शिवाजी महाराज : बोलो “क्या चाहिए तुम्हें? तुम्हारा सुहाग या स्वराज्य?

बाबा साहब पुरन्दरे द्वारा लिखित और ‘महाराज’ शीर्षक से हिन्दी में प्रकाशित पुस्तक से

शहाजी राजे को छल से कैद किया गया। चोर-डाकुओं की तरह बेड़ियाँ डालकर बीजापुर भेजा गया। लिवा ले जाने का काम अफजल खान के हिस्से में आया। शहाजी की गिरफ्तारी से बादशाह खुश था। उसे यकीन था कि अब बागी शिवाजी शरण में आएगा। सरदार फत्ते खान को फौज के साथ पुणे प्रान्त की और भेजा गया। बगावत को कुचलकर शिवाजी राजे को कैद करने के लिए। खान के साथ पाँच-सात हजार की सेना भेजी गई। खान स्वराज्य पर हमला करने निकला। जुलाई, 1648 के अन्त में।

शिवाजी राजे और जिजाऊ साहब नई-नई महत्वकाँक्षी योजनाएँ बनाने में मशगूल थे। इस कराल संकट की उन्हें आहट तक न लगी थी। तभी शहाजी राजे की गिरफ्तारी और फत्ते खान की आक्रामक मुहिम की खबरें आईं। मानो राजगढ़ पर बिजली गिरी। राजगढ़ हिल उठा। बादशाह ने मानो माँ साहब का मंगलसूत्र ही पकड़ रखा था और दूसरा जाल फेंका था स्वराज्य के, सब के प्राण लेने के लिए। मानो माँ साहब से सवाल किया था. बोलो “क्या चाहिए तुम्हें? तुम्हारा सुहाग या स्वराज्य?” शिवाजी राजे पर भी यही सवाल दागा गया था- “बोल, बाप चाहिए या स्वराज्य?”

अब करें तो क्या करें? तीर्थस्वरूप पिता के प्राण बचाएँ या स्वराज्य? पिता के प्राण बादशाह के पाँव पकड़ने से ही बचने वाले थे। और इस सूरत में बाकी सब की, स्वराज्य की मौत निश्चित थी। किसको बचाएँ, किसे मरने दें? दोनों ही परमपूज्य थे। प्राणप्रिय थे। कितना अहम सवाल। कितना पेचीदा। कैसा घोर संकट। आदिलशाह की इस चाल के सामने सभी महत्वकाँक्षाएँ, सभी योजनाएँ, बुद्धि, शक्ति, कसमें और राजनीति धरी रह गई। अफजल खान यमराज की तरह शहाजी को बीजापुर ले जा रहा था। इसी समय फतेखान भी यमराज की तरह ही स्वराज्य पर आक्रमण करने आ रहा था। क्या करें? क्या न करें? चिन्ता और चिता में कोई फर्क ही नहीं रहा। अब आवाहन, विनती, पुकार के लिए एक ही सहारा था। आदिशक्ति भवानी का। “शक्ति दे, युक्ति दे। बुद्धि दे, मंत्र दे। तंत्र दे, तेज दे। उद्योऽस्तु उदयोऽस्तु।”

बादशाह को लगा था कि लखुजी जाधव की बेटी जिजाऊ, अपने उजड़े हुए मायके को यादकर, उसके सामने आँचल फैलाएगी। पति के प्राणों की भीख माँगेगी। पर शहाजी महाराज भोसले की रानी और शिवाजी राजे भोसले की माँ जिजाऊ साहब, अन्यायी सुल्तान के सामने आँचल फैलाएगी? असम्भव था। उसने आँचल फैलाया देवी भवानी माता के सामने। उस अभिमानी वीरांगना ने हमेशा भवानी माता के सामने हो अपने मन को खोला था। उसी को याद किया था, सुख में भी, दुःख में भी।

इधर, शिवाजी राजे लड़ने को तैयार हो गए। सह्याद्रि ने महामंत्र दिया और वह उठ खड़े हुए। यह कौन सा मंत्र था? वह था, छापामार लड़ाई का। फत्ते खान पुरन्दरगढ़ की ईशान्य में बेलसर गाँव के पास डेरा डाले बैठा था। उसके एक दल ने पुरन्दर की दक्षिण में, शिरवल के सुभानमंगल किले पर तूफानी हमला किया। किला जीत भी लिया। गेरुआ झंडा नीचे उतरा। इस पराभव से स्वराज्य व्यथित हुआ। स्वराज्य की एक चौकी ढह गई।

तब जवाबी कार्रवाई के लिए सेना के साथ शिवाजी राजे पुरन्दरगढ़ पहुँचे। उन्होंने कावजी मल्हार को मावला जत्थे के साथ सुभानमंगल गढ़ पर भेजा। कावजी ने किले पर ऐसा जोरदार हमला किया कि किलेदार बालाजी हैबतराव वहीं ढेर हो गए। भगदड़ मची। किला फतह हुआ। किले पर गेरुआ फिर से फहराने लगा। इस विजय से मराठों के हौसले बुलन्द हुए। अब शामत आएगी फत्ते खान की।

