लम्बी दूरी तय करनी हो तो सिर पर कम वज़न रखकर चलो

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से 31/7/2021

आज शाम मौसम अचानक बदल गया। दूध ख़त्म हो गया था फ्रिज में। बहुत हिम्मत करके बाहर निकला और गुमटी से दूध लिया। उसे जब रुपए दिए तो वापसी के लिए उसके पास चिल्लर नहीं थी। मैंने कहा, “कोई बात नहीं बाद में कर लेंगे हिसाब” तो वह बोला, “नहीं भैया जी, ले जाओ बाद में मैं भूल जाऊँगा।” मुझे समझ नहीं आया कि मात्र तीन रुपए की चिल्लर के लिए उसने अपने आप को प्रश्नों के घेरे में खड़ा कर दिया। 

घर लौट रहा था तो रास्ते में कई परिचित और अपरिचित चेहरे दिखे, जिन पर मुस्कान चस्पा थी और हल्का सा अजनबीपन भी। एक बाइक से कोई गुजरा, तो हाथ लहराते हुए चला गया और मैं पहचानता, उसके पहले ओझल हो गया।

यहाँ देखता हूँ, मित्रों से बात करता हूँ, तो वे याद दिलाते हैं कि अलाना-फ़लाना बोल रहा हूँ। यह बात आपको बताई थी, पिछली बार। आपको कहा था, आपसे घर मिलने आया था, आदि, आदि। 

स्मृतियों का बिसरना मेरे स्वभाव का हिस्सा नहीं, बल्कि एक फ़ितूर है कि भूलूँ नहीं, सब याद हो। उस हर बात को याद रखूँ, जो इस सृष्टि में मनुष्य होने के नाते सभ्यताओं की दौड़ में, विकास के क्रम में, हम सब तक पहुँची है। जिससे हम सबका होना तय होता है, जो हमारी साँझी विरासत और थाती है।

वो पेड़, वो गलियाँ, नदियाँ, पहाड़, समुन्दर, कूएँ, बावड़ियाँ, तालाब, जंगल कौंधते हैं। चिड़ियों के भिन्न स्वरों में टिटहरी की कर्कश आवाज़ पहचान लेता हूँ। तोतों की भीड़ याद आती है, जो बिलासपुर रेलवे स्टेशन के बाहर शाम पड़े उमड़ती है, पुराने बरगद पर। कटक के बस स्टैंड पर वो चाय वाला बेसाख़्ता याद आता है, जिसके दो रुपए देना मैं 1991 में भूल गया था। तब रायगढ़ की बस पकड़ने की जल्दी में सब भूल गया था। अब, मानो बहुत बड़ा कर्ज़ रखा है माथे पर। 

अभी होली पर मनोज की रंगोली में रमेश राठौड़ मास्साब का पोर्ट्रेट देखा तो याद आया कि वे गुजर गए और मैं जा भी नहीं पाया। नएपुरे की वो बूढ़ी असहाय शर्मा बहनजी याद आती थीं, जो माँ के साथ स्कूल में थीं। फिर रिटायर होने बाद कभी खटिया से उठ ही नहीं पाईं। बड़े बाज़ार के दत्त मन्दिर वाली गली के उस मकान को भूल गया, जहाँ दो जीवट महिलाओं ने अपनी उम्र भर की कमाई से धर्मशाला बनवा दी थी। पलटा ही नहीं कभी फिर देखने कि जाकर उन्हें शुक्रिया ही बोल आऊँ। 

खूँटि और पाखुर के उन लोगों की अब स्मृति ही नहीं रही, जिनके कोदो और मड़िया को खाकर लम्बे समय तक जीवित रहा। कर्नाटक की फिलोमिना और केके को कैसे भूल गया, जिन्होंने बेंगलुरू वाले रविशंकर के साधना केन्द्र के थोड़े ही आगे, बहुत अन्दर वाले चट्टानों से घिरे गाँव में पानी से भरी बाल्टी में सिर डुबोकर मेरा डर खत्म किया था। यहीं दोस्त बना था, जर्मनी का सेन मैक्स सेवेज, जो पागलों की तरह काम करता था। खूब हँसता था। बरसों उससे चिठ्ठी-पत्री होती रही। फिर मैं ही भूल गया शायद उसे। 

