शिवाजी महाराज : कौन था जो ‘सिर सलामत तो पगड़ी पचास’ कहते हुए भागा था?

बाबा साहब पुरन्दरे द्वारा लिखित और ‘महाराज’ शीर्षक से हिन्दी में प्रकाशित पुस्तक से

पन्हालगढ़ पर कब्जा पाने के लिए सिद्दी जौहर अब भी जूझ रहा था। उसका प्रतिरोध करने बादशाह अली आदिलशाह मिरज तक आ गया था। स्थिति का जायजा लेकर महाराज ने एक ही तरफ मोर्चा लेने की सोची। वह सिर्फ शाहस्ता खान से मुकाबला करने वाले थे। उन्होंने देखा कि बीजापुरकरों के साथ समझौता करने का यह अवसर अच्छा है। सो उन्होंने पन्हालगढ़ जौहर को दे डाला (दिनांक 22 सितम्बर 1660)। किले पर आदिलशाही झंडा फहराने लगा।

इस बीच, महाराज जब राजगढ़ आए तो एक भेदिये का मन काँप उठा। यह भेदिया था, खंडोजी खोपड़े। उसने अफजल खान की मदद की थी। और अब वह जानता था कि महाराज उसकी जान के गाहक बनेंगे। उसे क्षमा नहीं करेंगे। सो, उसने कान्होजी जेधे से अपनी तरफदारी करवाई। सिफारिश बड़ी जोरदार थी। गुस्साए शिवाजी को कान्होजी ने कहा, “महाराज, खंडोजी की जान बख्श दीजिए। उसका घर-बार सलामत रखिए। हमारे वचन की रक्षा कीजिए। इसकी जमानत हम खुद देते हैं।” महाराज ने कान्होजी का लिहाज किया। उनकी चिरौरी से खंडोजी की जान बची। लेकिन महाराज ने खंडोजी को मन से क्षमा नहीं किया था।

एक रोज खंडोजी अकेला ही सलाम करने आया। उसे देखते हो महाराज के तन-बदन में आग लग गई। कड़क कर उन्होंने पहरेदारों से कहा, ‘इस हरामखोर को मुश्कें बाँध दो। उसका दायाँ हाथ और बायाँ पैर उखाड़ दो।” सिपाहियों ने हुक्म की तामीली की। खंडो को पकड़कर उसके हाथ-पाँव तोड़ डाले। किले के नीचे यह बात कान्होजी ने सुनी तो वे दनदनाते हुए आए। महाराज से सवाल-जबाब करने लगे। तब महाराज ने समझाया, “नाईक, आपको खातिर मैंने भेदिये खंडोजी को जिन्दा छोड़ दिया। सिर्फ एक हाथ और एक पाँव ही तोड़े। वरना, उसे मारकर उसके धड़ के टुकड़े चारों चौकियों में फिंकवा देता।”

खोपड़े के अपराध से कान्होजी वाकिफ थे। उन्होंने सोचा कि महाराज का कहना सोलहों आने सच है। स्वराज्य से गद्दारी करने वाले का गुनाह वाकई में गम्भीर है। वह बिना उसकी सजा भुगते, खुले आम मजे से घूमने-फिरने लगेगा तो लोग समझेंगे कि शिवाजी के राज्य में किसी पर कोई पाबन्दी नहीं है। कोई अनुशासन नहीं है। थोड़ा सा पछतावा जाहिर करने ही से गम्भीर से गम्भीर गुनाह माफ हो सकता है। लोगों की इस धारणा से स्वराज्य की भारी हानि होगी। इसीलिए स्वराज्यद्रोही गुनहगार को कड़ी से कड़ी सजा होनी चाहिए। यह सोचकर उनकी नाराजगी कम हो गई।

अब तक अफजल खान की हत्या के बाद से लड़ाइयों का सिलसिला जारी ही था। एक साल तो रात-दिन जूझने में ही बीत गया। तलवारे अभी भी भियान में बन्द नहीं हुई थीं। किए हुए पराक्रमों की सराहना के लिए भी वक्त नहीं मिल रहा था। मराठों के पराक्रमों से आऊसाहब प्रसन्न थीं। सो, एक बार उनके मन में ख्याल आया कि चारण को बुलाकर अफजल खान युद्ध-प्रसंग पर एक वीरगाथा बनवाकर गवाई जाए। खयाल बहुत बढ़िया था। उन दिनों मराठी मुल्क में अज्ञानदास चारण का बोलबाला था। उनकी भाषा बहुत ओजस्वी थी। स्वर सधा हुआ।

