हिन्दी दिवस याद दिलाता है कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि…!

प्रियंका पवन जैन ‘घुवारा’, टीकमगढ़, मध्य प्रदेश

भारत में भाषाओं और बोलियों की बहुत विविधता है। भाषा केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि यह हमारी पहचान, संस्कृति और समाज से जुड़ने का आधार है। जिस भाषा में हम सोचते, सपने देखते और अभिव्यक्त होते हैं, वही हमारी मातृभाषा कहलाती है। भारत जैसे बहुभाषी देश में मातृभाषा का महत्त्व कहीं अधिक है।

हर वर्ष 14 सितम्बर को ‘हिन्दी दिवस’ मनाया जाता है। इसका उद्देश्य लोगों में हिन्दी के प्रति जागरूकता और गर्व का भाव पैदा करना है। लेकिन ‘हिन्दी दिवस’ केवल हिन्दी के प्रचार-प्रसार का अवसर नहीं है, बल्कि यह मातृभाषाओं के महत्त्व और शिक्षा में उनके उपयोग पर विचार का भी अवसर है। मातृभाषा व्यक्ति की सोच, संस्कार और भावनाओं से गहरी जुड़ी होती है। यह बच्चों के लिए सीखने का सबसे स्वाभाविक, सहज माध्यम है। मातृभाषा बच्चों की संज्ञानात्मक क्षमता को विकसित करती है। यह उन्हें सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान से जोड़ती है।

भारतीय संविधान भी मातृभाषा में शिक्षा का समर्थन करता है। अनुच्छेद 350-ए कहता है कि राज्यों को मातृभाषा में शिक्षा की व्यवस्था करनी चाहिए। काफी पहले ‘कोठारी आयोग’ (1964-66) ने सुझाव दिया था कि आदिवासी क्षेत्रों में प्रारम्भिक वर्षों में शिक्षा स्थानीय जनजातीय भाषा में होनी चाहिए। शिक्षा का अधिकार अधिनियम (2009) में भी यह प्रावधान किया गया है कि जहाँ तक सम्भव हो, शिक्षा का माध्यम बच्चे की मातृभाषा हो।

इस सन्दर्भ के साथ ‘हिन्दी दिवस’ हमें यह याद दिलाता है कि अपनी भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि हमारी संस्कृति, परम्परा और पहचान का आधार है। यदि हम चाहते हैं कि नई पीढ़ी आत्मविश्वासी, ज्ञानवान और रचनात्मक बने तो हमें मातृभाषा का अव्वल स्थान सुनिश्चित करना होगा। हिन्दी सहित हर मातृभाषा का सम्मान करना आवश्यक है। ‘हिन्दी दिवस’ पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम अपनी भाषा और संस्कृति के महत्त्व को पहचानेंगे। यही वास्तविक राष्ट्र निर्माण की दिशा में हमारा योगदान होगा।

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(पवन जैन मूल रूप से बुन्देलखण्ड के टीकमगढ़ जिले के सक्रिय सामाजिक तथा राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। जनसामान्य से जुड़े मसलों पर वह लगातार आवाज बुलन्द करते हैं। उनकी पत्नी प्रियंका भी उन्हीं की तरह सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर सक्रिय रहती हैं। लेख के रूप में वे अपने विचार #अपनीडिजिटलडायरी को व्हाट्स एप के जरिए भेजते हैं।) 

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पवन और प्रियंका जैन के पिछले लेख 

6 – अपशब्दों के प्रयाेग से लोकतंत्र की गरिमा को चोट पहुँचती है, राजनेता इसे क्यों नहीं समझते? 
5 – कृषि मंत्री खेती का उत्पादन बढ़ाने की बात करते हैं, मगर पशु चिकित्सा की क्यो नहीं करते?
4 – धर्म-परम्परा में हाथियों के इस्तेमाल से ‘पेटा’ के पेट में दर्द, रोज कटते पशुओं पर चुप्पी क्यों?
3 – ऑस्ट्रेलिया ने ताे बच्चों के लिए यूट्यूब भी प्रतिबन्धित कर दिया, भारत में यह कब होगा?
2 – बच्चों की आत्महत्या का मसला सिर्फ ‘शोक जताने’ या ‘नियम बनाने” से नहीं सुलझेगा! 
1 – रोज होने वाली ‘वित्तीय मानसिक हिंसा’ से आम आदमी को कब मुक्ति मिलेगी?

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