ये नई उभरती कम्पनियाँ हैं, या दुकानें?…इस बारे में केन्द्रीय मंत्री की बात सुनने लायक है!

टीम डायरी

इस साल के जनवरी महीने की 15 तारीख़ तक के सरकारी आँकड़ों के अनुसार, भारत में अभी 1.59 लाख स्टार्टअप हैं। ‘स्टार्टअप’ यानि आम तौर पर ऐसी नई उभरती कम्पनियाँ, जो सूचना-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नवाचार करें। इन स्टार्टअप की संख्या के मामले में भारत अब दुनिया में तीसरे नम्बर पर है, ऐसा सरकारी रिकॉर्ड बताता है। लेकिन केन्द्र सरकार के मंत्री, वह भी वाणिज्यिक मामलों के मंत्रालय के मुखिया, पियूष गोयल की राय अलग है।

मीडिया और सोशल मीडिया पर उनका एक वीडियो प्रसारित हो रहा है। ‘स्टार्टअप महाकुम्भ’ में दिए उनके भाषण का है। उस पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं। अपन उन पर बात नहीं करेंगे, क्योंकि वे निजी विचार हैं। कोई उनसे सहमत हो सकता है, या नहीं भी। लेकिन मंत्री जी ने जो कहा, उस पर बात करना ज़रूरी है, क्योंकि वह देश के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। इसलिए पहले नीचे दिए गए वीडियो में उनका वक्तव्य सुनना ज़रूरी है।  

मंत्री जी की बात में स्पष्ट सन्देश यही है कि देश के तमाम स्टार्टअप इन दिनों ऐसे व्यवसायों में लगे हैं, जो ‘स्टार्टअप’ की परिभाषा में कम, ‘दुकानों’ की छवि में ज़्यादा दुरुस्त बैठते हैं। यही नहीं, ये बेरोज़गार युवाओं को भी ‘डिलीवरी ब्वाय/गर्ल’ में तब्दील कर रहे हैं। पैसे वाले ‘आलसी क़िस्म’ के लोगों के घरों तक खाने-पीने की चीज़ें पहुँचा रहे हैं। किराने का सामान पहुँचा रहे हैं। इस तरह उन्हें और ‘आलसी’ बना रहे हैं। कुछ नया बनाने की बात आती है, तो ‘फैन्सी आईस्क्रीम’ जैसी चीज़ें बना रहे हैं। ऐसे व्यवसायों से इन स्टार्टअप को मुनाफ़ा तो ज़रूर हो रहा है, लेकिन देश को उनके व्यवसाय से अपेक्षित फ़ायदा नहीं हो रहा है। 

दूसरी तरफ़, पड़ोसी देश चीन है, जहाँ की नई उभरती कम्पनियाँ लगातार ‘मशीनी बुद्धिमत्ता’ (एआई) के नए-नए और सफ़ल प्लेटफॉर्म ला रही हैं। वहाँ की कम्पनी लगातार नवाचार कर रही हैं। ऑटोमेशन (जहाँ काम करने के लिए इंसानों की ज़रूरत नहीं होती या बहुत कम होती है), रोबोटिक्स, मशीन लर्निंग, आदि में नित नए प्रयोग कर रही हैं। नए उत्पाद वगै़रा लाकर दुनिया के बाज़ार में क़ब्ज़ा करती जा रही हैं। यह सब भारत के स्टार्टअप भी कर सकते हैं। बशर्ते, अपने उद्देश्य को वे सही तरह पहचानें।  

लिहाज़ा, भारत के स्टार्टअप मालिकों और उनमें पैसा लगाने वालों, दोनों को सोचना चाहिए कि वे पहुँचना कहाँ चाहते हैं? “हम रोते रह सकते हैं। या हम आगे आकर दुनिया का नेतृत्त्व करने के लिए ख़ुद को तैयार कर सकते हैं। चुनाव हमें ही करना है।” 

बातें तो सोलह आने ठीक ही कही हैं मंत्री जी ने, ‘सरोकार’ से जुड़ी हुईं और ‘रोचक-सोचक’ तरीक़े से। इसलिए सोचिए, देश के भविष्य का मामला है।

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Neelesh Dwivedi

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