इन्हीं अज्ञानदास चारण को जिजाऊसाहब ने न्यौते की सुपारी भिजवाई। राजे के घर से अज्ञानदास को न्यौता आया। उन्हें लगा कि सात जन्म सार्थक हुए। चारण जल्दी-जल्दी गढ़ पर आए। पोवाड़ा बनाने को कहा गया। तब अज्ञानदास के मन में वीर रस हिलोरें मारने लगा। उन्होंने बड़े उत्साह से पोवाड़ा बनाया। महाराज ने वीरों को बधाई देने के लिए दरबार बुलाया। जिस किसी हथियारबन्द ने, बुद्धिवन्त ने स्वराज्य की खातिर कुछ काम किया, उसी का राजे सम्मान करने वाले थे। आरम्भ अज्ञानदास की वीरगाथा से हुआ। मराठी भाषा के खजाने से चुन-चुनकर शब्द सहेजे थे उन्होंने। वह बोले, “नमन है मेरा पहले गण को। बाद में श्री शारदा को। पहने जिसने रत्नजड़ित भूषन। अज्ञानदास है बोले वचन। गाऊँगा मैं राजे का हो, झगड़ा। जो है भई तगड़ा।”

इस शुरुआत के बाद उन्होेंने बीजापुर से निकले अफजल खान के रौब से लेकर उसकी हत्या तक की कथा श्रोताओं के सामने जीवन्त की। पोवाड़े के अन्त में उन्होंने जेधे-बांदल की शूरता का भी गान किया। दरबार खुशी से झूम उठा। महाराज ने चारण की प्रशंसा की। उनको एक-सेर सोने का कड़ा पहनाया। बैठने के लिए उम्दा घोड़ा दिया। राजे ने सभी सैनिकों को शाबाशी दी। किसी को घोड़ा दिया। किसी को कड़ा और किसी को पालकी। किसी को मुहरें, किसी को गले का हार और किसी को रोकड़-पैसा। हर एक को कुछ न कुछ देकर महाराज ने सबको हौसला-अफजाई की। पन्तजी गोपीनाथ बोकिल वकील को उन्होंने सात हजार होन (स्वर्ण मुद्रा) दिए। कान्होजी जेधे को महाराज ने सम्मान का पहला हक दिया। यह दरबार का सर्वश्रेष्ठ सम्मान था।

तभी महाराज को पुणे की मुगली छावनी की एक बहुत महत्त्वपूर्ण खबर मिली। शाइस्ता खान के हुक्म से सरदार कारतलब खान बहुत बड़ी फौज के साथ कोंकण आने वाला था। नागोठणे, चौल, पेन आदि कोंकण की चौकियों पर हमला बोलने वाला था। कारतलब खान ने पुणे में कूच किया (सन् 1661 जनवरी के मध्य में)। उसकी वीरता के कारनामे बहुत मशहूर थे। हाल ही में उसने आदिलशाही के परिंडा किले को जीत लिया था। कारतलब खान उंबरखिंड दर्रे से नीचे के नागोठणे थाने पर उतरने वाला था। यह दर्रा पुणे जिले की वायव्य सीमा पर आता है। करतलब के साथ कई मशहूर सरदार थे। उन्हीं में थी वहांड के माहूर की ख्यातनाम देशमुखन सावित्रीबाई उर्फ पंडिता रायबागन।

महाराज ने पहले से ही उंबरखिंड दरें में जाकर नाकेबन्दी कर ली थी। खान आया लेकिन उसकी फौज को दर्रे तक जाने में काफी कठिनाई उठानी पड़ रही थी। रास्ते में बीहड़ जंगल था। खान को जरा भी अन्देशा नहीं था कि उसके चारों तरफ मराठा फौज छिपकर बैठी है। या कि खुद शिवाजीराजे ही दरें में आ डटे हैं। पर महाराज को खान और एक स्त्री सरदार की होने वाली तबाही साफ नज़र आ रही थी। ऐसे में रहम खाकर उन्होंने वकील के द्वारा खान को सन्देश भेजा, “खैरियत चाहते हो तो चुपचाप वहीं से पीछे लौट जाओ।” खान ने उस सन्देश को साफ नामंजूर किया।

तब महाराज ने जंगल में छिपी फौज को धावा बोलने का हुक्म दे दिया। मराठों ने भयंकर मार-काट मचायी। उस घने जंगल में खान की फौज न लड़ सकती थी, न भाग सकती थी। तब रायबागन ने उसे मशवरा दिया, ‘शिवाजी की शरण ले लो। जान बच जाएगी।” मरता क्या न करता? खान को रायबागन का मशवरा मानना पड़ा। उसने अपने वकील को महाराज के पास उंबरखिंड दरें में भेजा। महाराज सफेद घोड़े पर बैठे थे। उन्होंने बख्त-जिरह और फौलादी टोप पहन रखा था। खान ने बिनाशर्त शरणागति स्वीकार ली थी, जो उसे मिली भी।

