नव-संवत्सर का ज्ञान, खुशी का विज्ञान : प्रकृति-परिवार, समाज-परम्परा से जुड़ जाइए, बस!

नीलेश द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश

अभी 19 मार्च से भारतीय कालगणन का नया संवत्सर शुरू हो गया। सीधे शब्दों में कहें तो भारत वर्ष के बड़े भू-भाग पर राज करने वाले उज्जयिनी के सम्राट विक्रमादित्य ने जो पंचांग (कैलेण्डर) शुरू किया था, उसका नया साल- 2083। इसके बाद अगले दिन 20 मार्च को ‘अंतर्राष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस’ मना लिया गया। इन दोनों ही मौकों पर मीडिया-सोशल मीडिया ने हमेशा की तरह अपनी जिम्मेदारी निभाई और जितना ‘अधकचरा ज्ञान’ परोसा जा सकता था, टुकड़ों-टुकड़ों में वह सब परोस दिया गया। गोया कि रस्म थी, अदा की और फुर्सत हुए। अलबत्ता #अपनीडिजिटलडायरी पर ऐसा नहीं होगा। यहाँ हम बात करेंगे नव-संवत्सर के ज्ञान तथा खुशी के विज्ञान की, जिनके मूल में है- प्रकृति-परिवार, समाज व परम्परा। कैसे? वह देखते हैं, एक-एक कर के। 

प्रकृति : करीब पाँच-छह साल पहले की बात है। उन दिनों मैं एक अखबार में नौकरी किया करता था। मेरे साथ एक युवा सहयोगी था। नाम नहीं बताऊँगा, क्योंकि उसे या किसी को भी कमतर दिखाने का इरादा नहीं है। बस, मुद्दे पर बात करनी है। तो वह युवा सहयोगी, जो कि हिन्दू ही है, ऐसे ही उस साल के नव-संवत्सर की शुरुआत के मौके पर मेरे पास आया और बोला, “सर, आपकी झुकाव तो आध्यात्म की तरफ काफी लगता है। आप ही बताइए, हम हिन्दुओं का यह कैसा नव-वर्ष है, जब प्रकृति में हर तरफ पतझड़ नजर आता है? गर्मी भी धीरे-धीरे बढ़ती जाती है? उसके साथ दिन में आलस भी महसूस होने लगती है?” मुझे तो यह बिल्कुल समझ में नहीं आया।” मैंने उस युवक को तुरंत कोई जवाब नहीं दिया। यद्यपि कुछ देर बाद जब गोधूलि बेला हुई, तो मैंने उसे अपने साथ दफ्तर के नीचे चलने को कहा, खुली हवा में थोड़ा टहलने के इरादे से। वह भी तैयार हो गया। हम दोनों कुछ देर में ही दफ्तर के नजदीक एक गली में चहलकदमी कर रहे थे। वहाँ पेड़-पौधे काफी तादाद में थे। हल्के-हल्के हवा के झोंके भी सुख दे रहे थे। सो मैंने वहीं पूछ लिया, “कैसा लग रहा है?”, “अच्छा लग रहा है सर।” “ऐसे माहौल में कितने दिन से नहीं घूमे?” “काफी वक्त हो गया। अक्सर इस वक्त दफ्तर में काम ही करता रहता हूँ।” “अच्छा, तो सुबह-सुबह तो उठकर कभी घूमते होगे?” “कहाँ सर, देर रात घर लौटते हैं। आप तो जानते ही हैं। उसके बाद जब सूरज सिर पर चमकने लगता है, तब उठना होता है।” “चलो, कोई बात नहीं। ये बताओ, तुमने इन पेड़ों पर गौर किया, क्या दिख रहा है, झड़े हुए पत्ते या नए नर्म-मुलायम पत्तियाँ? और हाँ, उस आम के पेड़ को देखो, उसमें क्या नए बौर आते दिख रहे हैं? उस फूल के पेड़ पर भी नए अंकुर फूट रहे हैं या नहीं?” “हाँ सर, इस पर तो मैंने कभी गौर ही नहीं किया!” “मेरा ख्याल है, अब तुम्हें नव-संवत्सर का अर्थ और महत्त्व दोनों समझ आ गया होगा?” उसने कोई जवाब नहीं दिया, पर उसके चेहरे के हाव-भाव बता रहे थे कि उसे अपनी भूल का एहसास हो गया है। भूल, प्रकृति को अनदेखा करने की। भूल, परम्परा से हट जाने की। 

परिवार : यह अनुभव तो अभी एकाध महीने पहले का ही है। नाम यहाँ भी किसी का नहीं बता रहा हूँ। नाम में रखा क्या है, मसले पर गौर करें। दो छोटी बच्चियाँ अपनी बुआ के घर आईं। जीवन में पहली बार, तीन-चार दिनों के लिए। उनके माता-पिता को मजबूरी और शायद विकल्पहीनता की स्थिति में उन्हें वहाँ छोड़ना पड़ा। उनमें एक बच्ची करीब 10-11 साल और दूसरी की आठ-नौ साल। बुआ के घर पर रहने के दौरान लगातर ऐसा अनुभव हुआ, जैसे दोनों बच्चियों को वह सहजता महसूस नहीं हुई, जो उन्हें ‘अपने घर’ में होती है। शायद तभी एक रात उनमें बड़ी वाली बच्ची ने बुआ की बेटी, जो उम्र बड़ी है, से पूछ लिया, “आप लोग कभी दूसरों के घर ऐसे रहे हो, तीन-चार दिन के लिए?” संयोग से उसी समय उसकी बात घर के एक बड़े सदस्य ने सुन ली। उन्होंने तुरंत उसे समझाया, “बेटा, बुआ का घर ‘दूसरों का घर’ नहीं होता। अपना ही होता है। ऐसे ही चाचा, मामा, मौसी, नानी, दादी के घर भी अपने होते हैं।” समझाने के लिए कुछ  और बातें भी बताई गईं। पर जरा सोचिए, क्या इतने से उसकी समझ बदली होगी। और उसके दिमाग में इस तरह की समझ या ऐसा सवाल आया कैसे? क्या माता-पिता ने उसे सिखाया?‌ या उन्हें अपने बच्चों को जो अच्छी और सही चीजें सिखानी चाहिए, उसके लिए समय ही नहीं मिला? या फिर बच्चों ने यूँ ही आस-पास के माहौल से इस तरह की समझ बना ली? कारण कुछ भी हो सकता है, पर चिन्ताजनक है। 

