सांकेतिक तस्वीर
टीम डायरी
“पैसा भगवान भले न हो, पर उनसे कम भी नहीं”, ऐसा बहुत से लोग अक्सर कहा करते हैं। इस तरह पैसों के पीछे सही-गलत तरीकों से हमेशा भागते रहने की अपनी कोशिशों को सही ठहराने का प्रयास भी किया करते हैं। जबकि सच यह है कि पैसों से सिर्फ सुविधाएँ मिलती हैं। सुविधाएँ, जो हमेशा खुद से ज्यादा दूसरों के घर में दिखाई देती हैं, और यही बात हम इंसानों को खुश करने के बजाय लगातार दुख देती रही है।
फिर भी अलबत्ता, किसी को यह बात अगर कोरी शिक्षा (ज्ञान) लगे तो उसके लिए ताजा मिसाल है। सोशल मीडिया के मंच ‘एक्स’ पर साक्षी नाम की एक उपयोगकर्ता हैं। उन्होंने अपना निजी अनुभव साझा किया है। इसमें वह लिखती हैं, “जब मेरी तनख्वाह महज 15,000 रुपए महीना थी, तब मैं सबसे अधिक खुश रहा करती थी। मगर तनख्वाह बढ़कर जब 2.5 लाख रुपए महीना हुई, तो खुशी नदारद हो गई।”
साक्षी लिखती हैं, “जब मेरी तनख्वाह 15 हजार रुपए महीना थी, तब मैं बहुत खुश थी। फिर मेरी तनख्वाह 1.50 लाख रुपए महीना हो गई तो खुशी कम हो गई। मुझे लगने लगा कि मेरी वेतन इससे अधिक होनी चाहिए। फिर मेरी तनख्वाह 2.50 लाख रुपए महीना हो गई, तो मुझे लगा कि मैं बढ़िया कर रही हूँ। लेकिन कुछ समय बाद दूसरों को देखकर लगने लगा कि नहीं, यह भी कम है। तब मुझे समझ आया कि वास्तव में खुशी का तनख्वाह या पैसे से कोई ज्यादा लेना-देना है नहीं। असल में दूसरों से तुलना करने के कारण हमारे भीतर असंतोष पैदा होता है, हमें दुख होता है। सो जब मैंने नौकरी छोड़ी तो कुछ महीनों के लिए महीने के अंत में मेरे हाथ में कुछ भी पैसा नहीं बचता था। इससे मुझे जोर का झटका लगा, पर उसी वक्त मुझे यह भी एहसास हुआ कि वास्तव में हमें वही काम करना चाहिए, जिसे हम सच में बहुत पसंद करते हैं। अब मैं वही करती हूँ, दूसरों के बारे में सोचे बगैर। पैसा या तनख्वाह कोई कम नहीं होती, खुशी का मामला इस पर निर्भर करता है कि हम जिन्दगी कैसे जीना चाहते हैं।”
अब बताइए कितने लोग साक्षी की बातों से सहमत या असहमत हैं?
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