इन आरोपियों को अदालत ने जेल भेज दिया है।
टीम डायरी
कुछ लोगों की आदत होती है, वे न तो खुद शांति से रहते हैं, न दूसरों को रहने देते हैं। ऐसे ही लोगों से जुड़ा एक मामला उत्तर प्रदेश के वाराणसी से सामने आया है। वहाँ मुस्लिम समुदाय के 14 लोगों ने ‘संभवत: जानबूझकर’ पवित्र गंगा नदी के बीचाें-बीच जाकर नाव में इफ्तार की दावत की। रोजा खोला। इसके बाद ‘जूठन’ (माँस के टुकड़े, हडि्डयाँ) वहीं नदी की धार में बहा दिया। इतना ही नहीं, इस सबका वीडियो बनाया और उसमें पंचगंगा घाट पर स्थित विवादित स्थल, जिसे मूल रूप से विष्णु मंदिर बताया जाता है, को ‘आलमगीर मस्जिद’ कहा। फिर अपने वीडियो को दबंगई दिखाते हुए ‘सोशल-मीडिया’ पर भी डाला। क्या यह उकसावा नहीं था?
वरना, रोजा खोला तो खोला, गंगा की धार में जूठन डालने की क्या पड़ी थी उन्हें? विवादित स्थल’ को मस्जिद (औरंगजेब के शासनकाल में इस मंदिर को भी मस्जिद में तब्दील कर दिया गया था) बताते हुए अपने तेवर दिखाने की क्या जरूरत थी? वीडियो को सोशल-मीडिया पर डालकर ये क्या दिखाना-बताना चाहते थे? क्या साबित करना चाहते थे? जवाब यूँ तो आरोपी या उन्हें बरगलाने वाले लोग ही बेहतर दे सकेंगे। मगर फिर भी ‘एक्स’ पर एक उपयोगकर्ता मीनाक्षी सेहरावत ने इन आरोपियों की ‘सोच’ को समझने-समझाने की कोशिश की है। देखिए उनका वीडियो, नीचे है।
यद्यपि, इस मामले में ताजा सूचना यह है कि सभी आरोपियों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। गिरफ्तारी के बाद उन्हें अदालत में पेश किया गया था। अदालत ने उन सबको नदी में गंदगी फैलाने, शांति भंग करने जैसे आरोपों में एक अप्रैल तक के लिए न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया है। इन आरोपों में 10 साल तक की सजा हो सकती है। वैसे, इस तरह के मामलों में हमेशा राजनीति करने वालों ने भी ‘अपना काम’ शुरू कर दिया है। पर इससे क्या ही फर्क पड़ता है? सच्चाई तो कल भी यही थी, आज भी यही है और आगे भी यही रहने वाली है कि कुछ लोग हैं, जो शांति से रहना चाहते ही नहीं हैं और न दूसरों को रहने देना चाहते हैं।
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