वासद के उस खुले मैदान में आठ दिन रहकर जिनसे गुजराती सीखी, उन झुग्गी के बच्चों को भूल रहा हूँ। ठेठ गुजराती। उसी सबमें बड़ौदा आने-जाने का क्रम, प्रेम और फिर यह अहसास कि प्रेम तो था ही नहीं, कैसे भूल गया? बैतूल, शाहपुर, बमीठा, पाडर, घोड़ाडोंगरी के जंगलों में घूमते हुए प्यार भूला। एक माह तक छक कर सिगरेट पी। लेकिन यहाँ गुजराती प्यार को भूलने गया था और उसी शाहपुर के चर्च में अनजान लड़की से मिला यकायक। वह सयाजी राव गायकवाड़ विश्वविद्यालय, बड़ौदा के महिला बाल विकास विभाग में पढ़ रही थी। उस सरकारी स्कूल के अहाते में गर्मी की सुबहें उसके श्रीवेंकट स्रोत से शुरू होती थीं। आज भी रोज सुबह एमएस सुब्बालक्ष्मी के भज गोविन्दम और श्रीवेंकट स्त्रोत से मेरी सुबह होती है। इन्हें 1994 से रोज सुन रहा हूँ, पर आज तक याद नहीं हुआ। पता नहीं, उस तमिल लड़की को, जो गुजराती, हिन्दी, अंग्रेजी और मराठी भी बोल लेती थी, कैसे याद हुआ था? 

उसी घोड़ाडोंगरी के स्टेशन के बाहर सरदार लाभ सिंह अभी है या नहीं, मालूम नहीं। वह जंगल के ठेकेदार थे। उनका घर किताबों से भरा था। वे अपने उस अध्ययन कक्ष में ले गए थे। वहाँ न्यूयॉर्क टाईम्स अख़बार जीवन में पहली बार देखा था। बीजी यानि उनकी पत्नी ने सरसों की भाजी के साथ जो रोटी परोसी थी वो भूल गया। पीतल के बड़े ग्लास में दही फेंटकर ताज़ी वैसी ही लस्सी फिर उसी तरफ़ सिबलून के घर पी थी, 2005 में, जब महिला सरपंचों के साथ कुछ शोध कर रहा था।

पांडिचेरी के अरविन्द आश्रम में फ्रांसीसी मूल का इदय वेंदन मिला था। वह एक दिन अपने घर ले गया था, अपने शराबी पिता से मिलवाने, जो मूल फ्रांस के थे। उनकी पत्नी सिंहली थी और बेटा उनके प्यार की निशानी। उसने बताया था कि उसके नाम का अर्थ तमिल में फूलों का राजा होता है। उसके पिता देर तक शराब पीते रहे। फिर मुझे पता नहीं क्यों, पांडिचेरी के किसी जीवनन्दा हायर सेकेंडरी स्कूल के मैदान में छोड़ गए, अपनी पुरानी फियेट से। मैं उस बिहारी सायकिल रिक्शा वाले को भूल गया, जो वहाँ से अरविन्द आश्रम छोड़ गया था बगैर एक रुपया लिए। मैं लगभग रो ही दिया था, जब पास ही बने यूथ होस्टल में रह रही बुल्गारिया की एक महिला- अलीशा कैथी ने मुझे उस रिक्शा वाले की मनुष्यता का बख़ान कर अपने ही भारत देश को समझाने में मदद की। 

त्रिशूर के कट्टाचीरा ब्रिज के पास रहने वाले सनील के. एस.को भूल गया। वहीं के केरला वर्मा कॉलेज में वह दोस्त बना था। मेरे लिए घर से मलयाली व्यंजन लाता था, दो हफ्ते तक और जिसने मलयालम सिखाई थी। सनील के पिता उसी कॉलेज में अंग्रेजी पढ़ाते थे। आज लगता है कि उनके मलयाली शैली में अंग्रेजी बोलने का ही प्रभाव था कि 1987 में लौटकर मैंने एमए अंग्रेजी साहित्य में करने की ठानी और किया भी। 

स्मृतियों पर बहुत गर्व था कि वे मेरे वश में है और मैं स्मृतिविहीन नहीं हूँ। पर आज जब शाम को मौसम बदला और दूध वाले ने कहा कि तीन रुपए लौटाना भूल जाऊँगा तो सब कुछ साफ़ होने लगा, दिल दिमाग़ में। अभी शिवपुरी की गुड्डी, हरमू हाऊसिंग कॉलोनी, राँची की विनीता, 24-परगना का अरिंदम भट्टाचार्जी, कोलकाता की सुदेवी, भावनगर की देविका, तंजावुर की पी. उमा और न जाने कौन-कौन, बेतहाशा याद आ रहे हैं। वे सब मेरे स्मृति पटल से गायब थे। भुवनेश्वर के निखिल पटनायक की तो याद आ गई पर गजपति, बोलांगीर के दोस्त भूल रहा हूँ। जम्मू के उस ख़ूबसूरत बग़ीचे की याद है पर वो लड़की नहीं याद आ रही, जो मेरे साथ कटरा तक गई थी एक सफेद अम्बेसडर में बैठकर और खूब चिप्स खाती थी। 

