‘मैसूर पाक’ का नाम ‘मैसूर श्री’ कर भी दिया तो क्या इससे उसकी मिठास कम हो गई?

टीम डायरी

जयपुर, राजस्थान की कुछ मिठाई की दुकानों के मालिक इन दिनों चर्चा में हैं। उन्होंने हर उस मिठाई का नाम बदल दिया है, जिनके साथ ‘पाक’ शब्द उपयोग में आता है। मसलन- ‘मैसूर पाक’, ‘आम पाक’, ‘गोंद पाक’, ‘स्वर्ण भस्म पाक’, ‘मोती पाक’, आदि। उन्होंने इन सभी मिठाइयों में अब ‘पाक’ की जगह ‘श्री’ लगाना शुरू कर दिया है। लिहाज़ा, ख़ासकर उनकी दुकानों में इन मिठाइयों के नाम अब कुछ यूँ हो गए हैं- ‘मैसूर श्री’, ‘आम श्री’, ‘गोंद श्री’, ‘स्वर्ण भस्म श्री’, ‘मोती श्री’, आदि। उनका तर्क है कि चूँकि ‘पाक’ शब्द सामान्य तौर पर पाकिस्तान के लिए प्रचलन में आता है और हमारा यह पड़ोसी मुल्क़ हमारे देश में आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देता रहा है, इसलिए उसके विरोध-बहिष्कार के लिए उन्होंने यह क़दम उठाया। मतलब सीधी बात कि मामला भावनात्मक है। 

भावनात्मक मामलों की ख़ासियत यह होती है कि उनमें ज़्यादा दिमाग़ नहीं लगाया जाता। उन्हें तर्क-वितर्क की कसौटी पर कसने की क़वायद भी बेमतलब की दिमाग़ी क़सरत और वक़्त की बर्बादी ही मानी जाती है। समझदार लोग अक़्सर ऐसे मामलों में प्रतिक्रिया करने से बचते हैं। दूसरी बात, इस तरह के फ़ैसले के पीछे जयपुर के इन दुकानदारों की सोची हुए रणनीति भी हो सकती है। कि ऐसा करने से देश के प्रति अपनी निष्ठा का प्रदर्शन तो हो ही जाएगा, लोग इस पर चर्चा करेंगे तो बैठे-ठाले दुकान विज्ञापन भी हो जाएगा। इस संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता। इस कारण से भी इस मामले पर ज़्यादा कोई प्रतिक्रिया बनती नहीं। फिर भी! 

फिर भी लगता है कि हम भारतीयों के पास फ़ालतू का वक़्त बहुत है, जो लोग इस मामले का लगातार मीडिया और तथाकथित ‘सोशल मीडिया’ की सुर्ख़ियों में बनाए हुए हैं। लगभग 48 घन्टे से अधिक का वक़्त हो गया, अभी तक चल ही रहा है मामला। बड़े-बड़े ज्ञानी लोग बता रहे हैं कि ‘पाक’ का मतलब सिर्फ़ पाकिस्तान नहीं होता। अर्थ ‘पाक कला’ से भी लगाया जाता है। बल्कि, मूल रूप से ‘पाक कला’ से ही लगाया जाता है और यह संस्कृत से आया हुआ शब्द है। इसलिए दुकानदारों द्वारा मिठाई से ‘पाक’ शब्द हटाना बचकाना क़दम ही है।  

अलबत्ता, एक चीज बताइए भाई कि पीढ़ियों से खाने-पीने के धन्धे में लगे लोग (वे दुकानदार) क्या इतना भी नहीं जानते होंगे कि ‘पाक’ का मतलब ‘पाक कला’ से होता है, सिर्फ़ पाकिस्तान से नहीं? तो फिर उन्हें ज्ञान क्यों देना? इससे बेहतर तो यही होता न कि उनकी भावनाओं को या इस क़दम के पीछे प्रचार-प्रसार की उनकी मंशा को समझ लिया जाए और मामले को उन्हीं के हाल पर छोड़ दिया जाए? वैसे भी, चार दुकानों में नाम बदल देने से किसी मिठाई का स्थायी रूप से नया नामकरण तो होने से रहा? और चलिए, एक बार मान लें कि बड़े स्तर पर देश में नाम बदल भी दिया गया, तो क्या इससे उस मिठाई की मिठास कम हो जाएगी? या वह कड़वी हो जाएगी? 

लोग भी न जाने कहाँ-कहाँ लगे रहते हैं! लगता है मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली साहब ने ऐसे लोगां के लिए लिखा था, “दो और दो का मेल हमेशा चार कहाँ होता है, सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला।” यानि सीधे शब्दों में कहें तो ज़्यादा समझदारी भी कई बार हाज़मा ख़राब कर दिया करती है!!

सोशल मीडिया पर शेयर करें
Neelesh Dwivedi

Share
Published by
Neelesh Dwivedi

Recent Posts

इस बच्चे ने बता दिया कि जिन्हें पढ़ना-लिखना है, अव्वल आना है, वे तिलचट्‌टों से दूर क्यों हैं?

देशभर के चिकित्सा महाविद्यालयों में प्रवेश के लिए हुई री-नीट (राष्ट्रीय पात्रता-सह-प्रवेश परीक्षा- दोबारा आयोजित)… Read More

3 hours ago

56 साल के ‘युवा’ सत्ता के लिए आग भड़का रहे और 28 साल के देश को नई ऊँचाई दे रहे!

अभी सोमवार, 20 जुलाई को संसद का मॉनसून सत्र शुरू हुआ। इससे कुछ समय पहले… Read More

1 day ago

वंदेमातरम

जय जय श्री राधे Read More

2 days ago

‘सरल भक्तमाल’- 11..: तर्क कोई कितने भी दे, वैष्णव भक्ति के मूल सम्प्रदाय तो चार ही हैं!

कलि युग में भक्ति मार्ग पाखण्ड से घिरा रहता है, इसलिए भगवान के भजन-पूजन, नाम… Read More

4 days ago

फिल्म ‘थ्री इडियट’ के फुनसुक वाँगड़ू नहीं हैं सोनम वाँगचुक, फिर भी ऐसा प्रचार क्यों?

शिक्षा प्रणाली में मूलभूत सुधार और केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की माँग… Read More

5 days ago

केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा मण्डल ने अंग्रेजी को ‘विदेशी भाषा’ कह दिया, तो हाय-तौबा क्यों?

भाषा को लेकर बेवजह की हाय-तौबा मची हुई इन दिनों। वजह वही, पीढ़ियों से भारतीय… Read More

6 days ago