एक बालक ने वैदिक मंत्रों का ‘दण्डक्रम पारायण’ किया तो मजाक की क्या बात है?

अनुज राज पाठक, दिल्ली

एक बालक है, जिसका नाम है देवव्रत महेश रेखे। उम्र महज 19 साल है। उसने अभी पिछले सप्ताह ही शुक्ल-यजुर्वेद (कृष्ण-यजुर्वेद भी है) की ‘माध्यन्दिन संहिता’ (महर्षि मध्यन्दिन द्वारा रचित) के 1,975 मंत्रों का ‘दण्डक्रम पारायण’ 50 दिन (दो अक्टूबर से 30 नवम्बर तक) में पूरा किया। ‘दण्डक्रम पारायण’ बहुत अनुशासनबद्ध पाठ है। इसमें वेद मंत्रों को कण्ठस्थ (याद करना) करने के बाद उनका अनुलोम-विलोम (सीधा और उल्टा) दोनों रूप से स्पष्ट और उच्च स्वर में पाठ करना होता है। ज्ञात आधुनिक इतिहास के करीब 200 सालों में पहले सिर्फ एक बार यह उपलब्धि हासिल की गई है। उसके बाद यह कमाल देवव्रत ने किया है, जिसकी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी प्रशंसा कर चुके हैं। महाराष्ट्र के रहने वाले देवव्रत को काशी में एक कार्यक्रम के दौरान सम्मानित भी किया गया है।   

यद्यपि, खुद को वैज्ञानिक समाज का हिस्सा बताकर दंभ भरने वाले कुछ लोग इस बालक की उपलब्ध का उपहास भी उड़ा रहे हैं। मात्र उपहास ही नहीं, अपितु उसके कंठस्थीकरण के औचित्य पर भी प्रश्न उठा रहे हैं। प्रश्न किए जा रहे हैं कि इससे समाज का क्या लाभ होने वाला है? उनका यह कृत्य नितांत हास्यास्पद प्रतीत होता है। सत्य कहा जाए तो ऐसे प्रश्न करने वालों का प्रतिकार करना भी दयनीय है। मुझे यहाँ एक श्लोक याद आ रहा है..

“पुस्तकस्था तु या विद्या परहस्तगतं धनम्।
कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद् धनम्॥”

इसका सार यह है कि ऐसे ज्ञान का कोई लाभ नहीं, जो पुस्तक में धरा रह जाए और हमारी बुद्धि तक न पहुँचे।

मतलब स्मृति में ज्ञान के संचय का अपना महत्व है। कोई सभ्य समाज शायद इसे नकार सके। हाँ, पश्चिम की मानसिक गुलामी का शिकार भारतीय समाज अवश्य ऐसा कर सकता है। वह भी, निर्लज्ज दोहरे मापदण्डों के साथ। क्योंकि यही समाज पश्चिम जगत की स्मृति आधारित प्रतियोगिताओं का आयोजन करता है। उनका समर्थन करता है। उनमें भाग लेने के लिए युवा पीढ़ी को प्रोत्साहित करता है। कुछ उदाहरण देखें- ‘वर्ल्ड मेमोरी चैम्पियनशिप’  ‘मेमोरी लीग’, ‘मेमोरियाड’, आदि सब क्या हैं? ये सब  स्मृति आधारित प्रतियोगिताएँ हैं। इन्हें ‘वर्ल्ड मेमोरी स्पोर्ट्स काउंसिल’ और ‘इन्टरनेशनल एसोसिएशन ऑफ मेमोरी’ जैसे संगठन आयोजित करते हैं।

इसके अलावा भी इसी तरह की कई प्रतियोगिताएँ दुनियाभर में आयोजित की जाती हैं। सभी प्रतिस्पर्घाओं में प्रतियोगियों को याददाश्त के कौशल का ही प्रदर्शन करना होता है। जैसे- 21 फरवरी 2025 को भारतीय छात्र विश्वा राजकुमार ने 13.50 सेकंड में 80 क्रमरहित संख्याओं और 8.40 सेकण्ड में 30 छवियों को याद करके ‘मेमोरी लीग’ विश्व प्रतियोगिता 2025 जीती। मजे की बात यह कि तब इसी तथाकथित ‘वैज्ञानिक भारतीय समाज’ उसका उपहास नहीं किया। जबकि देवव्रत की उपलब्धि को ‘रटन्त विद्या’ कहकर मजाक उड़ाया जा रहा है!