स्मृतियों पर विस्मृतियों की धूल का साम्राज्य जम रहा है। मैं एकांत के इस निविड़ में शान्त चित्त होकर बुद्ध को याद करता हूँ, जिन्होंने राजकुमार सिद्धार्थ के रूप में ‘राहुल’ का अर्थ आत्मसात् करने में मदद की। जब नया धर्म संसार को दिया तो यह सिखाया कि लम्बी दूरी तय करनी हो तो सिर पर कम वज़न रखकर चलो।

स्मृतियों का वज़न कितना होता है? यह कहाँ रखा जा सकता है? लगता है कि मंज़िल आ गई है। इसके आगे, यहाँ से देह भी साथ नहीं देगी तो सोच रहा हूँ कि क्या-क्या भूलना है, क्या संग साथ रखना है और कब तक चलना है?

(संदीप जी स्वतंत्र लेखक हैं। यह लेख उनकी ‘एकांत की अकुलाहट’ श्रृंखला की 21वीं कड़ी है। #अपनीडिजिटलडायरी की टीम को प्रोत्साहन देने के लिए उन्होंने इस श्रृंखला के सभी लेख अपनी स्वेच्छा से, सहर्ष उपलब्ध कराए हैं। वह भी बिना कोई पारिश्रमिक लिए। इस मायने में उनके निजी अनुभवों/विचारों की यह पठनीय श्रृंखला #अपनीडिजिटलडायरी की टीम के लिए पहली कमाई की तरह है। अपने पाठकों और सहभागियों को लगातार स्वस्थ, रोचक, प्रेरक, सरोकार से भरी पठनीय सामग्री उपलब्ध कराने का लक्ष्य लेकर सतत् प्रयास कर रही ‘डायरी’ टीम इसके लिए संदीप जी की आभारी है।) 

इस श्रृंखला की पिछली  कड़ियाँ  ये रहीं : 

20वीं कड़ी : हम सब कहीं न कही ग़लत हैं

19वीं कड़ी : प्रकृति अपनी लय में जो चाहती है, हमें बनाकर ही छोड़ती है, हम चाहे जो कर लें!

18वीं कड़ी : जो सहज और सरल है वही यह जंग भी जीत पाएगा

17वीं कड़ी : विस्मृति बड़ी नेमत है और एक दिन मैं भी भुला ही दिया जाऊँगा!

16वीं कड़ी : बता नीलकंठ, इस गरल विष का रहस्य क्या है?

15वीं कड़ी : दूर कहीं पदचाप सुनाई देते हैं…‘वा घर सबसे न्यारा’ ..

14वीं कड़ी : बाबू , तुम्हारा खून बहुत अलग है, इंसानों का खून नहीं है…

13वीं कड़ी : रास्ते की धूप में ख़ुद ही चलना पड़ता है, निर्जन पथ पर अकेले ही निकलना होगा

12वीं कड़ी : बीती जा रही है सबकी उमर पर हम मानने को तैयार ही नहीं हैं

11वीं कड़ी : लगता है, हम सब एक टाइटैनिक में इस समय सवार हैं और जहाज डूब रहा है

10वीं कड़ी : लगता है, अपना खाने-पीने का कोटा खत्म हो गया है!

नौवीं कड़ी : मैं थककर मौत का इन्तज़ार नहीं करना चाहता…

आठवीं कड़ी : गुरुदेव कहते हैं, ‘एकला चलो रे’ और मैं एकला चलता रहा, चलता रहा…

सातवीं कड़ी : स्मृतियों के धागे से वक़्त को पकड़ता हूँ, ताकि पिंजर से आत्मा के निकलने का नाद गूँजे

छठी कड़ीः आज मैं मुआफ़ी माँगने पलटकर पीछे आया हूँ, मुझे मुआफ़ कर दो 

पांचवीं कड़ीः ‘मत कर तू अभिमान’ सिर्फ गाने से या कहने से नहीं चलेगा!

चौथी कड़ीः रातभर नदी के बहते पानी में पाँव डालकर बैठे रहना…फिर याद आता उसे अपना कमरा

तीसरी कड़ीः काश, चाँद की आभा भी नीली होती, सितारे भी और अंधेरा भी नीला हो जाता!

दूसरी कड़ीः जब कोई विमान अपने ताकतवर पंखों से चीरता हुआ इसके भीतर पहुँच जाता है तो…

पहली कड़ीः किसी ने पूछा कि पेड़ का रंग कैसा हो, तो मैंने बहुत सोचकर देर से जवाब दिया- नीला!

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