राजे ने छापामार पद्धति से छावनी पर भयंकर छापा मारा। खूब मार-काट मची। इससे पहले कि खान संभले, सभी पुरन्दर की ओर रफूचक्कर हो गए। इस अचानक छापे और सुभानमंगल के पराभव से खान चिढ़ गया। दूसरे ही दिन पूरी ताकत के साथ उसने पुरन्दर पर धावा बोला। लेकिन राजे की सेना ने ऊपर से बड़े-बड़े पत्थर लुढ़काए। लुढ़कते, बरसते पत्थरों की मार से खान हड़बड़ा गया। तभी किले से बाहर आकर राजे ने शाही फौज पर जोरदार हमला किया। खान भाग खड़ा हुआ। बीजापुर जाकर ही दम लिया उसने। शिवबा की यह बड़ी विजय थी (अगस्त मध्य सन् 1648)।

इसी समय शिवाजी राजे ने दिल्ली-दरबार के साथ मैत्री सम्बन्ध स्थापित किया। और मुगलों से बीजापुर के बादशाह पर दबाव डलवाया। यह भी छापामार तरीके का ही एक दाँव था। मुगलों की धमकी से डरकर आदिलशाह ने शहाजी को रिहा कर दिया। यह दिन था ज्येष्ठी पूर्णिमा का। वटपौर्णिमा का। सावित्री की ही तरह राजगढ़ पर जिजाऊ साहब भी खुश हुई। उनके पति का एवं स्वराज्य का प्राणसंकट टल गया था। शिवाजी ने दिल्ली के मुगलों से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित किए। और आदिलशाह को मन मारकर शहाजी राजे को उनका सम्मान लौटाना पड़ा। जिजाऊ साहब के सुहाग और नवोदित स्वराज्य, दोनों पर आँच नहीं आई। शिवाजी स्वराज्य और पिता दोनों को बचाने में सफल हुए। स्वराज्य के आरम्भ काल की इस कठिन परीक्षा में माता जगदम्बा ने उन्हें यश दिया था। 
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(नोट : यह श्रृंखला #अपनीडिजिटलडायरी पर डायरी के विशिष्ट सरोकारों के तहत प्रकाशित की जा रही है। छत्रपति शिवाजी के जीवन पर ‘जाणता राजा’ जैसा मशहूर नाटक लिखने और निर्देशित करने वाले महाराष्ट्र के विख्यात नाटककार, इतिहासकार बाबा साहब पुरन्दरे ने एक किताब भी लिखी है। हिन्दी में ‘महाराज’ के नाम से प्रकाशित इस क़िताब में छत्रपति शिवाजी के जीवन-चरित्र को उकेरतीं छोटी-छोटी कहानियाँ हैं। ये कहानियाँ उसी पुस्तक से ली गईं हैं। इन्हें श्रृंखला के रूप में प्रकाशित करने का उद्देश्य सिर्फ़ इतना है कि पुरन्दरे जी ने जीवनभर शिवाजी महाराज के जीवन-चरित्र को सामने लाने का जो अथक प्रयास किया, उसकी कुछ जानकारी #अपनीडिजिटलडायरी के पाठकों तक भी पहुँचे। इस सामग्री पर #अपनीडिजिटलडायरी किसी तरह के कॉपीराइट का दावा नहीं करती। इससे सम्बन्धित सभी अधिकार बाबा साहब पुरन्दरे और उनके द्वारा प्राधिकृत लोगों के पास सुरक्षित हैं।) 
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शिवाजी ‘महाराज’ श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ 
13- शिवाजी ‘महाराज’ : “दगाबाज लोग दगा करने से पहले बहुत ज्यादा मुहब्बत जताते हैं”
12- शिवाजी ‘महाराज’ : सह्याद्रि के कन्धों पर बसे किले ललकार रहे थे, “उठो बगावत करो” और…
11- शिवाजी ‘महाराज’ : दुष्टों को सजा देने के लिए शिवाजी राजे अपनी सामर्थ्य बढ़ा रहे थे
10- शिवाजी ‘महाराज’ : आदिलशाही फौज ने पुणे को रौंद डाला था, पर अब भाग्य ने करवट ली थी
9- शिवाजी ‘महाराज’ : “करे खाने को मोहताज… कहे तुका, भगवन्! अब तो नींद से जागो”
8- शिवाजी ‘महाराज’ : शिवबा ने सूरज, सूरज ने शिवबा को देखा…पता नहीं कौन चकाचौंध हुआ
7- शिवाजी ‘महाराज’ : रात के अंधियारे में शिवाजी का जन्म…. क्रान्ति हमेशा अँधेरे से अंकुरित होती है
6- शिवाजी ‘महाराज’ : मन की सनक और सुल्तान ने जिजाऊ साहब का मायका उजाड़ डाला
5- शिवाजी ‘महाराज’ : …जब एक हाथी के कारण रिश्तों में कभी न पटने वाली दरार आ गई
4- शिवाजी ‘महाराज’ : मराठाओं को ख्याल भी नहीं था कि उनकी बगावत से सल्तनतें ढह जाएँगी
3- शिवाजी ‘महाराज’ : महज पखवाड़े भर की लड़ाई और मराठों का सूरमा राजा, पठाणों का मातहत हुआ
2- शिवाजी ‘महाराज’ : आक्रान्ताओं से पहले….. दुग्धधवल चाँदनी में नहाती थी महाराष्ट्र की राज्यश्री!
1- शिवाजी ‘महाराज’ : किहाँ किहाँ का प्रथम मधुर स्वर….

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Neelesh Dwivedi

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