यदि जीव-जन्तु बोल सकते तो ‘मानवरूपी दानवों’ के विनाश की प्रार्थना करते!!

अनुज राज पाठक, दिल्ली

काश, मानव जाति का विकास न हुआ होता, तो कितना ही अच्छा होता। हम शिकार करते, खाना खाते, यायावरी करते और सो जाते। पूरा जीवन इसी प्रक्रिया में गुजर जाता। लेकिन नहीं, ईश्वर ने घोर अपराध किया हमें बुद्धि देकर। और अब इस अपराध की सजा ईश्वर की बनाई प्रकृति की संरचना भुगत रही है।

मानव ने अपने समानान्तर दानव की कल्पना की है। हमने अपने जीवन में दानव तो नहीं देखा। लेकिन जिस दानव की कल्पना मनुष्य ने की है, वे दानवीय रूप मनुष्यों के मध्य अवश्य देखे हैं। कभी वह ‘मानवरूपी दानव’ दूसरे जीवित की ही नहीं, किसी निर्बल मनुष्य की भी हत्या करते पाया जाता है। कभी अपने घृणित स्वार्थ के लिए कभी बच्चों-बच्चियों का अपहरण करते पाया जाता है। कभी कहीं वह महिलाओं का बलात्कार करता दिखाई दे जाता है। कभी खुद की श्रेष्ठता और अपने विकास के लिए प्रकृति को नष्ट करते पाया जाता है।

मुझे तो अब मानव स्वभावत: दानव नजर आता है। अस्वाभाविक तौर पर उनमें से किसी किसी में मानवीय गुण दिखाई दे जाते हैं। अगर ऐसा नहीं होता, तो आज प्रकृति का हर जीव केवल दानव अर्थात् मानव से पीड़ित नहीं होता। बल्कि मैं तो कहता हूँ कि मनुष्य को दानव नहीं अपितु अतिदानव कहना उचित होगा क्योंकि वह अपने सजातीय जीव मनुष्य को भी नष्ट करने में संकोच नहीं करता। फिर प्रकृति पर दया करने का सवाल ही कहाँ बचता है! 

ऐसा विचार मेरे मन में यूँ ही नहीं आया है। उसका कारण है। बताता हूँ। अभी कहीं भी देखिए विकास, विकास और विकास का शोर दिखाई देता है। इस विकास ने केवल मनुष्यों के आवासों को ही नष्ट नहीं किया, अपितु पशुओं, पक्षियों, कीट-पतंगों और न जाने कितने जीवन तथा वनस्पतियों को हमेशा के लिए नष्ट कर दिया है।

हमें विकास के लिए सड़कें चाहिए… चलो जंगल काटते हैं। विकास के लिए घर बनाने है… फिर जंगल काटते हैं। हमें मौज-मस्ती सैर सपाटा करना है… चलो जंगल काटते हैं। उद्योग लगाने हैं… फिर जंगलों की ही बलि दी जानी है। यह सब इतनी तेजी से किया जाता है कि जब तक कोई कुछ समझे, जंगलों का विनाश हो चुका होता है।

पिछले पाँच दिनों में विरोध के बाद भी तेलंगाना में हैदराबाद विश्वविद्यालय के समीप 400 में से 100 जंगल (कांचा गचीबावली) नष्ट कर दिया गया। वहाँ सैकड़ों जीव-जन्तु मारे गए या अपना जीवन बचाने को इधर-उधर भाग गए। वहाँ लगातार सैकड़ों बुलडोजर सुन्दर जमीन को श्मशान में बदल रहे हैं। यह देखकर तो लगता है कि इन जीवों का जीवन नष्ट होने से अच्छा है, मानव जीवन ही इस धरा से नष्ट हो जाए। कम से कम अन्य सब तो सुरक्षित संरक्षित रहेंगे।

कल्पना कीजिए कि पेड़ अगर बोल पाते तो अपनी व्यथा चिल्ला-चिल्ला कर कहते- हे मानवरूपी दानव, मैंने तो तुमसे कुछ नहीं माँगा। तुम्हारे जीवन के लिए प्राण वायु, फल पत्तियाँ लकड़ी आदि सब दिया ही है। तो क्यों मेरा जीवन नष्ट कर रहे हो? क्या मेरे उपकार का बदला मेरी मृत्यु है? अगर ये जीव बोल पाते तो कहते- हे दानव, क्यों मेरे आवासों को हम से छीन रहा है। मेरे छोटे-छोटे मासूम बच्चों ने तेरा क्या बिगाड़ा, जो इन्हें मारने पर लगा हुआ है। हमने कभी तेरे रास्ते में आकर तेरा कुछ नुकसान नहीं किया। फिर क्यों हमारे जीवित रहने मात्र से परेशान है? अगर जंतु बोल सकते तो निश्चित ही मानवरूपी दानवों के विनाश की प्रार्थनाएँ करते। 

भाइ रुको, थोड़ा ठहरो, विचार करो। ये हम कैसा विकास कर रहे हैं, जहाँ किसी अन्य जीव के जीवन का कोई महत्व नहीं। जहाँ प्रकृति केवल दोहन हेतु है। अब विचार करने का समय आ गया है। हमें अब ऐसा विकास नहीं चाहिए, जिसमें मनुष्य के अतिरिक्त सब नष्ट हो रहे हो। इससे अच्छा है कि हम आदि युग में फिर से लौट जाएँ।

वैसे भी इस विकास से हासिल क्या होगा? हम मानव के सुखी जीवन के लिए ही तो सब चाहते हैं। लेकिन ऐसा विकास मानव को सुखी कहाँ रहने दे रहा है? पहले प्रकृतिजन्य समस्याओं से मानव दुखी था। इस समस्या के समाधान हेतु आधुनिक विकास शुरू हुआ। लेकिन अब मानव स्वयं समस्या बनता जा रहा है। खुद ही खुद का और समस्त प्रकृति का विनाश करने लगा है। तो फिर ऐसे विकास की जरूरत ही कहाँ रही?

इसलिए अब इस विकासयात्रा पर विराम भी लगे, और आगे की यात्रा हेतु विचार भी हो। अपने को श्रेष्ठतम मानने वाले मनुष्यो, थोड़ा रुको। ईश्वर से डर नहीं लगता, तो कम से कम खुद की आत्मा के सद्गुणों पर तो दृष्टि डालो ही। जिससे हमारे साथ प्रकृति से सभी जीव भी अपने-अपने परिवारों के साथ सुकून से जी सकें। अन्यथा जिसे हम विकास समझ रहे हैं, वह वास्तव में विनाश है। साथ ही महाविनाश का आवाहन भी है। 

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(नोट : अनुज दिल्ली में संस्कृत शिक्षक हैं। #अपनीडिजिटलडायरी के संस्थापकों में शामिल हैं। अच्छा लिखते हैं। इससे पहले डायरी पर ही ‘भारतीय दर्शन’ और ‘मृच्छकटिकम्’ जैसी श्रृंखलाओं के जरिए अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। समय-समय पर दूसरे विषयों पर समृद्ध लेख लिखते रहते हैं।)  

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