अब इन्हें यह कौन समझाए कि पश्चिमी जगत से प्रायोजित जिन स्मृति आधारित प्रतियोगिताओं की ये लोग तारीफ करते नहीं अघाते वे भी ‘रटन्त विद्या’ पर ही टिकी हैं, जो कि एक कौशल है। फिर भारत में इसी तरह के आयोजन के प्रति दोहरा मापदण्ड क्यों? वास्तव में पूरे विश्व में स्मृति आधारित प्रतियोगिताओं का आयोजन होता है। उनके अपने विविध वैज्ञानिक कारण हैं। हाँ, भारतीय समाज में ऐसी प्रतियोगिताएँ प्रायः धार्मिक या संस्कृति आधारित संस्थाएँ ही आयोजित करती हैं, जिसमें वेद, वेदांगों का स्मरण करना होता है। तो क्या महज इसीलिए इनका उपहास उड़ाना है?

दरअसल, भारतीय समाज की विडम्बना है कि वह खुद को पश्चिम की नजर से देखता है। पश्चिम से जो आयात किया वह अच्छा है, प्रशंसनीय है, भारत का जो अपना है, वह हीन है। यह अवधारणा ही उपहास का कारण है। यह अवधारणा आधुनिक भारतीय शिक्षा और राजनैतिक पद्धति ने विकसित की है। यह पद्धति प्राचीन भारतीय संस्कृति में कुछ भी ‘अच्छा है’, ऐसा नहीं सोच पाती। साथ ही ‘क्या है’, यह भी जानने का प्रयास नहीं करती। इसीलिए वेद कंठस्थ करने की क्या पद्धतियाँ हैं और क्यों हैं, इस पर विचार करने के बजाय सरलता से उसका उपहास करने में अपनी सुविधा पाती है। जबकि ऐसा कर के स्वयं को आधुनिक बताने वाले वास्तव में अपनी मूढ़ता का परिचय दे रहे हैं। वेद के कंठस्थीकरण को निरर्थक बताकर वे केवल अपनी कुंठा का ही प्रदर्शन कर रहे हैं।

हाँ, यह ठीक है कि वर्तमान में इस स्मरण करने के औचित्य का लाभ प्रत्यक्ष मिलता दिखाई नहीं देता, क्योंकि हमारी शिक्षा व्यवस्था अध्यात्म से हटकर केवल भौतिक लक्ष्य प्राप्त करने की ओर अग्रसर है। भौतिक लक्ष्य में वेद का महत्त्व प्रत्यक्षत: दिखाई नहीं देता। लेकिन एक कौशल तो है ही। और अगर वेदोन्मुख शिक्षा पद्धति होती तो वहाँ वेदार्थ प्रक्रिया के विश्लेषण में मस्तिष्क में संचित ज्ञान सहायक भी होता। पर फिर भी बिना आर्थिक लाभ के अगर युवा पीढ़ी अपनी ऊर्जा प्राचीन ज्ञान परम्परा और पद्धति को संरक्षित करने में लगा रही है, तो निश्चित रूप से यह प्रशंसनीय कार्य है। भारतीय संस्कृति के ऐसे वाहकों का हम सम्मान और प्रशंसा तो कर ही सकते हैं?

—— 

(नोट : अनुज राज पाठक दिल्ली में संस्कृत विषय के शिक्षक हैं। #अपनीडिजिटलडायरी की स्थापना से ही साथ जुड़े सदस्यों में शामिल हैं। अच्छे लेख और कविताएँ लिखते हैं। कभी-कभी श्रृंखलाबद्ध लेखन भी करते हैं।) 

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