जो रस बरस रहा बरसाने, सो रस तीन लोक में न

द्वारिकानाथ पांडेय, कानपुर, उत्तर प्रदेश से

पूरे बरसाने गाँव में रंग बरस रहा था। लेकिन गोपियों की दृष्टि नन्दगाँव वाली पगडंडी की ओर लगी थी। कृष्ण की प्रतीक्षा में गोपियों की रंगभरी झोली का मुँह अब तक खुला न था। धीरे-धीरे दिन चढ़ने को आया। लेकिन कृष्ण गोप-सखाओं संग होली खेलने बरसाने नहीं आए। हर वर्ष तो कृष्ण सवेरे-सवेरे जमुन जल लाते समय से ही गोपीकाओं को घेरकर रंगना शुरू कर देते थे। गृह का काज तक न करने देते। यहाँ तक कि त्योहार की रसोई बनाने तक में खटका लगा रहता कि कहीं कृष्ण आकर रंग न डाल दें। ग्वाल-बालों को लट्ठ से डराना पड़ता था। फिर आखिर इस बार ऐसा क्या हो गया, जो उन्होंने अब तक हमारी सुधि न ली? क्या वे भूल गए कि हम उनकी राह तक रहीं होंगी? क्या आज राधा का भी ख्याल न आया उन्हें? ऐसे तमाम प्रश्न राधा सहित सभी गोपियों के मन को क्लान्त कर रहे थे।

कृष्ण की प्रतीक्षा में होली के रंगभरे दिन भी राधा के चेहरे की रंगत फीकी पड़ी हुई थी। सखी रंगदेवी से राधा का उतरा चेहरा देखा न गया। रंगदेवी ने बाकी सखियों की ओर इशारा कर पूछा कि किसी के पास कुछ उपाय हो तो बताए। तो ललिता ने सुझाव दिया, “काहे न हम सखियाँ ही इस बरस नन्दगाँव चलकर रंग खेल आवें? अब कछू न कछू तो करनो ही पड़ेगो। न जाने श्याम आज काहे नहीं आए। बा के बिना होरी को कैसो आनन्द?” जब कृष्ण हर बार होली खेलने आते तो यही सखियाँ उनके ग्वाल-बालों को लट्ठ लेकर धमकाती थीं। लेकिन इस बार जब कान्हा नहीं आए तो सारी सखियों को होली का हो-हल्ला कर्कश लगने लगा। बाहर से आ रही “हो..हो..होरी है” की ध्वनि उनके लिए बस शोर भर थी। रसोई बनी तो, लेकिन किसी सखी से कौर तक न तोड़ा गया। सबका चित्त बस श्याम की टोह में लगा था।

राधा ने सखियों की बात सुनी तो वे नन्दगाँव जाने को तैयार हो गईं। सबने अपनी-अपनी रंगभरी झोरी उठाई और नन्दगाँव की राह पकड़ ली। “लाला ने आज ऐसी ठिठोली करके नीको नाय करो। बा को आज मजा तो चखानो ही पड़ेगो। सबरी मिलके आज बा को श्याम रंग लगाएँगीं। कारो को और कारो कर देंगी।” सखी इन्दुलेखा ने बाकी सब से कहा। लेकिन राधा चुप ही थीं। उन्हें तो बस कान्हा के दर्शन की आस थी। मन ही मन वह कृष्ण की छवि में ध्यान लगाए हुए चल रहीं थीं। तभी एक सखी ने उनका ध्यान दूसरी तरफ दिलाया, ‘लो कान्हा तो यहाँ‌ बैठो है।’ कृष्ण नन्दगाँव के बाहर एक वृक्ष की जड़ पर बैठे थे। सखियों ने आस-पास देखा तो कोई ग्वाल-बाल भी नहीं दिखाई पड़ा।