समाज : ‘अंतर्राष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस’ के मौके पर एक अखबार ने एक बड़ी सी खबर प्रकाशित की है। इसमें बताया है कि हम लोगों का आपसी जुड़ाव लगातार घट रहा है। हम निरंतर एकाकी यानि अकेले होते जा रहे हैं। इस अकेलेपन के लिए सबसे बड़ा जिम्मेदार है, ‘सामाजिक-मीडिया’। जी वही, जिसे सभी लोग ‘सोशल मीडिया’ कहा करते हैं। जबकि वह असल में सबसे बड़ा ‘असामाजिक माध्यम’ मतलब ‘अनसोशल-मीडिया’ बनकर हमारे बीच पसर चुका है। इसमें अक्सर और अधिकतर हम दूसरों की अच्छी-अच्छी, जो कि नकली-नकली भी होती है, चीजें को देखते हैं। फिर हम उनके जैसे ही दिखने-दिखाने की कोशिश करते हैं। इसके बाद यह भी देखते हैं कि कितने लोगों ने हमें प्रतिक्रिया दी है, या नहीं दी है, आदि-आदि। वास्तव में यह सब हमें लगातार नकारात्मकता की ओर धकेलता जाता है। अधिकांश बार हम दूसरों की बनावटी पर बेहतर चीजों को देखकर हीन-भावना से ग्रस्त हो जाते हैं। खुद को बेहतर देखने-दिखाने के लिए मोबाइल-इन्टरनेट पर अधिक समय देते हैं। और ‘परिवार-समाज के साथ जुड़ाव से दूर होते जाते हैं। 

परम्परा : पौराणिक विषयों के एक अच्छे जानकार लेखक हैं अक्षत गुप्ता। उन्होंने एक अखबार में लिखे अपने विशेष लेख में देश की कुछ अच्छी परम्पराओं के बारे में बताया है। जैसे उत्तराखण्ड का फूलदेई उत्सव। इसमें नव-संवत्सर के पहले दिन हर घर के बच्चे करीब-करीब पूरे गाँव-नगर-कस्बे के घरों में जा-जाकर वहाँ की देहरी पर फूल रखते हैं। बड़ों से आशीर्वाद लेते हैं। सबके सुख, सबकी समृद्धि की कामना करते हैं। ऐसे ही, उत्तर भारत के बुन्देखण्ड में रक्षाबन्धन के अगले दिन कजलियाँ (भुजरिया) का त्यौहार होता है। इसमें कुछ दिन पहले बोए गए जौ की ताजा-हरे बालियाँ एक-दूसरे को दी जाती हैं। कामना की जाती है, सब के घर सुख-समृद्धि हरी-भरी रहे। केरल में नौका दौड़ होती है। इसमें हर लंबी नौका पर करीब 80-100 लोग साथ में एक लय, एक ताल पर चप्पू चलाते हैं। ओडिशा में नुआखाई के दौरान नई फसल से पहले पूरा गाँव साथ मिलकर भोजन करता है।.. ऐसी न जाने की कितनी परम्पराएँ हैं। 

तो समस्या कहाँ है? दरअसल, हम परिवार का मतलब भूल गए हैं। हमारे परिवार की परिभाषा सिकुड़कर तीन-चार सदस्यों (माता-पिता और एक या दो संतान) तक रह गई है। और अब तो इस परिभाषा में बच्चे भी गायब हैं। अनुबंध के आधार पर शादी किए बिना महिला-पुरुष कुछ दिन, महीने या साल के लिए साथ रहते हैं, फिर अलग हो जाते हैं। जीवन में ‘खुशी’ ढूँढने का यह नया तरीका है। ऐसे ही, परिवार सिकुड़े तो ‘समाज’ भी फोन पर सिमट गया, कथित ‘सामाजिक-मीडिया’ के दायरे में। फिर मशीनी-दिनचर्या ने हमें प्रकृति से दूर किया और आधुनिकता की मशीनी-बुद्धि ने हमें बताया कि हमारी परम्पराएँ दरअसल, दकियानूसी-पिछड़ी हैं, वक्त की बर्बादी हैं। लिहाजा, हम उन्हें भी भूल बैठे। ‘आधुनिकता का चोला’ पहनना बेहतर समझा। तो भाई अब बताएँ, हम खुश कैसे रह सकते हैं? नहीं रह सकते। इसीलिए आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि खुश रहने के मामले में भारत और भारतीय दुनिया में 118वें नंबर पर हैं।     

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