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‘सरल भक्तमाल’-7…: हनुमान जी हैं बाल-ब्रह्मचारी, तो नाभादास जी ‘हनुमानवंश’ के कैसे?

नीलेश द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश

‘श्री भक्तमाल’ के मुख्य रचनाकार गोस्वामी श्री नाभादास जी के जन्म और वंश के बारे में दो-तीन कहानियाँ कही-सुनी जाती हैं। एक कहानी में उन्हें श्री ब्रह्मा जी का अवतार बताया गया है। दूसरी कहानी में उन्हें आंध्र प्रदेश के एक ब्राह्मण दंपति का पुत्र माना गया है। जबकि तीसरी कहानी उन्हें हनुमानवंश से जुड़ा हुआ बताती है! जी, हनुमानवंश, बावजूद इसके कि श्री हनुमान जी बाल-ब्रह्मचारी हैं!! है न अचरज की बात? लेकिन जब बात भगवान के भक्तों की हो, तो ऐसे सब आश्चर्य सामान्य लगने लगते हैं। 

तो, पहली कहानी कहते हैं। द्वापर युग की बात है। भगवान श्री कृष्ण उन दिनों गोकुल में लीलाएँ कर रहे थे। उसी समय एक दिन ब्रह्मा जी उनके दर्शन करने आए। लेकिन दर्शन होते, उससे पहले ही उन्होंने श्री कृष्ण को उनके मित्रों के साथ वन में गैया चराते, भोजन करते और यहाँ तक कि संगी-साथियों का जूठा खाते हुए देख लिया। इससे ब्रह्मा जी के मन में सन्देह हो गया कि सच में ये भगवान हैं भी या नहीं? लिहाजा, उन्होंने उनकी परीक्षा लेने की ठानी और उनके संगी सभी ग्वाल-बालों, गौओं-बछड़ों का हरण कर लिया। उन्हें ब्रह्मलोक ले गए। श्री कृष्ण को जब यह पता चला तो योगमाया के प्रभाव से वे खुद गौओं, बछड़ा-बछड़ियों, ग्वाल-बालों के अनेक रूपों में प्रकट हो गए। यही नहीं, किसी को कुछ पता न चले इस गरज से वह रोज अपने उन सभी रूपों को लेकर नियम से, सुबह वन में जाते रहे और शाम को लौटकर गौ-पालकों के विभिन्न घरों में रहकर लीलाएँ करते रहे। इस दौरान उन्होंने ब्रह्मा जी से एक बार भी ग्वाल-बालों, गौओं, आदि को लौटाने के लिए नहीं कहा। ब्रह्मा जी ने जब यह देखा, तो उन्हें अपनी गलती समझ में आ गई, उनका मोह जाता रहा और धरती पर लौटकर उन्होंने भगवान से माफी माँगी तथा उनके ग्वाल-बाल, गाएँ आदि सब उन्हें लौटा दीं। लेकिन तब तक धरती पर करीब एक साल का समय निकल गया था। श्री कृष्ण ने ब्रह्मा जी की इस गलती के लिए उन्हें थोड़ी सजा देकर माफ कर दिया। और सजा क्या थी? कि “कलियुग में आप नेत्रहीन ब्राह्मण के रूप में जन्म लेंगे। पाँच साल की उम्र तक नेत्रहीन रहेंगे। फिर संतों की कृपा से आपका अंधत्व चला जाएगा और आप भगवद्भक्तों का यशोगान करेंगे। कहते हैं, भगवान के उसी आदेश के अनुसार ब्रह्मा जी ही नाभादास के रूप में प्रकट हुए थे। 