सखियाँ कृष्ण के पास पहुँची और उनसे बरसाने न आने का कारण पूछने लगी। लेकिन श्याम ने न तो उन गोपियों की ओर देखा और न ही उनके प्रश्नों का उत्तर दिया। राधा ने स्निग्ध दृष्टि ने श्याम को निहारा। लेकिन श्याम ने तब भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। श्याम बस शान्त भाव से नीचे की ओर दृष्टि डाले बैठे रहे। राधा का दिल कृष्ण को इस तरह देख बैठा जा रहा था। अपनी नटखट बातों और लीलाओं से ब्रज में रोज ही उत्सव करने वाले श्याम आज ऐसे गम्भीर होकर होली के हुल्लड़ से दूर क्यों बैठे हैं? यह गोपियों की समझ से परे था।

श्याम को कुछ न बोलते देख एक सखी उनके पास पहुंँची और उनकी बाँह कसकर पकड़ ली, “तुम का समझे थे लाला, हम तुम को आज के दिन ऐसे ना छोड़ देंगी।” कहते हुए सखी ने अपनी कमर ने बँधी रंग की झोरी खोल ली। अब तक चेहरे पर गम्भीरता ओढ़े श्याम धीरे से मुस्कुराए। रंगने के लिए हाथ में झोरी लिए खड़ी सखी से श्याम ने वह झोरी छीन ली। और अभी गोपिकाएँ कुछ समझ पातीं, कि उससे पहले ही उनके ऊपर रंगों की वर्षा होने लगी। कुंज के घने वृक्षों पर बैठे गोप-सखाओं ने गोपिकाओं के ऊपर रंगभरी पिचकारी मारनी शुरू कर दी थी। पूरे वातावरण में रंग-गुलाल का आवरण चढ़ गया। पहले से तैयारी करके बैठे ग्वालों ने सखियों पर इतना गुलाल बरसाया की सबकी आंँखें बन्द हो गईं।

तभी राधा ने अपनी कलाई में किसी की पकड़ महसूस की। वह छुअन से ही समझ गईं कि यह कृष्ण हैं। श्याम ने अपने दोनों हाथों में गुलाल लेकर श्यामा जू के दोनों गालों पर मल दिया। राधा जी ने शिकायती लहजे में कृष्ण से बरसाने न आने का कारण पूछा। तो कृष्ण मुस्कुराते हुए बोले, “मैं तो तुम्हारे रंग में ही रंगा हूँ, राधे। फिर भला किसी और रंग का मुझ पर क्या असर? प्रेम का रंग ही सबसे गाढ़ा है। इतना गाढ़ा कि यह न सिर्फ रंगे जाने वाले को, बल्कि रंगने वाले को भी अपने में सराबोर कर लेता है। रही बात बरसाने न आने की, तो यह सब श्रीदामा की योजना थी। उसे हर बार के लट्ठ का हिसाब जो करना था इन गोपियों से।” राधिका समझ चुकीं थीं कि यह सब कान्हा की ही चाल थी।

श्यामा जू ने अपने गालों पर लगे गुलाल को हथेलियों में लेकर कान्हा के दोनों गाल रंग दिए। अब राधा और कृष्ण एक ही रंग में रंग गए गए। और जहाँ राधा और कृष्ण एक रंग, वही स्थल बरसाना। प्रेम और भक्ति के इस रंग में तीनों लोक, पूरी सृष्टि डूब गई। सृष्टि का एक-एक जीव इस रंग-रस का साक्षी हुआ। क्योंकि सबको भान था, ‘जो रस बरस रहा बरसाने सो रस तीन लोक में न।’
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(नोट : द्वारिकानाथ युवा हैं। सुन्दर लिखते हैं। यह लेख उनकी लेखनी का प्रमाण है। मूल रूप से कानपुर के हैं। अभी लखनऊ में रहकर पढ़ रहे हैं। साहित्य, सिनेमा, समाज इनके पसन्दीदा विषय हैं। वह होली पर ऐसे कुछ लेखों की श्रृंखला लिख रहे हैं, जिसे उन्होंने #अपनीडिजिटलडायरी पर प्रकाशित करने की सहमति दी है।) 
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द्वारिकानाथ की होली श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ 
1. भूत, पिशाच, बटोरी…. दिगम्बर खेलें मसाने में होरी

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