गंगा, गंगोत्री, गंगासागर, सब भाजपा की जद में, तो इसका मतलब अब क्या…?

नीलेश द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश

भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनावी और राजनैतिक इतिहास की सबसे बड़ी, सबसे यादगार और सर्वाधिक अपेक्षित सफलता सोमवार, चार मई को अपने खाते में दर्ज की। जिस बंगाल के अपने नेता श्यामाप्रसाद मुखर्जी की विचारधारा (भाजपा के पूर्ववर्ती जनसंघ के संस्थापक) को लेकर पार्टी आगे बढ़ी। फिर देश की सत्ता में आई, और अभी पिछले 12 से अधिक वर्षों से केन्द्र में सरकार चला रही है, उन्हीं के राज्य में वह अब तक सियासी तौर पर किनारे लगी हुई थी। कई सालों से कोशिश कर रही थी, बंगाल की सत्ता में आने की। लेकिन हर तरह के प्रयास के बावजूद वह सफल नहीं हो पा रही थी। तब यह तक कहा जाने लगा था कि बंगाल की सत्ता तक पहुँचना शायद भाजपा के लिए संभव नहीं हो पाएगा, क्योंकि बंगाली मतदाता का मानस इस पार्टी की वैचारिकी से मेल नहीं खाता। 

लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने यह धारणा तोड़ दी। इस बार बंगाल की सत्ता तक वह न सिर्फ पहुँची है, बल्कि आँधी-तूफान की तरह उस पर काबिज हुई है। बीते 15 साल से इस राज्य के सत्ता-तंत्र को अपने हाथ में लिए उसे कठपुतली की तरह चला रही तृणमूल कांग्रेस को भाजपा ने दो अंकों में, महज 81 सीटों पर समेट दिया है। लगभग तीन दशक तक कभी बंगाल की सरकार चलाने वाले वामपंथी दलों को सिर्फ एक सीट और देश के सबसे पुराने दल कांग्रेस को दो सीटों तक ला दिया है। जबकि भाजपाई सीटों का आँकड़ा 293 सदस्यों वाली बंगाल विधानसभा में 206 सीटों तक जा पहुँचा है। ऐसे बहुमत को सियासी आँधी-तूफान न कहा जाए तो क्या कहें फिर?

और सिर्फ बंगाल ही नहीं, असम में लगातार तीसरी बार भाजपा ने 126 में से 82 सीटों के साथ सरकार में वापसी की है। साथ ही पुड्‌डुचेरी में उसके राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) ने 30 में से 16 सीटों के साथ लगातार दूसरी बार सत्ता अपने हाथ में रखी है। इन सफलताओं के साथ ही अब देश के लगभग 22 राज्यों/केन्द्रशासित प्रदेशें में भाजपा या उसके सहयोगियों की सरकारें हो गईं हैं। लगभग 72% भूभाग पर उसका शासन-क्षेत्र है। भारत की करीब 78% आबादी भाजपा व उसके सहयोगी दलों से शासित है। अंग (महाभारत काल में बिहार के पूर्वी हिस्से में था)-बंग (बंगाल)-कलिंग (ओडिशा) सब भाजपा की जद में है। कच्छ (पश्चिम में गुजरात का सीमाई क्षेत्र) से किबीथू (पूर्व में अरुणाचल प्रदेश का सीमावर्ती इलाका) तक भाजपा का राज है। और ऐतिहासिक जीत के जश्न के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक और बात कही, “गंगोत्री से गंगासागर तक भाजपा का कमल खिला हुआ है।” 