इस सन्दर्भ में दूसरी कहानी यूँ है कि श्री नाभादास जी का जन्म आठ अप्रैल 1537 को आंध्र प्रदेश के भद्राचलम में रहने वाले एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। यह स्थान गोदावरी नदी के तट पर खम्मम जिले में है। हालाँकि ज्यादातर लोग श्री नाभादास जी के बारे में तीसरी कहानी को अधिक सही मानते हैं, जिसके अनुसार वह हनुमानवंश के मराठी ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए थे। उनके पिता का नाम श्री रामदास जी और माता का नाम श्रीमती जानकी देवी था। ‘श्री भक्तमाल’ का विस्तार करते हुए इसकी सबसे लोकप्रिय टीका लिखने वाले संत श्री प्रियादास जी भी इसी मत को मानते हैं। तो अब प्रश्न आता है कि यह हनुमान-वंश का मामला क्या है। क्योंकि हनुमान जी तो बाल-ब्रह्मचारी हैं। सो, इसकी कहानी यूँ है कि श्री रामदास जी और श्रीमती जानकी देवी जी की कोई संतान नहीं थी। इस स्थिति को उन्होंने भगवान की इच्छा मान स्वीकार कर लिया था। लेकिन तभी किसी ने उन्हें नि:संतान होने का ताना दे दिया। इससे उन्हें इतना अधिक दु:ख हुआ और उन्होंने पुत्र जन्म की इच्छा से संतों-महात्माओं की सेवा शुरू कर दी। उनकी सेवा से खुश होकर एक संत ने उन्हें हनुमान जी की आराधना करने को कहा। उन्होंने ऐसा ही किया और एक दिन हनुमान जी उनसे प्रसन्न हो गए। उन्होंने उन्हें दर्शन दिए और कहा, “आपके भाग्य में पुत्र नहीं है। परंतु आप मेरे प्रेमी भक्त हैं, इसलिए मेरी कृपा से आपका वंश चलेगा। आपके यहाँ एक अद्भुत महात्मा पुत्र रूप में जन्म लेंगे। उनके द्वारा जगत का कल्याण होगा।” बस, तभी से उन ब्राह्मण दंपति के वंश को ‘हनुमान-वंश’ कहा जाने लगा और नाभादास जी ‘हनुमानवंशीय’।

हालाँकि यह तो हुईं दुनियादारी की बातें, जो संतों के मामले में पूरी तरह सटीक बैठती नहीं। इसलिए उनके बारे में सही तरीके से जानने के लिए उनकी गुरु-परम्परा को समझना चाहिए, जो अधिक उचित मानी जाती है। इस लिहाज से श्री नाभादास जी की बात करें तो उनकी गुरु परम्परा शुरू होती है, स्वामी श्री रामानंदाचार्य जी से, जो रामानंद सम्प्रदाय के पहले गुरु और प्रवर्तक हैं। आगे उनके शिष्य हुए श्री अनंतानंदचार्य जी। इसके बाद श्री कृष्णदास पयोहारी जी, और फिर अग्रदेवाचार्य (अग्रदास) जी। इन्हीं अग्रदेव के शिष्य हुए श्री नाभादास जी। इस तरह, श्री रामानंद सम्प्रदाय की पाँचवीं पीढ़ी के संत हैं गोस्वामी श्री नाभादास जी, जिनके हाथों श्री भक्तमाल जैसा ग्रंथ प्रकट हुआ। 

अभी के लिए बस इतना ही… शेष अगली कड़ी में। 

श्री राधाकृष्णार्पणम् अस्तु…, श्री राधाकृष्णाभ्याम् नम:। श्री राधा-कृष्ण को समर्पित। श्री राधा-कृष्ण को प्रणाम। 

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नोट : यह श्रृंखला गीता प्रेस की आधिकारिक पुस्तक ‘श्री भक्तमाल’ में उल्लिखित कथा-प्रसंगों पर आधारित है। इसके प्रकाशन-प्रसारण के पीछे हमारा उद्देश्य सिर्फ इतना है कि गीता प्रेस के ऐसे उच्च स्तर के ऐतिहासिक, पौराणिक महत्त्व के ग्रंथ के प्रचार-प्रसार में #अपनीडिजिटलडायरी की ओर से थोड़ा योगदान हो सके। साथ ही #डायरी से जुड़े पाठकों को इसका लाभ हो। बहुत जल्द हम इसी श्रृंखला को #अपनीडिजिटलडायरी के यूट्यूब चैनल पर भी शुरू करने का इरादा रखते हैं।)

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श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ

6 – ‘सरल भक्तमाल’-6…: श्री नाभादास जी के हाथों ‘भक्तदाम’ ग्रंथ प्रकट कैसे हुआ?
5 – ‘सरल भक्तमाल’-5…: तुलसीदास के ‘रामचरित मानस’ जैसा नाभादास का ‘भक्तमाल’
4 – ‘सरल भक्तमाल’-4…: असाधारण ग्रंथ, जिसकी कहानियाँ भगवान भी मन लगाकर सुनते हैं!
3 – ‘सरल भक्तमाल’-3…ठाकुर जी ने ‘अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन’ दिलाया श्रीराजेन्द्रदास जी महाराज से!
2 – ‘सरल भक्तमाल’-2…ठाकुर जी ने भक्तमाल की सेवा में मुझे कैसे लगाया?
1- सरल भक्तमाल’-1…आखिर इसकी जरूरत क्यों? 

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Neelesh Dwivedi

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