हिन्दी और भारत की क्षेत्रीय भाषाओं की राह में यही ‘खण्डित मानसिकता’ बड़ी रुकावट है!

अनुज राज पाठक, दिल्ली

पिछले सप्ताह बहुत से सरकारी संस्थान, जिनमें कई केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय भी शामिल रहे, ‘संस्कृत महोत्सव’ मना रहे थे। जबकि कल 14 सितम्बर है, और इस तारीख को भारत गणराज्य की आधिकारिक भाषा हिन्दी का सालाना उत्सव मनाया जाना है। अधिकांश लोगों को यह सूचनाएँ पहले से होंगी और हम में से बहुत से लोगों ने अपनी-अपनी संस्थाओं में उत्साह से संस्कृत का उत्सव मनाया होगा और हिन्द़ी का भी मनाएँगे। 

यद्यपि इसी क्रम में एक और सूचना जोड़ दें तो मामला थोड़ा ‘रोचक-सोचक’ हो जाता है। हमें विवश करता है कि हम भाषा से जुड़ी इन सूचनाओं, इनसे जुड़े घटनाक्रमों और सम्बद्ध सरोकारों को गम्भीरता से लें। तो अगली सूचना देश के माननीय उपराष्ट्रपति श्री सीपी राधाकृष्णन की शपथ से जुड़ी है। उन्होंने 15वें उपराष्ट्रपति के तौर पर 12 सितम्बर को पद एवं गोपनीयता की शपथ ली है, अंग्रेजी में। फिर गौर कीजिए, अंग्रेजी में।

संवैधानिक परम्परा के अनुसार, माननीया राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जी ने उपराष्ट्रपति जी को शपथ दिलाई। माननीया राष्ट्रपति जी ओडिशा से हैं। उनकी मातृभाषा ओड़िया है। वहीं, माननीय उपराष्ट्रपति जी तमिलनाडु से हैं और उनकी मातृभाषा तमिल है। भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषाओं में ये दोनों भाषाएँ भी आती हैं। नियम के अनुसार, इस सूची की किसी भी भाषा में शपथ ग्रहण हो सकता था। पर नहीं हुआ, क्यों? शपथ हुई तो विदेशी ही नहीं अपितु दासता की प्रतीक भाषा अंग्रेजी में! ऐसा क्यों आखिर? 

हमारे बहुभाषी, बहुसांस्कृतिक देश भारत गणराज्य के ओड़ियाभाषी राष्ट्रपति व तमिलभाषी उपराष्ट्रपति जी व्यवहार में देश के किसी भाषा को नहीं, विदेशी भाषा को प्राथमिकता देते हैं। यह आज भारतीयता और भारत के यथार्थ की तस्वीर का एक पहलू है, जो बेहद चिन्ताजनक है। चिन्ता की बात यही नहीं है। अभी 14 सितम्बर को ही देखिएगा। राष्ट्रपति जी और उपराष्ट्रपति जी के कार्यालयों से ही नहीं, उन्हीं की तरह अंग्रेजी को प्राथमिकता देने वाले तथा शीर्ष पदों पर बैठे देश के तमाम ‘विशिष्ट जन’ आधिकारिक बयान जारी करेंगे, आधिकारिक भाषा हिन्दी के पक्ष में। इनमें देश के नागरिकों से अपील की जाएगी कि हिन्दी में सम्पर्क, संवाद को बढ़ावा दीजिए!! जबकि ऐसे बयान जारी करने वाले ‘विशिष्ट जन’ ख़ुद ऐसा करने से आज भी परहेज करते हैं! 

अब कहिए, क्या यह सोच और आचरण हमारी खण्डित मानसिकता का प्रतीक नहीं है? और यही खण्डित मानसिकता हिन्दी और भारत की क्षेत्रीय भाषाओं की राह की बड़ी रुकावट है। प्रश्न स्वाभावकि है कि क्यों अंग्रेजी देश में राजकाज की व्यवहार्य भाषा बनी हुई है आज भी? स्वतंत्रता के इतने वर्ष हो गए। अब भारतीय भाषाओं की पक्षधर सरकारें भी केन्द्र से लेकर कई राज्यों में सत्तासीन है। फिर भी हिन्दी और देश की क्षेत्रीय भाषाओं के व्यावहारिक प्रयोग के प्रति आग्रह क्यों नहीं दिखता? उनके प्रति अनुराग का भाव क्यों नहीं नजर आता?  

यह सामान्य समझ की बात है कि सरकारों के स्तर पर जब भारतीय भाषाओं के प्रति अनुराग नजर आएगा, उनका प्रयोग होगा, तभी जनसामान्य भी ऐसा अनुकरण करेगा। तब ही भारतीय भाषाएँ जनमानस से लेकर राज्य तक प्रयुक्त हो पाएँगी। तो क्या यह प्रश्न हो सकता है कि भारतीय भाषाओं के प्रति उपेक्षाभाव का कारण हमारी सरकारें ही हैं? जो भाषाओं को वास्तविकता में बढ़ावा न देकर विवाद का विषय बना रही हैं? जवाब ‘हाँ’ में हो सकता है। क्योंकि अभी शिक्षा नीति में जो त्रिभाषा नियम अधिकृत किया गया, वह पहले भी लागू था। मगर क्या यह नियम भाषा विवाद समाप्त कर पाया? या विवाद को हवा ही देता रहा? इस पर चिन्तन आवश्यक है। 

हमें समझना होगा कि भाषाएँ केवल पढ़ाने के लिए नहीं हैं। भाषाओं के प्रति उपेक्षा भाव को भी समाप्त करना, उनके प्रयोग को अधिकाधिक बढ़ावा देना, उन्हें पढ़ाने से कहीं अधिक आवश्यक है। उपेक्षा भाव नहीं रहेगा, प्रयोग अधिक होगा तो कोई भी भाषा किसी औपचारिक पाठ्यक्रम के बिना भी सीखी जा सकती है। यह एक व्यावहारिक तथ्य है। इस तथ्य को हमें स्वीकार करना होगा। तदनुरूप व्यवहार भी बदलना होगा।

भाषाओं के प्रति सद्भाव केवल भाषणों और उत्सवों से तो सम्भव नहीं ही है, यह हमने स्वतंत्रता के बाद इतने वर्षों तक देख ही लिया हैं। हमें अब व्यवहार में भाषाओं को प्रयोग में लाना होगा। दिल्ली जैसे हिन्दी भाषी राज्य के आदेश प्रायः अंग्रेजी में जारी होते हैं। जबकि नियमानुसार हिन्दी में भी अपेक्षित हैं, लेकिन यहाँ हिन्दी उपेक्षित है। ऐसे में हमारे माननीय अगर सबसे पहले भारतीय भाषाओं में कार्य व्यवहार अपनाएँ तो एक सुन्दर परम्परा प्रारम्भ होगी। तब अन्य सरकारी कार्यालय भी इस व्यवहार को अपनाएँगे। तभी, हिन्दी ही नहीं अपितु अन्य सभी भारतीय भाषाओं पर उपकार होगा। उनका सही मायने में फिर से उद्भव हो सकेगा। 

—— 

(नोट : अनुज राज पाठक दिल्ली में संस्कृत विषय के सरकारी शिक्षक हैं। #अपनीडिजिटलडायरी की स्थापना से ही साथ जुड़े सदस्यों में शामिल हैं। अच्छे लेख और कविताएँ लिखते हैं। कभी-कभी श्रृंखलाबद्ध लेखन भी करते हैं।) 

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