कारतलब खान को करारी मात खानी पड़ी (दिनांक 2 फरवरी 1661)। भारी हानि उठाकर वह पुणे लौट आया। शाइस्ता खान की तरफ देखने तक की हिम्मत नहीं थी उसमें। उंबरखिंड दर्रे की लड़ाई में कारतलब खान को भारी रकम खारिज के रूप में महाराज को भेंट करनी पड़ी। साथ ही बहुमूल्य सामान-असबाब और युद्ध सामग्री भी वह तुंगारण्य में ही छोड़ आया। खजाने के बड़े-बड़े पिटारे, हाथी, घोड़े, चाँदी सोने के बर्तन, बड़े-बड़े पतीले आदि अनगिनत चीजें मराठों के हाथ आईं। खान और उसके सैनिक ‘सिर सलामत तो पगड़ी पचास’ कहते हुए खाली हाथ पुणे लौट भागे थे। 
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(नोट : यह श्रृंखला #अपनीडिजिटलडायरी पर डायरी के विशिष्ट सरोकारों के तहत प्रकाशित की जा रही है। छत्रपति शिवाजी के जीवन पर ‘जाणता राजा’ जैसा मशहूर नाटक लिखने और निर्देशित करने वाले महाराष्ट्र के विख्यात नाटककार, इतिहासकार बाबा साहब पुरन्दरे ने एक किताब भी लिखी है। हिन्दी में ‘महाराज’ के नाम से प्रकाशित इस क़िताब में छत्रपति शिवाजी के जीवन-चरित्र को उकेरतीं छोटी-छोटी कहानियाँ हैं। ये कहानियाँ उसी पुस्तक से ली गईं हैं। इन्हें श्रृंखला के रूप में प्रकाशित करने का उद्देश्य सिर्फ़ इतना है कि पुरन्दरे जी ने जीवनभर शिवाजी महाराज के जीवन-चरित्र को सामने लाने का जो अथक प्रयास किया, उसकी कुछ जानकारी #अपनीडिजिटलडायरी के पाठकों तक भी पहुँचे। इस सामग्री पर #अपनीडिजिटलडायरी किसी तरह के कॉपीराइट का दावा नहीं करती। इससे सम्बन्धित सभी अधिकार बाबा साहब पुरन्दरे और उनके द्वारा प्राधिकृत लोगों के पास सुरक्षित हैं।) 
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शिवाजी ‘महाराज’ श्रृंखला की पिछली 20 कड़ियाँ 
25- शिवाजी महाराज : शिवाजी ‘महाराज’ : एक ‘इस्लामाबाद’ महाराष्ट्र में भी, जानते हैं कहाँ?
24- शिवाजी महाराज : अपने बलिदान से एक दर्रे को पावन कर गए बाजीप्रभु देशपांडे
23- शिवाजी महाराज :.. और सिद्दी जौहर का घेरा तोड़ शिवाजी विशालगढ़ की तरफ निकल भागे
22- शिवाजी महाराज : शिवाजी ने सिद्दी जौहर से ‘बिना शर्त शरणागति’ क्यों माँगी?
21- शिवाजी महाराज : जब 60 साल की जिजाऊ साहब खुद मोर्चे पर निकलने काे तैयार हो गईं
20-  शिवाजी महाराज : खान का कटा हुआ सिर देखकर आऊसाहब का कलेजा ठंडा हुआ
19- शिवाजी महाराज : लड़ाइयाँ ऐसे ही निष्ठावान् सरदारों, सिपाहियों के बलबूते पर जीती जाती हैं
18- शिवाजी महाराज : शिवाजी राजे ने जब अफजल खान के खून से होली खेली!
17- शिवाजी महाराज : शाही तख्त के सामने बीड़ा रखा था, दरबार चित्र की भाँति निस्तब्ध था
16- शिवाजी ‘महाराज’ : राजे को तलवार बहुत पसन्द आई, आगे इसी को उन्होंने नाम दिया ‘भवानी’
15- शिवाजी महाराज : कमजोर को कोई नहीं पूछता, सो उठो! शक्ति की उपासना करो
14- शिवाजी महाराज : बोलो “क्या चाहिए तुम्हें? तुम्हारा सुहाग या स्वराज्य?
13- शिवाजी ‘महाराज’ : “दगाबाज लोग दगा करने से पहले बहुत ज्यादा मुहब्बत जताते हैं”
12- शिवाजी ‘महाराज’ : सह्याद्रि के कन्धों पर बसे किले ललकार रहे थे, “उठो बगावत करो” और…
11- शिवाजी ‘महाराज’ : दुष्टों को सजा देने के लिए शिवाजी राजे अपनी सामर्थ्य बढ़ा रहे थे
10- शिवाजी ‘महाराज’ : आदिलशाही फौज ने पुणे को रौंद डाला था, पर अब भाग्य ने करवट ली थी
9- शिवाजी ‘महाराज’ : “करे खाने को मोहताज… कहे तुका, भगवन्! अब तो नींद से जागो”
8- शिवाजी ‘महाराज’ : शिवबा ने सूरज, सूरज ने शिवबा को देखा…पता नहीं कौन चकाचौंध हुआ
7- शिवाजी ‘महाराज’ : रात के अंधियारे में शिवाजी का जन्म…. क्रान्ति हमेशा अँधेरे से अंकुरित होती है
6- शिवाजी ‘महाराज’ : मन की सनक और सुल्तान ने जिजाऊ साहब का मायका उजाड़ डाला

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Neelesh Dwivedi

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