य प्रदेश

“अपने बच्चों को इतना मत पढ़ाओ कि वे आपको अकेला छोड़ दें!” अभी इन्दौर में जब मैं एक अन्तिम संस्कार में गया, तो वहाँ मुझे एक सज्जन से यह बात सुनने को मिली। उनके रिश्तेदार का निधन हुआ था। 

कहानी कुछ ऐसी थी कि 80 साल के आस-पास की उम्र के दम्पति इन्दौर में अकेले रहते थे। उनका एक ही बेटा था, जो क़तर के दोहा शहर रहता है। दो बेटियाँ हैं। दोनों दिल्ली में हैं। जिनका निधन हुआ, उनकी पत्नी मधुमेह की वजह से देखने की शक्ति खो चुकी हैं। इन्हीं स्थितियों में ही रात के वक़्त उनके पति का निधन हो गया। लेकिन कई घंटों तक किसी को पता ही नहीं चला क्योंकि दोनों अकेले रह रहे थे।

बाद में जब आस-पड़ोस वालों को जानकारी लगी, तो उन्होंने उनके बच्चों को सूचना दी। उनके तीनों बच्चे अन्तिम संस्कार के मौक़े पर ही वहाँ पहुँच सके थे। उसी दौरान वह बात भी मेरे कानों में पड़ी, जो ऊपर लिखी है। निश्चित रूप से बात कड़वी है, मगर आज के समाज की सच्चाई भी यही है। 

मैं ऐसे कई माता-पिता को जानता हूँ, जो 70-80 साल की उम्र में भी अकेले रह रहे हैं। किसी तरह जीवन काट रहे हैं। मैंने ऐसे लोग भी देखे हैं, जिनके अन्त समय में बच्चे उनके पास नहीं थे, क्योंकि वे बहुत दूर रह रहे थे। कई तो दूसरे देश में भी। मैंने ऐसे लोग भी देखे हैं, जिनके बच्चे उनके अन्तिम संस्कार तक में शामिल ही नहीं हो सके। यही नहीं, मैंने कुछ मामले इस तरह के भी देखे हैं, जब पुत्र ने जानबूझकर माता या पिता के अन्तिम संस्कार में नहीं आने का निर्णय लिया, क्योंकि वह 15 दिन पहले ही उनके पास होकर गया था। 

यह मैं अपने अनुभव से कहता हूँ कि हमारे माता-पिता हमेशा हमारा भला ही चाहते हैं। उन्हें हमारी सफलताओं पर गर्व होता है। लेकिन साथ ही वे यह भी चाहते हैं कि हम उनके साथ में न सही, तो कम से कम आस-पास रहें। इसलिए नहीं कि उन्हें हमारी परवरिश के बदले में हमसे कुछ चाहिए। बल्कि इसलिए क्योंकि हम इंसानों को भगवान से इसी तरह का बनाया है। यहाँ तक कि मैं ख़ुद भी यही चाहता हूँ कि मेरी सन्तानें मेरे नज़दीक ही रहें। मैंने अपने मन की बात अपनी बेटियों को खुलकर बताई भी है। 

यही नहीं, मैं अपने माता-पिता के साथ भी इन दिनों अधिक से अधिक समय बिताने की कोशिश किया करता हूँ। जितना अधिक सम्भव हो पाता है, मैं इन्दौर में ही रहता हूँ। और जब मैं उनके पास होता हूँ तो सच मानिए, वे बहुत ख़ुश होते हैं। क़िस्मत से मेरा काम भी मुझे यह गुंज़ाइश देता है कि मैं उसे चाहे जहाँ से करूँ। इसलिए मुझे काम और माता-पिता की ज़िम्मेदारियों के बीच समझौता नहीं करना पड़ता।

हालाँकि मैं जानता हूँ कि मेरी तरह सुविधा सबके पास नहीं होती। तो ऐसे लोगों के लिए मेरा सुझाव है कि बीच का रास्ता तलाशिए। अगर दूर रह रहे हैं, तब भी जितना अधिक, जितनी बार भी सम्भव हो माता-पिता के पास जाइए। याद रखिए, सिर्फ़ उन्हें पैसों की मदद देना ही पर्याप्त नहीं है। बुज़ुर्गियत में उन्हें हमारी-आपकी ज़रूरत होती है। वे हमारी नज़दीकी चाहते हैं। इसके साथ यह भी ध्यान रखिए कि उड़ान भरने के लिए हमें पंख हमारे माता-पिता ने दिए हैं। इसलिए बुढ़ापे में जब उनके पंख कमज़ोर हो जाएँ, तो हमें ही उनको सहारा देना चाहिए।  

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निकेश का मूल लेख

“Don’t teach kids so much that they go far away leaving you alone”

This is what someone said in a condolence meet yesterday in Indore while remembering a relative who passed away.

Here goes the story – this old couple in their 80s was living alone in Indore. The only son was in Doha, Qatar and two daughters living in Delhi. Wife had lost her eyesight due to severe diabetes. Three days ago during night time husband passed away but no one knew for few hours as they were all alone.

When people came to know, kids were informed and they all visited for the last rites.

During prayer service one of the gentlemen said –

“अपने बच्चों को इतना मत पढ़ाओ कि वे आपको अकेला छोड़ दें!”

This sounded rude during a prayer service but he touched upon a prevailing issue in the society today.

I know so many parents in their eighties who are living alone and somehow managing. I also know many who passed away but kids were far away (in other countries) that time. I know few cases where kids couldn’t reach in time and I also know cases where son decided not to visit because he had visited 15 days ago before his father passed away!

This is my experience – our parents always want best for us. They take pride in our success. But at the same time they wish that we were staying with them or close to them. Not because they need anything from us, it’s just because as humans we are built that way. (I want my kids to stay close to me and I am very explicit about this with my daughters).

These days I try to spend as much time as possible with my parents in Indore and I must tell you – they feel very happy about it. Fortunately, my job allows me to work from anywhere so I don’t have to compromise with my work but I understand not everyone is that lucky.

Here is my advice – find a middle ground. If you are staying away, try to visit them as much as possible. Providing financial help is not enough; what they need is you.

Parents give us wings to fly high but same parents need us when their wings are not so strong!

Thoughts? 

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(निकेश जैन, कॉरपोरेट प्रशिक्षण के क्षेत्र में काम करने वाली कंपनी- एड्यूरिगो टेक्नोलॉजी के सह-संस्थापक हैं। उनकी अनुमति से उनका यह लेख अपेक्षित संशोधनों और भाषायी बदलावों के साथ #अपनीडिजिटलडायरी पर लिया गया है। मूल रूप से अंग्रेजी में उन्होंने इसे लिंक्डइन पर लिखा है।)

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47 – उल्टे हाथ से लिखने वाले की तस्वीर बनाने को कहा तो एआई ने सीधे हाथ वाले की बना दी!
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44 – भोपाल त्रासदी से कारोबारी सबक : नियमों का पालन सिर्फ़ खानापूर्ति नहीं होनी चाहिए
43 – ध्याान रखिए, करियर और बच्चों के भविष्य का विकल्प है, माता-पिता का नहीं!
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