दासोहम्, दासदासोहम्, अदिदासोहम्, बााजारदासोहम्!

टीम डायरी

एक पुरानी कहानी है। किन्हीं गुरुजी के दो शिष्यों में आपस में होड़ लगी हुई थी, यह साबित करने के लिए कौन सा शिष्य अधिक विनम्र है। तो एक शिष्य कहता है, “दासोहम्”। यानि “मैं तो चाकर (गुरुजी और ईश्वर का) हूँ।” ज़वाब में दूसरा कहता है, “दासदासोहम्”। अर्थात् “में तो चाकरों (गुरुजी और ईश्वर के) का भी चाकर हूँ।” इसके बाद फिर पहला वाला बोलता है, “दासदासदासोहम्”। मतलब, “मैं चाकरों के चाकर का भी चाकर हूँ।” इस तरह दोनों के बीच सिलसिला आगे बढ़ता रहता है और मामला बेनतीजा रह जाता है कि कौन अधिक विनम्र है।

अलबत्ता, यहाँ इस कहानी के उल्लेख का मसला थोड़ा अलग है। क्योंकि आज के दौर की कहानी में जो ईश्वर या गुरुजी हैं, वह है बाजार। खास तौर पर दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला भारतीय बाजार। और इस बाजार के सामने अपने को विनम्रतम साबित करने की होड़ में जो लगे हैं, वे हैं दुनियाभर की बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ। भले वे अन्य देश की हों या भारत की। मसलन, जो लोग कभी वैष्णो देवी धाम की यात्रा पर गए होंगे, उन्होंने गौर किया होगा कि वहाँ ‘मैक्डोनाल्ड’ जैसी कम्पनियों के खाने-पीने के ठिकानों (नीचे तस्वीर दी है) पर बिना लहसुन-प्याज का भोजन परोसा जा रहा है, खास तौर पर भारत की वैष्णव परम्परा वाले लोगों को ध्यान में रखकर। इसके लिए बाकायदा दरवाजे पर ही सूचना भी चस्पा की गई है कि यहाँ बिना लहसुन-प्याज वाला भोजन मिलता है। इसके उलट, ‘हल्दीराम’ जैसी भारतीय कम्पनियों के ठिकानों पर पिज्जा-बर्गर बेचे जा रहे हैं, युवाओं की पसन्द काे ध्यान में रखकर।

अब इसी क्रम में अगली कड़ी ‘एडिडास’ ने जोड़ी है। बल्कि वह तो कुछ आगे ही निकल गई हे। उसने तो अपना नाम भी भारतीय परम्परा को ध्यान में रखते हुए बदल सा दिया है, ऐसा लगता है। इसका प्रमाण है, वह तस्वीर, जो लेख के साथ मुख्य रूप से लगाई गई है। यह तस्वीर दिल्ली में स्थित ‘एडिडास’ के एक ठिकाने की है। वहाँ बाहर दरवाजे पर चमकते हुए अक्षरों में कम्पनी का नाम ‘एडिडास’ की जगह ‘अदिदास’ लिखा साफ देखा जा सकता है। #अपनीडिजिटलडायरी के संस्थापकों में शामिल अनुजराज पाठक ने यह तस्वीर खींचकर भेजी है।

वैसे, ‘एडिडास’ के बारे में बता दें कि यह जर्मनी की कम्पनी है। दुनियाभर में जूते-चप्पलों का कारोबार करती है। खास तौर पर खेल प्रतिस्पर्धाओं में काम आने वाले जूते वगैरा बहुत अच्छे बनाती है। इसकी स्थापना 1949 में एडोल्फ डास्लर (एडी डास) ने की थी। वह परम्परागत पेशे से मोची थे। एडी पहले अपने भाई रुडोल्फ के साथ मिलकर यही काम करते थे। लेकिन 1948 में दोनों के बीच मनमुटाव हो गया। तो रुडोल्फ ने कम्पनी बनाई ‘प्यूमा’ और एडी ने ‘एडीडास’। ऐसा अनुमान हैं कि आज ‘एडिडास’ की हैसियत लगभग 5.41 लाख करोड़ रुपए से भी ज्यादा की हो चुकी है। अलबत्ता होती है तो हुआ करे उसकी इतनी हैसियत। क्या फर्क पड़ता है? क्योंकि भारत में तो उसने अपने आप की हैसियत इतनी ही बताई है, “दासोहम्, दासदासोहम्, अदिदासोहम्, बााजारदासोहम्!

सोशल मीडिया पर शेयर करें
Neelesh Dwivedi

Share
Published by
Neelesh Dwivedi

Recent Posts

पर्यावरण दिवस, ईंधन बचाने की बातें और निजी कारों का ऐसा तमाम-जाम, दिलचस्प है न?

मैं बेंगलुरू में जहाँ रहता हूँ, वहाँ अपने घर के सामने रोज इस तरह का… Read More

4 hours ago

लिंक्डइन के जरिए नौकरी का जाल, चीन से पाँच देशों की जासूसी, भारतीय भी सावधान रहें!

लिंक्डइन के जरिए नौकरी का जाल बिछाकर, रोजगार की तलाश कर रहे लोगों को काम… Read More

1 day ago

‘शिक्षक’ ने अपने कौड़ी के ज्ञान से ‘पत्रकार’ को दो कौड़ी का साबित कर दिया, देखिए वीडियो!

देश की एक जानी-मानी ‘पत्रकार’ ने ऑनलाइन पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए कह दिया कि… Read More

2 days ago

क्या हम भारतीयों को सार्वजनिक नियम-कायदे मानने की तमीज नहीं? अभी बहस तो यही है!

अभी एक-दो दिन से मीडिया-सोशल मीडिया में यह बहस चल रही है कि हम भारतीयों… Read More

3 days ago

अपने हिस्से का योगदान दीजिए, वरना लू के थपेड़ों से रोज 3,400 लोग मरने लग जाएँगे!

एक नया अध्ययन हुआ है। इसमें भारत और उसके आस-पास के देशों में लगातार बढ़ती… Read More

4 days ago

इस लड़की ने दो लाख की नौकरी छोड़कर 60 हजार रुपए महीने में खुशी खरीदी है!

खुशी पाने के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते। ज्यादातर लोग अमूमन बड़ी से बड़ी नौकरी… Read More

5 days ago