दरअसल, प्रधानमंत्री की इसी स्वीकारोक्ति और उनकी पार्टी की इस ऐतिहासिक उपलब्धि से ही कुछ मौजूँ एवं जाइज से सवाल खड़े हुए हैं। क्योंकि इस स्वीकारोक्ति और उपलब्धि के बाद अब भाजपा के पास अपनी किसी जिम्मेदारी से भाग निकलने का बहाना नहीं होगा। मसलन- गंगा के जल में प्रदूषण का मसला भाजपा के लिए हमेशा से बड़ा रहा है। उत्तरप्रदेश में सरकार बनने के बाद वाराणसी, प्रयागराज, जैसी कुछ जगहों में गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के कुछ काम भी किए हैं उसने। लेकिन इससे आगे गंगा की हालत अब भी दयनीय है। उस स्थिति को न बदल पाने के लिए पार्टी अब तक गंगा के किनारे वाले अन्य राज्यों की विपक्षी दलों वाली सरकारों पर दोष डालती रही है। मगर अब? अब ऐसा कुछ नहीं है। उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, बिहार, से बंगाल तक गंगा नदी के बहाव क्षेत्र का पूरा इलाका अब भाजपा सरकारों से शासित है, या होने वाला है। यमुना नदी के मामले में भी यही स्थिति है। तो क्या अगले कुछ वर्षों में दोनों पवित्र नदियाँ प्रदूषण से मुक्त हो पाएँगीं? या आगे भी सियासी जुमलेबाजी ही चलेगी?

दूसरी बात- बंगाल, असम, बिहार, उत्तर प्रदेश, जैसे राज्यों में भाजपा से पहले जिन-जिन राजनैतिक दलों ने भी सरकार चलाई, भारतीय जनता पार्टी उन सभी पर लगातार मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाती रही है। असम, बंगाल, बिहार में बांग्लादेशी घुसपैठियों का मसला लगातार उसने उठाया है। कुछ हद तक इन आरोपों में आधार भी होगा ही, क्योंकि मुस्लिम समुदाय हमेशा एकमुश्त, एकतरफा मतदान के लिए जाना जाता रहा है। वह भी अधिकांशत: भाजपा-विरोधियों के पक्ष में। ऐसे में राजनैतिक मजबूरीवश ही सही अन्य दलों ने इस समुदाय को गैरवाजिब संरक्षण दिया हो, तो भी कोई अचरज नहीं। बिहार, उत्तर प्रदेश में तो एक एमवाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण भी चला था, कभी। इस समीकरण को साधने वाले दलों ने वर्षों तक इन राज्यों में इसी आधार पर सत्ता चलाई। बंगाल में भी पहले वामपंथी, इसके बाद तृणमूल कांग्रेस ने मुस्लिमों को हर तरीके से साधकर रखा। इससे अवैध गतिविधियों का ऐसा कुचक्र बन गया, जो लंबे समय तक देश के लिए परेशानी बनता रहा। परंतु अब वह कुचक्र भाजपा ने काफी हद तक तोड़ लिया है। तो क्या अब वह आगे मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति की जड़ों को हमेशा के लिए सुखा पाएगी?

तीसरी प्रमुख बात, पड़ोसी देशों से लगने वाली देश की लगभग पूरी अंतर्राष्ट्रीय सीमा अब भाजपा शासित राज्यों के पास है। पहले भाजपा का आरोप रहता था कि तृणमूल कांग्रेस जैसे दल अपने शासन वाले राज्यों में केन्द्र सरकार को सहयोग नहीं करते। इसीलिए अंतर्राष्ट्रीय सीमा में कई जगहों पर बाड़ नहीं लग पा रही है। इसीलिए अवैध घुसपैठ, आदि भी नहीं रुक रही है। इसी से रोहिंग्या मुस्लिमों जैसे गैरकानूनी शरणार्थी, आतंकी, उग्रवादी, नशीले पदार्थों और नकली मुद्रा के तस्कर, वगैरा सब देश के भीतर घुसते हैं। परंतु अब? भाजपा के पास इस आरोप के लिए भी आधार नहीं है। तो क्या अब वह सीमा पार से होने वाली अवैध गतिविधियों पर नियंत्रण लगा सकेगी? 

ये और ऐसे ही और कई सवाल भाजपा की ओर मुँह बाए खड़े हैं। उसे उत्तर देना होगा, जल्द देना होगा। नहीं तो, जिस सियासी आँधी-तूफान की मानिंद वह आगे बढ़ी है, उसी में मटियामेट हो जाने के लिए भी उसे तैयार रहना होगा! 

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