टीम डायरी, 22/7/2021
बीते दो-तीन दिनों राज्यसभा के सदस्य प्रोफेसर मनोज झा का सदन में दिया यह भाषण ख़बरिया ( Media) और सामाजिक माध्यमों (Social Media) पर चल रहा है। चल क्या रहा है, छाया हुआ है। लोग उनके भाषण की तारीफ़ कर रहे हैं। तारीफ़ के काबिल है भी। क्योंकि आजकल के नेताओं से ऐसी उम्मीद कम ही की जाती है कि वे आम नागरिकों की ज़िन्दगी और मौत से जुड़े मुद्दों पर इतनी नज़दीकी संवेदनशीलता से बोलेंगे।
लेकिन राष्ट्रीय जनता दल के सांसद मनोज झा ने जैसे हर उस नब्ज़ को दबाया, जो दबाई जानी चाहिए थी। उन्होंने भाषण की शुरुआत माफ़ी से की। व्यवस्था के अलम्बरदारों की ओर से कोरोना-काल में अकाल मौत के शिकार लोगों से यह माफ़ी उन्हाेंने माँगी। माँगी भी जानी चाहिए थी क्योंकि लोग जितने महामारी से नहीं मरे, उसके कहीं अधिक व्यवस्था की लाचारी से मारे गए। तो यह माफ़ी बनती थी। क्योंकि जो सक्षम थे, उनमें से कईयों ने वक़्त रहते कुछ किया नहीं। और कई चाहकर, हाथ-पाँव मारकर भी कुछ कर नहीं पाए।
तो इस तरह उनके भाषण में एक तो शुरुआत का माफ़ीनामा ग़ौर करने लायक रहा। दूसरा, उससे ज़्यादा ग़ौरतलब आख़िर में दिया गया एक लाइन का माफ़ीनामा…लाखों लाशों की ओर से हुक्मरानों के नाम। ये माफ़ीनामा दरअसल, मनोज की लाइनों के बीच का छिपा अर्थ है। ऐसा, जहाँ से बयान से आगे की बात शुरू होती है। दूर तक जाती है। मनोज अध्यापक हैं। वे जानते हैं कि उनके जैसी आवाज़ें अक़्सर नक्क़ारख़ाने की अँधेरी खोह में न जाने कहाँ ग़ुम हो जाती हैं। हुक़्मरानाें तक ये पहुँचती ही नहीं हैं। पहुँचती हैं, तो उनकी तरफ़ उनका ध्यान नहीं जाता। पर कभी चला जाए तो अक़्सर आवाज़ उठाने वालों या उन्होंने जिनकी ओर से उसे बुलन्द किया है, उनकी जान पर आ बनती है।
मनोज सांसद हैं। उन्हें अपनी सुरक्षा की फिक्र शायद अधिक न हो। पर उन्हें उन आम लोगों की परवाह ज़रूर होगी, जिनकी ओर से उन्होंने आवाज़ बुलन्द की है। लम्बे समय से एक व्यवस्था का हिस्सा रहने की वज़ह से वे यह भी जानते ही हैं कि हुक़्मरान की नज़र टेढ़ी हुई नहीं कि लाखों लोग दंगे-फ़साद में मरवा दिए जाते हैं। जेबी आतंकियों, नक्सलियों का शिकार बनवा दिए जाते हैं। इधर-उधर के तमाम आरोपों में झूठे मुकदमे थोपकर किसी का भी जीना मुहाल कर दिया जाता है। ऐसे न जाने कितने हथकंडे आजमाए जाते हैं।
क्योंकि आख़िर वह हुक़्मरान है। करने पर आए तो कुछ भी कर सकता है। कर चुका है। कर रहा है। इसीलिए लाखों लाशों की तरफ़ से मनोज की माफ़ी भी जैसे मर चुके लोगों की आवाज़ सी महसूस होती है। जो चाहते हैं कि पीछे ज़िन्दा बच गए उनके परिजन बस ज़िन्दगी सुकून से काट लें अपनी। उन पर हुक़्मरान की, व्यवस्था की टेढ़ी निगाह न पड़े।
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(#अपनीडिजिटलडायरी ने अपने सरोकारों की वज़ह से यह वीडियो राज्यसभा टेलीविज़न के यू-ट्यूब चैनल से लेकर साभार डायरी के पन्नों पर दर्ज़ किया है।)
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